Friday, December 4, 2009

चामत्‍कारिक साधना : गोविन्‍द अग्रवाल का कमाल


राजस्‍थान को इतिहासकारों की आधारभूमि कहा जाए तो कोई अतिशयो‍क्ति नहीं होगी। यहां के वीर योद्धाओं ने नित नवीन इतिहास पेश किया। उन्‍होंने इतिहास को अपनी मर्जी से रचा। यही वजह रही कि मराठों के बाद गर्वीले इतिहास की झांकी राजस्‍थान में ही मिलती है। राजस्‍थान इतिहासकारों का पसंदीदा क्षेत्र रहा है।
राजस्‍थान ने सिर्फ सुनहरा इतिहास ही नहीं दिया, विद्वान इतिहासकार भी दिए हैं। इनमें चूरू के डॉ. दशरथ शर्मा और गोविंद अग्रवाल का नाम प्रमुखता से है।
श्री गोविंद अग्रवाल ने आंचलिक इतिहास लेखन की परंपरा में मिसाल कायम कर अपने को जीते-जी अमर क‍र लिया। अपने बड़े भाई श्री सुबोधकुमार अग्रवाल व साथियों के साथ मिलकर उन्‍होंने लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान 'नगरश्री', चूरू का गठन किया। बड़ा भाई ऐतिहासिक तथ्‍यों के संग्रहण में लगा तो छोटे भाई गोविंद ने कलम संभाली। गोविंदजी की तीक्ष्‍ण दृष्टि की बदौलत नगरश्री से अनेक इतिहास के प्रकाशन हुए, जो अखिल भारतीय स्‍तर पर सराहे गए। नगरश्री की पत्रिका 'मरूश्री' को तो आज भी याद किया जाता है।
नगरश्री के बेहतरीन प्रकाशनों में सर्वोपरि है- 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास'। यह सन् 1974 (रामनवमी, 2031 वि.) को प्रकाशित हुआ। उस वक्‍त पुस्‍तक का मूल्‍य पचास रूपये रखा गया था।
चूरू मण्‍डल का शोधपूर्ण इतिहास' में इतिहासकार डॉ. रघुवीरसिंह की विद्वतापूर्ण भूमिका है। अध्‍यायवार विभाजन में 21 अध्‍यायों का विस्‍तृत खाका सामने रखकर महत्‍वपूर्ण काम किया।
अध्‍याय-1 परिचयात्‍मक विवरण, अध्‍याय-2 प्राक् ऐतिहासकि काल, अध्‍याय-3 ऐतिहासिक काल, अध्‍याय-4 चौहान-राज्‍य, अध्‍याय-5 चौहानों के स्‍थानीय ठिकाने, अध्‍याय-6 चौहानों के प्रमुख ठिकाने, अध्‍याय-7 जाट-जनपद, अध्‍याय-8 राठौड़ राज्‍य (प्रारंभ से राव रणमल तक), अध्‍याय-9 राठौड़ राज्‍ (रावत कांधल से ठा. बणीर तक), अध्याय-10 राठौड़ राज्य (ठा.मालदेव से ठा. भीमसिंह तक), अध्याय-11 राठौड़ राज्य (ठा.कुशलसिंह से ठा. धीरतसिंह तक), अध्याय-12 राठौड़ राज्य (ठा. हरीसिंह), अध्याय-13 राठौड़ राज्य (ठा. शिवजीसिंह), अध्याय-14 राठौड़ राज्य (ठा. पृथ्‍वीसिंह), अध्याय-15 राठौड़ राज्य (ठिकाणा कूचोर, चूरू वाला /बणीरोतों के अन्‍य ठिकाने), अध्‍याय-16 चूरू मण्‍डल के अन्‍य ठिकाने, अध्‍याय-17 चारण व उनके ठिकाने, अध्‍याय-18 धर्म और सम्‍प्रदाय, अध्‍याय-19 भाषा, लिपि, साहित्‍य और शिक्षा, अध्‍याय-20 वाणिज्‍य व्‍यवसाय एवं लेन-देन, अध्‍याय-21 समाज और संस्‍कृति।
पांच सौ से अधिक पृष्‍ठों में समेटा गया यह इतिहास आंचलिक इतिहासों में सर्वोपरि है। खास बात इस इतिहास की यह है कि इसके तथ्‍यों की प्रामाणिकता इतनी है कि किसी भी विद्वान द्वारा आज तक अंगुली नहीं उठाई जा सकी। चूरू मण्‍डल के लिए यह न केवल थाती है बल्कि उसके सुनहरे पन्‍नों की पुनरावृत्ति है।
अफसोस सिर्फ इतना है कि यह कृति अब अप्राप्‍य है और पुनर्प्रकाशन की कोई नजदीकी संभावना नहीं है। इतिहासकार श्री गोविंद अग्रवाल अब अपने पुत्रों के पास कर्नाटक में स्‍वास्‍थ्‍य लाभ ले रहे हैं जबकि उनके अग्रज श्री सुबोधकुमार अग्रवाल स्‍वर्गवासी हो चुके हैं। हालांकि नगरश्री ट्रस्‍ट अभी भी सक्रिय है और हो सकता है इस सक्रियता के बीच इस महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक के पुनर्प्रकाशन का कोई रास्‍ता निकल आए। आमीन।

1 comment:

  1. aap ne likha itihaskar shree govind agarwal ke bare me kafi kam h, m chahata hu in ke bare me kuch detail me schitr like, aap ki web site saharniy h. rajiv agarwal

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