Wednesday, December 2, 2009

जुगलजी का जागरण : सेठियाजी का स्‍मरण

राजस्थानी भाषा में नियमित निकलने वाली मासिक पत्रिका कोई है तो वह है- माणक
माणक का यह 29वां वर्ष है। पत्रिका के संपादक-स्वामी श्री पदम मेहता हैं, जबकि सहायक संपादक हैं श्री जुगल परिहार। श्री जुगल परिहार राजस्थानी के स्थापित रचनाकार हैं और वर्षों से माणक को अपनी सेवाएं दे रहें हैं। जुगलजी की सेवाएं निश्चित रूप से माणक के लिए सौभाग् की बात हैं। उनकी लगन और मेहनत काबिले तारीफ होती हैं। पत्रिका के लिए आने वाली हर एक रचना के साथ वे मेहनत करते हैं और भाषाई सुधार के साथ शानदार गैटअप में प्रस्तुत करते हैं। मेरे पास राजस्‍थानी की कई और पत्रिकाएं भी आती हैं लेकिन माणक में जो बात है, वह उनमें कहां? और यही कारण है कि मात्र रचनात्‍मक और संपादक के रूप में जानते हुए मैं उनका मुरीद हूं। कभी-कभी सोचता हूं कि राजस्‍थानी भाषा के पास 5-7 जुगलजी होते, तो आज राजस्‍थानी का समकालीन दौर दूसरे ढंग का ही होता। खैर-----।
29वें वर्ष का 11वां अंक नवम्बर-2009 के रूप में पाठकों के समक्ष आया। राजस्‍‍थानी के महाकवि पद्मश्रीकन्हैयालाल सेठिया ‍को समर्पित है, पहली पुण्‍य तिथि पर। राजस्‍थान के सुजानगढ़ (चूरू) में 11 सितम्‍बर, 1911 को जन्‍में सेठियाजी का 11 नवम्‍बर, 2008 को कोलकाता में निधन हुआ।
सेठियाजी की राजस्‍थानी में रमणियां रा सोरठा, मींझर, गळगचिया, कूंकूं, लीलटांस, धर कूंचां धर मजलां, सतवाणी, सबद, अघोरी काळ, मायड़ रो हेलो, दीठ, कक्‍को कोड रो, लीकलकोळिया, हेमाणी आदि अनेक काव्‍य-कृतियां सामने आई। राजस्‍थानी में इन कृतियों के माध्‍यम से वे अमर रहेंगे।
सेठियाजी का 'धरती धोरां री----' गीत तो राजस्‍थान का सिरमौर गीत है। मेरा मानना है कि अगर सेठियाजी मात्र यह एक गीत ही लिख पाते तो भी वे अमर थे।
सेठियाजी की हिन्‍दी में भी अनेक पुस्‍तकें आईं। वनफूल, अग्निवीणा, मेरा युग, दीपकिरण, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्‍ते, प्रतिबिम्‍ब, प्रणाम, मर्म, अनाम, निर्ग्रंथ, स्‍वगत, देह-विदेह, आकाशगंगा, वामन-विराट, निष्‍पत्ति, श्रेयस आदि पुस्‍तकें हिन्‍दी साहित्‍य की थाती हैं। इन रचनाओं के अलावा भी उनकी अनेक रचनाएं हैं। उर्दू भी उन्‍होंने सृजन किया।
राजस्‍थान से जब माउण्‍ट आबू व सिरोही को सरदार पटेल ने गुजरात में शामिल कर लिया तब सेठियाजी ने जमीनी लड़ाई लड़ी और उन्‍हें फिर से राजस्‍थान में शामिल करवाया। राजस्‍थान के जल आंदोलन और हरिजन उद्धार के कार्यों में सेठियाजी सर्वोपरि रहे। देश की आजादी के लिए उनकी कलम ने जागृति पैदा की। उनकी पुस्‍तक जब्‍त की गई। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्‍हें स्‍वतंत्रता सेनानी माना गया, हालांकि उन्‍हें आजीवन पेंशन नहीं ली।
ऐसे ही सेठियाजी पर माणक का अंक निकलना निश्चित रूप से सराहनीय है। संपादक पदमजी मेहता का संकल्‍प और सहायक संपादक जुगलजी की मेहनत की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
इस अंक में डॉ. लक्ष्‍मीमल सिंघवी, जयप्रकाश सेठिया (सेठियाजी के सुपुत्र), बालकवि बैरागी, लक्ष्‍मीनिवास झुंझुनूवाला, जुगलकिशोर जैथलिया, बसंतकुमार-सरला बिड़ला, राधा भालोटिया का व्‍यक्तित्‍व के प्रति रचनात्‍मक सहयोग है, वहीं डॉ. भगवतीलाल व्‍यास, डॉ; मूलचंद सेठिया, डॉ. सेयद महफूज हसन रिजवी का कृतित्‍व के प्रति रचनाकर्म है। पदम मेहता द्वारा लिए गए 2 साक्षात्‍कार हैं, जिनमें एक तो 28 साल पहले (जून, 1981) माणक में प्रकाशित भी हुआ था।
अंक में जुगलजी की तीक्ष्‍ण दृष्टि के कारण सेठियाजी की प्रत्‍येक कृति का आवरण और चुनिंदा रचना एक-एक पृष्‍ठ में सज्जित हैं। वहीं सेठियाजी के जीवन की झांकी प्रस्‍तुत करते 4 पूरे पृष्‍ठ फोटो के हैं। आलेखों के बीच-बीच में भी फोटूएं दी गई हैं, जो पृष्‍ठ सज्‍जा को द्विगुणित करती हैं।
पूरा अंक संग्रहणीय बन पड़ा है। राजस्‍थानी साहित्‍य में सेठियाजी के योगदान पर काम करने वाले शोधार्थियों के लिए तो यह अंक एक वरदान है। इतनी साधना और मेहनत तो जुगलजी ही कर सकते हैं।
अंक में शामिल रचनाएं कुछ पुरानी और पूर्व-प्रकाशित भले ही हों, जुगलजी का जागरण ही सेठियाजी का स्‍मरण कराने में सफल रहा है। माणक इससे बेहतर और क्‍या कर सकता था, बधाई।

पत्रिका : माणक
आवृत्ति : मासिक
प्रकाशक : माणक प्रकासण
जलते दीप भवन
जालोरी गेट, जोधपुर-342003
फोन : 0291-2612900,2435896
e-mail : info@manak.org
visit : www.manak.org
शुल्‍क : 201 रूपये वार्षिक, 20 रूपये एक प्रति
पृष्‍ठ :
66

3 comments:

  1. आपका ब्लॉग देख कर बेहद प्रसन्नता हो रही है.

    कृपया अपने ब्लॉग के बारे में chhithajagat.in तथा blogvani.com को बताएं. हजारों हिन्दी ब्लॉगर आपके स्वागत को तैयार है.

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