Sunday, December 6, 2009

इन दिनों की खुराक तैयार

अभी आज ही डाक से मेरे पास दो पत्रिकाएं पहुंची हैं। पहली है भारतीय ज्ञानपीठ से श्री रवीन्‍द्र कालिया के संपादन में निकले वाली मासिक 'नया ज्ञानोदय' और दूसरी है सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. की श्री हरिनारायण के संपादकत्‍व वाली मासिक 'कथादेश'। दोनों ही पत्रिकाओं के दिसम्‍बर-2009 अंक हैं।
इन दोनों को इन दिनों में ही मुझे मनोयोग से पढ़ना है। तब कुछ लिख पाउंगा, बहरहाल, पढ़ने की सबसे पहले ललक 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित एक रचना के प्रति है। शायद वह ललक आपमें भी होगी, वह रचना है- महात्‍मा गांधी कृत 'हिन्‍द स्‍वराज' कृति। नया ज्ञानोदय के दिसम्‍बर-2009 अंक में 'हिन्‍द स्‍वराज' की अविकल प्रस्‍तुति की गई है। नया ज्ञानोदय के पृष्‍ठ 87 से लेकर 113 तक।


पत्रिका : नया ज्ञानोदय
आवृत्ति : मासिक
संपादक : रवीन्द्र कालिया
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ
18, इंस्टीट्यूशनल एरिया,
लोदी रोड, पो.बॉक् नं.-3113,
नई दिल्ली-110003
फोन : 011-24626467, 24654196
e-mail : nayagyanoday@gmail.com
मूल्‍य : 30 रूपये प्रति अंक, 300 रूपये वार्षिक
पृष्‍ठ : 120 + 4
वहीं 'कथादेश' का अनुक्रम भी अपनी ओर खींचने वाला है। परंतु, प्रथम रचना के रूप में इस अंक में मैं श्री गिरिराज किशोर का आलेख ' विष्णुजी के बेटे अतुल की डायरी पढ़ते हुए' को लेना चाहूंगा। ओमप्रकाश वाल्मीकि का 'मेरी कविताओं का आन्तरिक यथार्थ' का स्थान दूसरा
होगा। हर हमेस की तरह सत्यनारायण की 'यायावर की डायरी' तो खंगालनी ही खंगालनी है।
पूरा अंक चाटने के बाद क्या विमर्श उभरता है, चर्चा करेंगे।
पत्रिका : कथादेश
आवृत्ति : मासिक
संपादक : हरिनारायण
प्रकाशक : सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि.,
सी-52/जेड-3, दिलशाद गार्डन,
दिल्ली-110095
फोन : 011-22570252
e-mail : kathadeshnew@gmail.com, kathadeshsahyatra@hotmail.com
मूल्‍य :
पृष्‍ठ : 98 + 4


दो पुस्‍तकों के प्रति मोह :-

पिछले कुछ समय से भागमभाग ऐसी रही कि एक-दो बेहतरीन पुस्‍तकें पढ़ने से छूट गया। वैसे तो जीवन में भी यही भागमभाग बनी रहती है, न जाने क्‍या-क्‍या छूट जाता है। कॉलेज के दिनों से ही मन में था कि महाश्‍वेता देवी का '1084वें की मां', चतुरसेन शास्‍त्री का 'गोली', रवीन्‍द्रनाथ टैगोर का 'गोरा' उपन्‍यास पढ़ूंगा, आगे चलकर शिवाजी सावंत के 'महामृत्‍युंजय' की अभिलाषा बनी। परंतु, उपलब्‍धता का अभाव कहें या प्रयास की कमी, ये अब तक छूटे पड़े हैं। जिंदगी करीने से सजी मिलने से रही, और उसकी सजावट में तल्‍लीनता ऐसे खेल खिलाती है कि सबकुछ छूटता चलता है।
ऐसे ही छूटने वाली पुस्‍तकों में दो पुस्‍तकों को बड़ी हिम्‍मत के साथ आलमारी में से उठाकर मेज पर ला पटका है। अब शायद ही ये छूट सकें। इ‍न दिनों में इन पर ही धावा रहेगा। ये पुस्‍तकें राजस्‍थानी व हिन्‍दी के ख्‍यातनाम हस्‍ताक्षर श्री नंद भारद्वाज की हैं- 'आगे खुलता रास्‍ता' (उपन्‍यास) व 'बदळती सरगम' (राजस्‍थानी कहानी संग्रह)। श्री भारद्वाज साहब का स्‍नेह रहा कि उन्‍होंने वक्‍त पर एक-एक प्रति सादर प्रेषित की। मगर अफसोस, कि मैं उनको अब तक पढ़ न पाया। खैर -----
अब दृढ़ निर्णय के साथ पुस्तकें सामने हैं। पढ़ने के बाद ही चर्चा समीचीन होगी। वैसे 'आगे खुलता रास्ता' श्री नंदजी के पूर्व प्रकाशित राजस्थानी उपन्यास 'साम्ही खुलतो मारग' का हिन्दी अनुवाद एवं पुनर्सृजना है। श्री नंदजी को इस राजस्थानी उपन्यास पर ही केन्द्रीय साहित् अकादेमी पुरस्कार मिला था।
'बदळती सरगम' राजस्थानी कहानियों का संग्रह है। इसमें कुल 10 कहानियां हैं। नंदजी का कहानियों पर काफी काम है और बड़ी मात्रा में उनकी कहानियां भी हैं पिछले ही वर्षों में नेशनल बुक ट्रस् ऑफ इंडिया से राजस्थानी कहानियों का 'तीन बीसी पार' नाम से संपादन कर नंदजी ने काफी ख्याति बटोरी थी। श्री नंद भारद्वाज की 'बदळती सरगम' क्या बदलाव पेश करती हैं, चर्चा करेंगे।
पुस्‍तक : आगे खुलता रास्‍ता
लेखक : नंद भारद्वाज
विधा : उपन्‍यास
प्रकाशक : रचना प्रकाशन
57, नाटाणी भवन, मिश्रराजाजी का रास्‍ता,
चांदपोल बाजार, जयपुर-302001
संस्‍करण : 2009
ISBN : 978-81-89228-64-4
मूल्‍य : 200 रूपये
पृष्‍ठ :224

पुस्‍तक : बदळती सरगम
लेखक : नंद भारद्वाज
विधा : राजस्‍थानी कहानी
प्रकाशक : रचना प्रकाशन
57, नाटाणी भवन, मिश्रराजाजी का रास्‍ता,
चांदपोल बाजार, जयपुर-302001
संस्‍करण : 2009
ISBN : 978-81-89228-63-7
मूल्‍य : 200 रूपये
पृष्‍ठ : 176

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