Sunday, November 29, 2009

दलित का बयान

हिन्दी साहित् में वाद और विमर्शों का दौर सदैव से ही रहा है। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, छायावाद और भी जाने क्या-क्या। यही हाल उत्तर आधुनिक युग के साहित् का है। यहां नारी विमर्श और दलित विमर्श की धूम है। जल विमर्श तीसरा मोटा विमर्श है। भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के बीच रचा गया साहित् इन मुद्दों पर कहां तक खरा उतरा है, यह बात अलग है परंतु, यह सत् है कि इन विमर्शों के बहाने उस वर्ग को प्रमुखता जरूर मिली है जो आज तक साहित् में एक भांति हाशिए पर था।
दलित विमर्श में दलित तबके की पीड़ाओं और दंशों का दिग्‍दर्शन है। अज्ञान के अंधकार में शोषित होता यह वर्ग धर्म-पाखण्‍ड के जाल में ऐसा उलझा की नीच कर्म को अपनी नियति मानता रहा। शिक्षा का वास्‍ता ऐसी परिस्थितियों में होना असंभव ही था। यह तो भला हो बाबा साहेब अम्‍बेडकर जैसे महापुरूषों का कि उन्‍होंने इस तबके का ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश दिखाया। जैसे ही शिक्षा का प्रसार हुआ, हकों का भान स्‍वाभाविक था। हक पहचाने पर आज तक होते आए शोषण का विशद विवेचन तो होना ही था। और ऐसे ही विशद विवेचन के बीच से नाम निकला- दलित विमर्श।
मराठी से पैदा हुआ दलित विमर्श आगे चलकर दो धाराओं में बंटता है- दलित द्वारा लेखन, दलित के लिए लेखन। स्‍वयं द्वारा भोगी पीड़ाओं का वर्णन और दूसरे द्वारा भोगी पीड़ा का अहसास, ये दो भेद व्‍यापक स्‍तर पर किए गए।
इन दिनों मेरे पास 'बयान' नामक पत्रिका नियमित आती है। बयान के संपादक हैं- मोहनदास नैमिशराय। समकालीन हिन्‍दी साहित्‍य में नैमिशराय का नाम प्रमुखता से स्‍थापित हुआ है। 'अपने-अपने पिंजरें' के दो भाग आज भी नैमिशराय को अन्‍य दलित लेखकों से अलग करते हैं।
बयान के अंकों में साहित्यिक भूचाल हो कुछ ऐसा तो नहीं हैं लेकिन ऐसा साहित्‍य जरूर है जिससे मानसिक भूचाल पैदा होता है। प्राय: दलित लेखकों की आत्‍मानुभूति परक रचनाओं के साथ राजनीति, विश्‍लेषण, भाषा, समीक्षा आदि के नियमित कॉलम बयान में समाहित रहते हैं। कार्यक्रम जो दलित और दलित साहित्‍य पर केंद्रित होते हैं, की विस्‍तृत रपट, सबको जोड़े रखती है। साक्षात्‍कार के बहाने आत्‍म मंथन किया जाता है और प्रेरणा चिह्न छोड़ते हुए आगे बढ़ा जाता है।
बयान का नवम्‍बर-2009 अंक 4थे वर्ष का अंक है। कुल मिलाकर यह 40वां अंक। रूपचंद गौतम व मनीषा दहिया का सहायक संपादन मेहनत को दर्शाता है। नैमिशराय इन दिनों शिमला के राष्‍टरपति भवन में यहां हैं। वहां से संपादन का जिम्‍मा बखूबी निभाना लक्ष्‍य के प्रति समर्पण दिखाता है।
इस अंक में रत्‍नकुमार सांभरिया का विश्‍लेषण 'कफ़न का सच' व विमर्श के बीच 'राजनीति में साहित्‍यकार की हैसियत' सनसनीखेज हैं। कहानियों और कविताओं का मिश्रण पत्रिका के साहित्‍य स्‍वरूप को निखारता है। वहीं हर रचना के माध्‍यम से एक दलित अपने को प्रकट करता हुआ नजर आता है तभी तो एक मायने में कहा जा सकता है कि यह पत्रिका दलित का बयान है। दलित दस्‍तावेज है।
मोहनदास नैमिशराय को साधुवाद।

पत्रिका : बयान
आवृत्ति : मासिक
संपादक : मोहनदास नैमिशराय
प्रकाशक : बयान मासिक
बी.जी. 5ए/30-बी, पश्चिम विहार,
नई दिल्‍ली-110063
फोन 011-25268414, 42316106, 9350862298
मूल्‍य : 10 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ : 58 + 4

1 comment:

  1. Namaste Bhai saheb..
    aapne blog meai bahut saari achi jaankariya sanjokar rakhi hai. wakai me aapne in jaankariyo ko dusrotak pahunchane or sahitya ko aage badhane me ek acha priyaas kiya hai.

    meri or se aapko nav varsh ki hardik subhkamnaaye. Kaushal Dadhich, Compucom

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