Monday, November 23, 2009

हंस के बहाने निराशा बकलम प्रभा खेतान

मासिक 'हंस' हिन्‍दी की बेहतरीन पत्रिकाओं में से एक है। जाने-माने कथाकार राजेन्‍द्र यादव का एक अद्भुत प्रयोग। समकालीन विमर्शों और विवादों का 'हंस' सदैव केंद्र बिंदु रही है। हंस के बहाने श्री यादव अपने विचारों को हवा देते रहे हैं और हंस को भी इससे लाभ मिलता रहा है। हंस में कभी स्‍नोबावार्ने का हौव्‍वा खड़ा होता है तो कभी यादव-नामवर टकराहट। कुछ भी कहो, हंस साहित्‍य का केंद्र है। राजेन्‍द्र यादव के कथनानुसार दिल्‍ली में न रहने वाला साहित्‍याकर जैसे चर्चाओं के केंद्र में नहीं रहता वैसे ही हंस में प्रकाशित न होने वाला रचनाकार चर्चा में नहीं रहता। और तो और 'हंस' न पढ़ने वाला पाठक भी समकालीन चर्चाओं से परिचित नहीं हो पाता।
हंस ने न केवल वैचारिक धरातल पर नए मुकाम हासिल किए हैं अपितु रचनात्‍मक धरातल को भी मजबूती दी है। यादवजी ने कितने ही नए रचनाकार हंस के माध्‍यम से खड़े कर दिए हैं, जो आने वाले समय में लम्‍बी दौड़ दौड़ने वाले हैं।
हंस का हर एक अंक विशिष्‍ट होता है। परंतु, जब से हंस के अंदर प्रभा खेतान पर विशेषांक निकालने की खबर प्रकाशित हुई, मन व्‍यग्र हो उठा। इंतजार न जाने क्‍यों लम्‍बा होता जा रहा था।
जैसे ही हंस का नवम्‍बर, 2009 अंक हाथ में आया तो बांछें खिल उठी। आवरण पर लिखा मिला - 'स्‍त्री विमर्श : अगला दौर/ स्‍मृति प्रभा खेतान' । परंतु, जैसे ही अंक में घुसते गए निराशा होती गई। यह पहला अवसर था जब हंस के अंक से निराशा हुई।
इस अंक में 'प्रभा खेतान के बहाने : नारीवाद की हिंदी-राजनीति' (अभय कुमार दुबे) व 'अरे, ये लाइन क्‍यों कट गई?' (राजेन्‍द्र यादव) दो ही ऐसे आलेख हैं, जो प्रभा की स्‍मृति से ओतप्रोत हैं। इनमें श्री यादवजी के आलेख का कुछ भाग तो पूर्व प्रकाशित भी है।
प्रभा खेतान का हंस इस ढंग से स्‍मरण करेगा, सोचा भी न था। क्‍या दो-चार आलेख और प्रभा की कुछ रचनाएं अंक में नहीं आनी चाहिए थी? हालांकि अंक में सामग्री दूसरे नज़रिये से काफी महत्‍वपूर्ण हैं परंतु, किसी पर अंक केंद्रित करने के अलग दायित्‍व बन जाते हैं। संपादकीय में राजेन्‍द्रजी यादव खीझ निकालते हैं कि प्रभा के घर से कोई सहयोग नहीं मिला। कौनसा प्रभा का घ्‍ार ? वह, जहां संदीप भूतोडि़या अपना व्‍यापारिक साम्राज्‍य स्‍थापित किए है, या वह जहां श्री मोहन कुमार विवशता के साथ ताक रहे हैं?
प्रभा खेतान की बहुत सी रचनाएं विभिन्‍न लघु पत्रिकाओं में छपी हैं, अच्‍छा होता यादव जी उनको ही 'हंस' के विस्‍तृत कैनवास पर स्‍थान देते। या फिर प्रभा से जुड़े लोगों से एक-एक आलेख मांगते। प्रभा के घर से सहयोग की कल्‍पना करना भी अब बेमानी है। यादवजी अगर अब सोचते हैं कि प्रभा के घर से सहयोग मिलेगा और वे बेहतरीन अंक को अंजाम देंगे तो यह उनका कोरा भ्रम है। भला हो यह बात यादवजी तक पहुंचे। यादवजी को बगैर पारिवारिक सहयोग के अंक निकालने की हिम्‍मत करनी चाहिए थी।
खैर ...... अभी वक्‍त नहीं गुजरा है, यादवजी और सफ़ल प्रयास करेंगे। प्रभा खेतान को सच्‍ची श्रद्धांजलि तभी होगी।
पत्रिका : हंस
आवृत्ति : मासिक
संपादक : राजेन्‍द्र यादव
प्रकाशक : अक्षर प्रकाशन प्रा.लि.
2/36, अंसारी रोड, दरियागंज,
नई दिल्‍ली-110002
फोन : 011-23270377, 41050047
e-mail : editorhans@gamail.com
visit : www.hansmonthly.in
मूल्‍य : 250 रूपये वार्षिक, 5000 रूपये आजीवन

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