Monday, November 30, 2009

राजस्‍थानी संस्‍कृति और राजस्‍थान से परिचय : रतन जी जैन का कमाल

राजस्‍थान या इससे छूते अंचल से कोई व्‍यक्ति बाहर जाता है तो उसे पहचान मिलती है- मारवाड़ी। उसे मिलने वाला यह संबोधन बरसों पुरानी पहचान को दर्शाता है। एक लम्‍बे संघर्ष को याद करने के प्रति विवश करता है। वह संघर्ष जो राजस्‍थान की अकाल ग्रस्‍ता भूमि में जन्‍मने के बाद यहां के निवासियों ने सीखा। यहां जीवन को परम् सत्‍ता माना गया है। अकाल हो या कोई विभीषिका, जीवन बचाना पहला सूत्र वाक्‍य होता है। जीवन बचाने के लिए अपने स्‍थाई ठिकाने, घर आदि को त्‍याग दिया जाए तो कोई परवाह नहीं। तभी तो यहां कहा जाता है कि 'नर है तो घर है।' मतलब यदि नर जिंदा रहा तो वह फिर से घर का निर्माण कर लेगा, अगर संकटों में आत्‍मविश्‍वास त्‍याग कर जीवन से पलायन कर लिया गया तो फिर क्‍या विकल्‍प बचेगा।
इसी जीवन के प्रति उत्‍साह की सीख का ही परिणाम था कि राजस्‍थान के लोग अकालों में पलायन कर जाया करते थे। जहां दो पैसे का रोजगार और अपनापन दीखता, वहीं जा ठहरते। जमकर मेहनत करते और संचय कर अपने देश में फिर से स्‍थापित होने के सपन संजोते। ऐसी हालातों में उसे नाम मिलता 'मारवाड़ी'।
आज दूसरे प्रांतों में मारवाड़ी को समृ‍द्ध के रूप में जाना जाता है। कुछ भ्रांतियां भी बनी और संचय वृत्ति के कारण हेय का भी जोड़ हुआ परंतु, चिकीर्ष का उत्‍कट उदाहरण बना मारवाड़ी।
इसी परम्‍परा का निर्वाह करते हुए एक शख्‍स से इन दिनों मेरा वास्‍ता पड़ा है। ये हैं, पडि़हारा (चूरू) राजस्‍थान के श्री रतन जैन। श्री रतन जैन हिन्‍दी में मासिक 'मारवाड़ी डाइजेस्‍ट' निकालते हैं। अंतरजाल की खंगाल के बीच से न जाने कहां से रतनजी हाजिर हो उठे, संवाद सार्थक रहा और परिणति हुई- मेरे हाथ में मारवाड़ी डाइजेस्‍ट के अंक आने के रूप में।
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट का सितम्‍बर, अक्‍टूबर और नवम्‍बर- 2009 अंक मुझे डाक से मिलते हैं। मेरे लिए यह सुखद अनुभूति के पल होते हैं। अपनी व्‍यस्‍तता को नजर अंदाज करते हुए मैं अंकों को पलटता हूं तो उनमें खो सा जाता हूं।
यह विरल से सघन में जाने का माध्‍यम नजर आता है मुझे। अपने ही पड़ोस से निकलने वाली पत्रिका का यह दूसरा वर्ष होता है और ये अंक दूसरे वर्ष के 5,6 व 7वां अंक होते हैं।
सितम्‍बर-2009 का अंक 2 वर्ष का 5वां अंक है। सबसे पहले इसी को खंगालता हूं। 'डाइजेस्‍ट क्‍लब' के रूप में संरक्षक और विशिष्‍ट सदस्‍य, सम्‍मानित सदस्‍य की एक लम्‍बी फेहरिस्‍त पाकर मन संतुष्‍ट होता है कि पत्रिका थमेगी नहीं। मजबूत आधार जुटना किसी भी पत्रिका के लिए अनिवार्य होता है और यह आधार रतनजी जैसे कुछ लोग ही जुटा पाता हैं। मुझे यहां स्‍मरण हो आता है, राजस्‍थानी की निकलने वाली एक मासिक पत्रिका का, जो बड़े उत्‍साह से और बड़ी साज-सज्‍जा से निकली लेकिन, दो-चार अंकों के बाद धड़ाम हो गई। ' डाइजेस्‍ट क्‍लब' के भरोसे कहा जा सकता है कि ऐसा इस पत्रिका के साथ नहीं होने वाला।
सितम्‍बर के अंक में ललित आलेख, स्‍वास्‍थ आलेख, कहानियां, धारावाहिक उपन्‍यास, सरस कविताएं आदि अनुक्रम के भाग हैं। स्‍थाई स्‍तम्‍भों में बिन्‍दु-बिन्‍दु सिन्‍धु, जोग लिखी, मानसी, राजस्‍थली, प्राच्‍य भारती, समाचार हैं।
इस अनुक्रम से ही जाना जा सकता है कि पत्रिका का स्‍तर कैसा होगा, निश्चित रूप से रतनजी की सूझबूझ काबिले तारीफ है।
अक्‍टूबर के अंक में डॉ. तारादत्‍त निर्विरोध, ताराचंद आहूजा, अक्षय जैन, डॉ. मनोहर गोयल, वैद्य रायचंद शर्मा, संपत सरल, सोनी सांवरमल, सुधा भार्गव, श्‍यामसुंदर सुमन आदि की रचनाएं उन्‍हीं स्‍तम्‍भों के साथ आती हैं। अंक में धारावाहिक उपन्‍यास 'दशानन' (सीताराम महर्षि) गति पकड़ता नजर आता है।
नवम्‍बर का अंक साध्‍वी संघप्रभा, ललित शर्मा, प्रीति स्‍वर्णकार, डॉ. गिरीश गुप्‍ता, डॉ. विष्‍णु भूतिया, डॉ. पंकज शर्मा, लक्ष्‍मीनारायण रंगा, योगिता यादव, संगीता सेठी, राकेश सैन आदि की रचनाओं से श्रेष्‍ठ बन पड़ा है।
पत्रिका का खास बात यह है कि अंक प्रति अंक 'डाइजेस्‍ट क्‍लब' में तीनो प्रवृत्ति के सदस्‍यों की संख्‍या बढ़ती जाती है। वहीं नवम्‍बर के अंक से एक अच्‍छी पहल है कि समाजसेवा के प्रति समर्पण करने वाले दानवीर का परिचय देने का क्रम भी बना है। इस अंक में ललित शर्मा ने दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़ का परिचय प्रस्‍तुत किया है।
पत्रिका की रचनाओं में हर पहलू से यह प्रयास किया गया है कि उनमें राजस्‍थान की संस्‍कृति और राजस्‍थान से पाठक का परिचय हो। राजस्‍थान से बाहर रहने वाले मारवाड़ी परिवारों की उन संतानों के लिए यह पत्रिका बहुउपयोगी है, जिनका जन्‍म राजस्‍थान से बाहर ही हुआ हो। इस पत्रिका के माध्‍यम से वे अपने पुरखों की धरती से जुड़ सकते हैं, उनके बारे में जान सकते हैं।
पत्रिका का एक पहलू और सुनहरा हो सकता है, यदि इसमें राजस्‍थानी भाषा में रचनाओं की मात्रा कुछ बढाई जाए। इससे भाषाई मोह भी पाठकों में आएगा। अपनापन बढ़ेगा।
ऐसी अच्‍छी पत्रिका के लिए मैं रतनजी जैन को साधुवाद देता हूं और उम्‍मीद करता हूं कि यह स्‍तर बनाए ही नहीं रखें बल्कि, इसमें उत्‍तरोत्‍तर गुणवत्‍ता लाते जाएं।

पत्रिका : मारवाड़ी डाइजेस्‍ट मासिक
आवृत्ति : मासिक
संपादक : रतन जैन
प्रकाशक : मारवाड़ी डाइजेस्‍ट प्रकाशन
ज्ञान भारती मार्ग,
पडि़हारा-331505 चूरू
राजस्‍थान
फोन 01567-240217, 9829442520
मूल्‍य : 150 रूपये वार्षिक, 15 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ : 34 + 4
e-mail : marwaridigest@gmail.com
visit : www.marwaridigest.blogspot.com

1 comment:

  1. patrika tak pqhunchane ke liye blogger ko thanks...

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