Tuesday, February 16, 2010

माय नेम इज़ ख़ान

त्‍वरित टिप्‍पणी
किसी मित्र का संदेश मिला कि फिल्‍म 'माय नेम इज़ ख़ान' बेहतर फिल्‍म है, आप देखना न भूलें। अकसर मैं फिल्‍मों से दूर रहने वाला इंसान हूं, फिल्‍मी की नाटकीयता मुझे कम ही पचती है। यथार्थ फिल्‍मों का युग नहीं रहा और कलात्‍मक फिल्‍मों की संख्‍या बहुत कम हो गई, इस बीच नई तकनीक और नए ट्रेंड (देह दर्शन) के बीच असहज होना स्‍वाभाविक है।
आमिर ख़ान की गत वर्षों की सक्रियता मुझे जरूर भाति है, यही वजह है कि 'ग़ज़नी' के बाद सिनेमा हॉल जाना ही नहीं हुआ। चूंकि असरदार मित्र के इतने ठोस वक्‍तव्‍य के कारण मैं प्रभावित हुए बिना न रह सका।
स्‍थानीय श्‍याम छविगृह में फिल्‍म 'माय नेम इज़ ख़ान' ही लगी हुई है।




फटाफट कॉलेज के दिनों के सहपाठी-समीक्षक तथा नवचयनित आर..एस. भाई उम्मेद गोठवाल को याद करता हूं। गोठवाल स्थानीय राजकीय लोहिया कॉलेज में व्याख्याता के रूप में हिंदी पढ़ा रहा होता है। मेरा प्रस्ताव उसे कुछ अटपटा लगता है। मैं दृढ़ निश्चय प्रकट करता हूं तो कार्यक्रम बन ही जाता है। साथी हरिसिंह भी फिर साथ होना ही होता है।
मध्‍यांतर तक हम मौन रहते हुए फिल्‍म को देखते जाते हैं परंतु, मध्‍यांतर बोलने को विवश करता है और श्रेष्‍ठ नहीं का संवाद कायम होता है। लेकिन अंतिम राय बनना अभी असंभव था, क्‍योंकि अभी आधा सफ़र ही तय हुआ था।
शेष सफ़र भी तय होता है और एक शब्‍द में कहूं तो हमें फिल्‍म से 'निराशा' ही होती है। आम दर्शक वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करने वाला साथी हरिसिंह तो फिल्‍म देखने के निर्णय को ही बचकाना करार दे देता है और घोषित कर देता है कि महज तीन घंटें की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं। उसे यह भी मलाल रहता है कि फिल्‍म में निर्माता ने बड़ी ही सावधानी से सहभागी के रूप में ढेर सारे लोगों को जोड़कर अपनी लागत का कुछ हिस्‍सा बटौर लिया और शेष राशि का तगादा हमसे करता चलेगा।
समीक्षक बंधु कुछ संजीदा होते हैं, विषय की नब्‍ज टटोलते हैं और संयमित शब्‍दों में नामवर बनते हुए घोषित करते हैं कि विषय के साथ तो न्‍याय किया गया है लेकिन विषय अनावश्‍यक है। अमेरिका की 9/11 की घटना से अनेक प्रभावित हुए, इस प्रभाव का एक पक्षीय बयान और वह भी फिल्‍मीकरण क्‍या संदेश संप्रेषित करेगा।
मैं भी उनकी इस बात से सहमत होता हूं। मैं मानता हूं कि मज़हब और जातीय विद्वेष एक मानसिक विकृति है और यह प्रगति में सदैव बाधक रही है। परंतु, उसे ऐसे ढंग से उठाकर समाज और खासकर भारतीय हिन्‍दी दर्शकों के मानस पटल पर क्‍या संदेश छोड़ना चाहते हैं निर्माता-निर्देशक।
धार्मिक आडम्‍बरों के बीच फिल्‍मीस्‍तान भी आडम्‍बरयुक्‍त हो चला है और भारतीय समुदायों की भावना को भुनाकर पैसे बटोरना उसने आसानी से सीख लिया है। मैं करण जौहर को इस कला का सिरमौर घोषित कर दूं तो शायद मेरे तीन घंटें की सार्थकता सिद्ध हो जाएगी।
कथा का ताना-बाना और संरचना कहीं से फिल्‍म को चलने वाली घोषित नहीं करते। यह दीगर बात है कि इसमें शाहरूख ख़ान ने पात्र का किरदार बड़ी ही मेहनत से निभाया है और अपने अभिनय कौशल में श्रीवृद्धि करते हुए दाद बटोरी है। काजोल का अभिनय भी दमदार है। अवस्‍था का आभास पूरी फिल्‍म में काजोल पर कहीं हावी नहीं होता। शाहरूख की हकलाहट ने इस फिल्‍म में भी पीछा नहीं छोड़ा। गीत-संगीत से कमजोर इस फिल्‍म को देखने के बाद '3 इडियट्स' देखने की लेटलतीफी भी और बढ गई।
क्‍या वाकई आपको मेरे जैसा अनुभव नहीं होता ?
मुझे तो फिल्‍म देखकर सिनेमा हॉल से निकलने के ठीक 3 घंटें बाद ऐसा ही महसूस होता है।

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