Saturday, November 21, 2009

सरिता के स्‍वरों के बीच डूबकी

'वीणा' कैसेट का राजस्‍थानी लोक संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय काम है। गत वर्षों में श्री के.सी.मालू के निर्देशन में वीणा ने अनेक कैसेट बाज़ार में उतारे और अप्रत्‍याशित सफलता अर्जित की। पाश्‍चात्‍य प्रभाव के कारण परंपरागत लोक गीत और लोक संगीत के प्रति मोह भंग होती राजस्‍थान की जनता के लिए वीणा वरदान बनकर उभरी।
कभी पीछे न मुड़कर देखने वाले के.सी. मालू ने राजस्‍थान के लोक मानस को टटोला। पुराने के प्रति मोह और नवीन के प्रति आकर्षण के द्वंद्व के बीच झूलते लोक की नब्‍ज मालू के हाथ में आसानी से आ गई। बाजारीकरण के युग में उन्‍होंने लोकगीत-लोकसंगीत का बाज़ारीकरण किया। परंपरागत धुनों और गीतों के साथ नवीन प्रयोगों के कारण उन्‍हें आलोचना भी झेलनी पड़ी। परंतु, यह सत्‍य और सटीक है कि के.सी. मालू ने लोक की रचनाओं को बचाने का काम भी किया। भले ही लोक को वीणा के माध्‍यम से प्राचीन माल ही नवीन ढंग से परोसा गया हो परंतु, वह उसे रास आया।
विभिन्‍न आलोचनाओं के बीच यह कहा जाये कि वीणा ही वह माध्‍यम बनी, जिसके कारण फिल्‍मी गीत बजने वाली जगह राजस्‍थानी संगीत बजने लगा, तो वीणा के योगदान का मूल्‍यांकन हो सकेगा।
ऑडियो के क्षेत्र में आगे बढ़ने के बाद वीणा ने विडियो क्षेत्र में कदम रखा तो नृत्‍य के क्षेत्र राजस्‍थान ने अपार संपदा सौंपी। परंपरागत नृत्‍य की भरमार राजस्‍थान में सदैव से ही रही है। घूमर तो जग विख्‍यात है। चरी, भवाई, कालबेलिया, मयूर, कच्‍छीघोड़ी आदि नृत्‍य भी किसी मायने में कम नहीं। वीणा ने इन्‍हीं सबके समिश्रण में युवा कलाकारों को थिरकाया। गीत-संगीत-वेशभूषा के साथ-साथ राजस्‍थान की शानदार शूटिंग लोकेशन ने भी वीणा का साथ दिया। यह प्रयोग भी चल निकला।
सफलताएं जब कदम चूमने लगती हैं तो व्‍यक्ति नितांत निज बनता चलता है। लेकिन इसके उलट के.सी. मालू सार्वजनिक होते चले गए। राजस्‍थान के सुजानगढ् (चूरू) में गुजारे गए मुफलिसी के दिन मालू कभी नहीं भूले। और न ही भूले सुजानगढ़ की समृद्ध संगीत परम्‍परा को। शंभु सेन, समीर सेन, दलीप सेन की भूमि सुजानगढ़ की प्रेरणा ही रही कि के.सी. मालू ने वीणा अकादेमी की स्‍थापना की। लोक संगीत के जानकारों का ज्ञान अर्जित कर विभिन्‍न प्रयोग किए गए। लुप्‍त होते गीत और गीतों के संग्रहों के एकत्रीकरण का काम शुरू किया गया। लोक वाद्यों के भण्‍डारण का काम द्रुत गति से किया गया। इन सबके बीच अकादेमी के माध्‍यम से देश के विभिन्‍न अंचलों में सांस्‍कृतिक प्रस्‍तुतियां दी गई।
यह क्रम अभी जारी ही था कि इसी बीच से एक और सरिता बह निकली। मासिक पत्रिका 'स्‍वर सरिता' के बहाने।
गत दिनों महाकवि कन्‍हैयालाल सेठिया की प्रथम पुण्‍यतिथि पर श्री के.सी. मालू अपने गृह नगर सुजानगढ़ आए। वहीं उनकी भेंट राजस्‍थानी के वयोवृद्ध साहित्‍यकार श्री बैजनाथ्‍ा पंवार से मुलाकात हुई। वहीं पंवारजी को'स्‍वर सरिता' के अंक समर्पित हुए, जो आगे चलकर मेरे हाथों में आए।
'स्‍वर सरिता' के सितम्‍बर व अक्‍टूबर-2009 अंक मेरे सामने हैं। इन दिनों का यह एक और सुखद अहसास है। अंक आकर्षक ही नहीं मोहक भी हैं। रंगीन ग्‍लेज्‍ड कागज पर बेहतरीन साज-सज्‍जा के साथ पत्रिका 'राजस्‍थान सुजस' की याद दिलाती है।
आंतरिक ढांचें के रूप में संपादक श्री देवदत्‍त शर्मा का रचना-चयन मजबूती से खड़ा है। याद आ रहा है कि श्री देवदत्‍तजी से पहला वास्‍ता भी 'राजस्‍थान सुजस' के माध्‍यम से पड़ा था। उनका अनुभव 'स्‍वर सरिता' के काम आ गया। यहां, यह उम्‍मीद भी की जा सकती है कि उनका 'स्‍वर सरिता' को लम्‍बा साथ मिलेगा। उन्‍हें काम करना भी चाहिए क्‍योंकि, राजस्‍थान की संगीतमय-सुरमय-स्‍वरमय धरती में दोहन योग्‍य बहुत सामग्री है।
गीत-संगीत के क्षेत्र में डॉ. जयचंद्र शर्मा (बीकानेर) के बाद काम पर विराम सा लग गया था, अब 'स्‍वर सरिता' ने मौन को तोड़ा है। दूसरे वर्ष के 3,4 अंक देखकर कहा भी जा सकता है कि सिर्फ मौन टूटा ही नहीं, बुलंद आवाज के साथ राजस्‍थानी संगीत और राजस्‍थान की संगीत परंपरा ने अगड़ाई ली है। सुप्‍त अवस्‍था समाप्ति के बाद जागृत अवस्‍था की लहर राजस्‍थान को पाटते हुए अखिल भारतीय स्‍तर पर दिखनी चाहिए। तब आनंद आए। बहरहाल, शुरूआत के लिए श्री के.सी. मालू को बधाई।
सितम्‍बर के अंक में मंदिर परंपरा के पखावजी, ब्रज का लोक संगीत, मध्‍य भारत का लोक संगीत, हरियाणवी लोकगीत आदि आलेखों के साथ-साथ लता मंगेशकर पर विशेष सामग्री है। वहीं अक्‍टूबर के अंक में लोक तथा शास्‍त्रीय संगीत का पारस्‍परिक सम्‍बन्‍ध, संगीत सम्‍बन्‍धी गद्य-ग्रन्‍थ, जैन योग में संगीत का स्‍थान, मेवाती विवाह गीत, श्रेष्‍ठ है संगीत आदि आलेख हैं। इसी अंक में गवरी देवी, कन्‍हैयालाल वर्मा, रवि शंकर के सम्‍मान में भी सामग्री है।
पत्रिका : स्‍वर सरिता
आवृत्ति : मासिक
प्रकाशक : श्री के.सी. मालू
(प्रधान संपादक)
हल्दिया हाउस, जौहरी बाजार,
जयपुर-302003
फोन : 0141-2570517, 2572666
संपादक : डॉ. देवदत्‍त शर्मा
मूल्‍य : 15 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ : 34 + 4

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