Tuesday, December 8, 2009

साहित्‍य नगरी बीकानेर : अन्‍नाराम सुदामा की छाया

कब क्‍या संयोग बन पड़े, व्‍यक्ति नहीं जान पाता। पिछली पोस्‍ट में कुछ पढ़ने का संकल्‍प किया था, यकायक निजी काम आ बना और बीकानेर जाना पड़ा। जी हां, वही बीकानेर जिसे राजस्‍थान में 'साहित्‍य नगरी' के रूप में जाना जाता है।
अब साहित्‍य नगरी में गये तो कुछ साहित्यिक यादें भी लेकर आए। चर्चा उन्‍हीं की।
काम के सिलसिले में साहित्‍यकार डॉ. मदन सैनी से मिलना होता है। ढेरों चर्चाएं, गप्‍पे होती हैं। 'भोळी बातां', 'फुरसत' आदि कालजयी राजस्‍थानी कहानी संग्रहों के रचयिता और स्‍नेही डॉ. मदन सैनी मुझे काफी अपनत्‍व के साथ 'कोटगेट' छोड़ते हैं। (7 दिसम्‍बर, 2009, प्रात: 9.30 बजे।) कोटगेट बीकानेर का प्रसिद्ध स्‍थान है। पुरातत्‍व विभाग द्वारा इसे संरक्षित भी घोषित किया हुआ है। सैलानियों का कभी-कभी यह गेट आकर्षण भी बनता है।
मैं इसी कोटगेट से मन में संकल्‍प लिए आगे की ओर बढ़ता हूं। थोड़ा ही चलने पर मुझे एक भवन दिखाई देता है। ध्‍यान से देखा तो कॉलेज के दिन स्‍मरण हो आए। भवन के आगे से गुजरते हुए उन दिनों सोचा था, कि इसी के पास रहते हैं, हमारे डॉ. मनोहर शर्मा। उनसे मिलूंगा। लेकिन उन दिनों वह नहीं हो पाया और साहित्‍यकार डॉ. मनोहर शर्मा हमसे दूर चले गए। जी, यह नागरी भंडार है। बीकानेर की साहित्यिक गोष्ठियों का आगार। हिन्‍दी विश्‍वभारती के कार्यक्रम यहीं से संचालित होते रहे हैं। कभी पहले यहां राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी का कार्यालय भी हुआ करता था।
नागरी भंडार में एक पुस्‍तकालय भी संचालित है और इन दिनों 'विकास प्रकाशन, बीकानेर' का कार्यालय भी।
विकास प्रकाशन जाने-माने साहित्‍यकार और सिद्ध साहित्‍य के विद्वान श्री सूर्यशंकर पारीक के सुपुत्र द्वारा संचालित है।
विकास प्रकाशन में खोज होती है, लेकिन कुछ ऐसा नहीं पाता हूं, जो फि़लहाल खरीदा जा सके।
थोड़ा आगे निकलते ही बीकानेर का रेलवे स्‍टेशन आता है। रेलवे स्‍टेशन से ठीक सामने की सड़क पर मेरे कदम अनायास ही बढ़ जाते हैं। न जाने कहां से कदमों में त्‍वरा प्रवृत्ति आ जाती है। मन भी आवेशित-सा लगता है।
थोड़ा-सा चलते ही साइन बोर्ड मेरी नज़रों में आता है। मैं ठिठकता हुआ रूक जाता हूं।
भीनासर के शुभु पटवा ख्‍यातनाम पत्रकार, जिनसे मेरा बी.ए. के दौरान पत्र-व्‍यवहार था, याद हो उठते हैं। वे बीकानेर में ही हैं, उनसे मिलने का भी मन हो उठता है, लेकिन साइन बोर्ड पर लिखा 'गंगाशहर' मुझे ज्‍यादा आकर्षित करता है। कारण कि यहां मेरे प्रिय राजस्‍थानी कथाकार श्री अन्‍नाराम सुदामा रहते हैं। उन्‍हीं सुदामाजी से मिलने का संकल्‍प ले मैं डॉ. सैनी से विदा हुआ था।
मीरां पुरस्‍कार, सूर्यमल्‍ल मीसण शिखर पुरस्‍कार, कमला गोइन्‍का साहित्‍य पुरस्‍कार और हाल ही मिले एक लाख के लखोटिया पुरस्‍कार से समादृत अन्‍नाराम सुदामा। बीसाधिक पुस्‍तकों के रचयिता। 'मैकती काया : मुळकती धरती', 'मैवै रा रूंख' जैसे राजस्‍थानी उपन्‍यास अन्‍नाराम सुदामा की पहचान हैं।
गोगागेट होते हुए मैं गंगाशहर की ख्‍यातनाम प्‍याउ के पास से गुजरता हुए पेट्रोल पम्‍प के सामने जा ठहरता हूं। एक बार पूछना पड़ता है कि अन्‍नाराम जी का घर ? हालांकि मैं 1996 में यहां आ चुका था, लेकिन वे परिपक्‍वता के दिन नहीं थे।
एक पीसीओ की तरफ इशारा होता है, और वहां मुझे अन्‍नारामजी का पोता मिलता है। सज्‍जन युवा अन्‍नारामजी के संस्‍कारों का अनुसरण करता है और मेरे आगे-आगे हो लेता है। सौ कदम चलते ही मेरे प्रिय राजस्‍थानी कथाकार अन्‍नाराम सुदामा का वहीं कमरा सामने होता है, जो सन 1996 में हमारी प्रथम मुलाकात का माध्‍यम बना था। मैं स्‍मृतियों में खो जाता हूं।
यकायक श्री अन्‍नारामजी आते हैं और मुझे थाम लेते हैं। वे भी मुझे न भूल पाए थे।
बातों का सिलसिला सन 1996 से ही शुरू होता है और फिर तो थमने का नाम ही नहीं लेता।
समकालीन राजस्‍थानी साहित्‍य, इक-दूजे का सृजन, समाज में खत्‍म होते नैतिक मूल्‍य, पुरस्‍कारों की आपा-धापी, राजनीति और बीकानेर में सुधार, मिली पुरस्‍कार राशि और परिवार, विश्‍वविद्यालयों के शिक्षकों का गिरता आचरण और न जाने कितने विषय हमारे बीच बिखर जाते हैं। ऐसे विषय जो कभी समेटे न जा सकते हों।
चाय-कॉफी मैं कभी नहीं पीता, इस कारण सुदामाजी मुझे जबरदस्‍ती नाश्‍ता करवाते हैं, अखरता है। सोचता हूं कि चाय शुरू कर देनी चाहिए। ऐसे मौकों पर एक व्‍यक्ति आवभगत और क्‍या करे ? लेकिन दूसरे क्षण विचार दूर छिटक जाता है।
सुदामाजी का उल्‍लास और बार-बार प्रशंसा करने का तरीका, मुझे भी उल्‍लसित करते हैं। वहीं, उनकी आतंरिक पीड़ाएं मुझे आंदोलित भी करती हैं। ऐसी पीड़ाएं जो एक साहित्‍यकार ही झेलता है। सोचता हूं, अन्‍नाराम सुदामा ने अपनी निज पीड़ाओं से वास्‍ता करवाकर क्‍या मुझे साहित्‍य सृजन हेतु प्‍लाट नहीं दिया। परंतु, अभी नहीं, उनके बाद, विचार आता है।
पीड़ाओं के बीच वे खुश हैं। खुश इसलिए कि एक साहित्‍यकार के मान के कारण कभी-कभी समस्‍याएं भी हल हो जाती हैं। अपने शिष्‍य श्री अर्जुन मेघवाल (Retd. I.A.S.), सांसद लोकसभा क्षेत्र, बीकानेर के प्रसंग वे बीच में छेड़ते हैं और ढेरों बातें बताते हैं। शिष्‍य-सांसद का बार-बार घर आकर जाना और कुशलक्षेम पूछते रहना, सुदामाजी को सुहाता है।
परंतु, दुनिया को मार्ग दिखाने का संकल्‍प लिए पूरी उम्र सृजनधर्मिता में जीने वाला व्‍यक्ति जब समाज को उसी ढर्रे पर खड़ा देखता है तो दु:ख होना स्‍वाभाविक है। सांसद चर्चा जैसे कुछ क्षणों को छोड़कर पूरी मुलाकात में यही दु:ख उभरता रहता है।
बातों का अनथक सिलसिला खत्‍म होने का नाम नहीं लेता, हालांकि दो घण्‍टे से ज्‍यादा का वक्‍त गुजर चुका था। आगे के बाकी निजी काम मुझे विवश करते हैं, मैं चरण-स्‍पर्श कर खड़ा हो लेता हूं।
पिछले दसाधिक सालों में मेरे साथ हो रहे पत्र-व्‍यवहार में जो सुदामाजी का अपनत्‍व भाव झलकता रहा है, वैसा ही मैं फिर से उनमें देखता हूं। सुदामाजी मेरे साथ हो लेते हैं, बगैर पैरों में कुछ पहने। मेरे मना करते रहने को अनसुना करते हुए वे सड़क तक मुझे छोड़ते हैं। काफी हिदायतों के साथ।
और मैं लौट पड़ता हूं उनसे बहुत कुछ लेकर ----------।

2 comments:

  1. khoobsoorat bikaner ke vashinde bhi nishchit roop se khoobsoorat vicharon ke dhani hain. bikaner ka madhur smran karvane ke liye dhanyawad. jin ka jikra aapne kiya, un sabhi ko pranam...

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  2. Sudama ji ki sadgi aur unche vicharon ke bare me jankar bahut khusi hui
    Aaj bhi sajjan purush hai............
    Bansidhar

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