Saturday, February 20, 2010

कभी आपका ऐसी जगह से वास्‍ता पड़ा है ?

इन दृश्‍यों को आप ध्‍यान से देखिए। मुझे आज सुबह-सुबह इन सबसे रू-ब-रू होने का अवसर मिला।


आप सोच रहे हैं कि इन में ऐसी क्‍या खास बात है ? आम गृहस्‍थ के यहां ऐसे दृश्‍य मौजूद रहते हैं, यही ना।
जी हां, यह सही है कि इस आर्थिक युग की आपाधापी के बीच आम गृहस्‍थ ऐसे ही दृश्‍य अपने इर्द-गिर्द संजो पाता है। टूटी छप्‍परिया, लकड़ी-लकड़ी जोड़कर जलता हुआ चूल्‍हा और टूटने के कगार पर आने के बाद भी करीने से सजाई गई कुर्सी, यही तो सब कुछ है इन चित्रों में।

आज सुबह-सुबह चूरू जिला मुख्‍यालय पर 'नया बास' नाम से स्‍थापित कॉलोनी में मेरा जाना हुआ। प्रसंग भले ही कुछ रहा हो पर इन दृश्‍यों को देखकर मन गर्व से भर उठा और मेरा कैमरा इनको कैद करने के लिए आतुर हो उठा। क्‍योंकि यही वह पहलू है जहां से मैं बात शुरू कर सकता हूं।

मेरी दिन की शुरूआत स्‍थानीय अख़बार पढ़ने से होती है। या यूं कहूं कि प्रात:काल में ढेरों अपराध और छापों की कार्रवाई के ‍तथ्‍य-संग्रहण-पुलिंदे बांचने की प्रक्रिया से गुजरता हुआ स्‍वयं को तरोताजा करता हूं। आम भारतीय मानस शायद स्‍वयं को इसी ढंग से तरोताजा करता होगा। अपने इर्द-गिर्द होने वाले इस ढंग के व्‍यापार के बीच स्‍वयं को तोलता होगा और अपने रास्‍ते बनाने का संकल्‍प लेता होगा।
मेरे इस छोटे से शहर में भी मेरी भांति लोग सोचते होंगे, शायद।
आज के ही अख़बार में मेरे इस छोटे से शहर की ख़बर है कि वाणिज्‍य कर विभाग की कार्रवाई में एक सेनेटरी व टाइल्‍स की फर्म से पौने दो लाख का जुर्माना वसूला गया है। इस ढंग की और भी ख़बरें इस शहर से आए दिन आती रहती हैं। इन ख़बरों का यहा जिक्र करना वाजि़ब है, क्‍योंकि इन ख़बरों के पीछे एक शाश्‍वत सत्‍य मौजूद है और वह सत्‍य है राजनीतिक संरक्षण।
इस उजले युग में उजली माया के मोहपाश में हर कोई बंधा है। माया-मोहपाश के अलावा कोई दूसरा पाश उसे बांध न सके इसी वजह से हरेक राजनीति रूपी हथियार को अपने इर्द-गिर्द रखता है। और बटोरता चलता है वह सबकुछ जो शायद अंतिम छोर पर बैठे उस आम आदमी का हिस्‍सा है, जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
मैं भी चूंकि इस राजनीति का छोटा-सा भाग रहा हूं अतएव आए दिन 'कुछ लाभ उठाओं' जैसी सलाह का सामना करता रहता हूं। मैं समझ नहीं पाता हूं कि क्‍या यह सलाह शाश्‍वत सत्‍य है। मैं कभी-कभी स्‍वयं को कमजोर भी महसूस करने लगता हूं कि सब कह रहें हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे इसका मतलब हम पीछे हैं।
लेकिन जो संदर्भ मैंने आज सुबह-सुबह पकड़ा उसमें बड़ी शक्ति है।
यह प्रलाप बीच में ही छोड़कर उसी संदर्भ पर आते हैं-

ज़नाब, आपने उक्‍त छायाचित्रों को भली-भांति निहार लिया होगा। अगर नहीं तो संदर्भ बता दूं उससे पहले एक बार फिर से निहार लें।

जी, ये दृश्‍य मेरे जिला चूरू के एक प्रखर और धुरंधर राजनेता के घर के हैं। यह राजनेता 5 बार विधायक और एक बार जिला प्रमुख रह चुका है।
चौंकिए मत, यथार्थ पर आइए।

यह प्रखर राजनेता आज अपनी 80 वर्ष की वय में आम गृहस्‍थ की भांति जीवन को बड़ी ही गरिमा से जी रहा है। संसाधनों का अभाव भले ही हो परंतु चेहरे का ओज और मन का तेज आलोकित है और इनके कारण संसाधनों की आभा फीकी-सी लगती है।

एक बार विधायक बनने के बाद भारतीय लोकतंत्र इस कदर मेहरबान हो जाता है कि न्‍यारे-व्‍यारे ही बदल जाते हैं। आर्थिक पैमाने शिखर मापने लगते हैं। अगर यह सुनहरा अवसर 5 बार मिल जाए तो फिर चाहिए ही क्‍या, दुनिया के हर कोने में बंगले मिलना अनिवार्य हो जाता है।

लेकिन ईमान ?

भला वे राजनेता ऐसा थोड़े ही कह सकते हैं - ''इस प्रकार मैं सन् 1967 में तीसरी बार विधानसभा का सदस्‍य बना ----- सन् 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस बहुमत में नहीं आ सकी अत: सरकार बनाने में बड़ी परेशानी हुई-------विधानसभा को कुछ समय के लिए सस्‍पेंड कर दिया गया ------- बाद में सुखाडि़या जी के नेतृत्‍व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ- फिर भी स्थिति डांवाडोल थी सो कुछ विधायकों को शामिल करने के प्रयास किये जा रहे थे।
सुखाडि़या का संदेश-
मेरे पास भी सुखाडि़या जी का संदेश लेकर श्री फूलचंद जैन - जो सुजानगढ़ से चुनाव हार गये थे एवं श्री मनफूलसिंह भादू विधायक सूरतगढ़ आये और कहा कि सुखाडि़या जी चाहते हैं कि मैं उनके मंत्रीमंडल में शामिल हो जाऊं अत: मैं यह प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लूं - मंत्री बनने से इलाके में अच्‍छा विकास कर सकोगे।
मेरे सामने यह परीक्षा की घड़ी थी एक तरफ राजस्‍थान में पांच साल मंत्री बनना और दूसरी तरफ जनता ने जिस भावना से वोट दिये थे, उनकी भावना की रक्षा करना - सो मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि जनता की भावना की कद्र करूंगा और पांच साल विपक्ष में बैठकर ही जन सेवा करता रहूंगा - अत: मैंने उक्‍त महानुभावों को मंत्री बनने के लिए ना कर दिया ------- ''

यह शख्‍स चूरू विधानसभा से 1957 में प्रथम बार विधायक बना। जिला परिषद्, चूरू का प्रथम जिला प्रमुख बना। सन् 1962 राजगढ़ से विधायक बना। सन् 1967 में छापर से विधायक बना। सन् 1972 में पुन: छापर से विधायक बना। सन् 1977 में सुजानगढ़ से विधायक बना।

अपने ईमान से कभी नहीं डिगा और पैसे के लिए राजनीति से घृणा की। ईमानदारी से जीवन यापन और मतदाताओं के प्रति ईमानदारी पूर्वक व्‍यवहार।

चिंतन और क्रिया में कोई अंतर नहीं।

क्‍या आपको इस शख्‍स श्री रावतराम आर्य पर गर्व नहीं होता ?

2 comments:

  1. दौलत के लिए हर उसूल को ताक पर रख देने वाले नेताओं ही नहीं, हर क्षण बहती गंगा में हाथ धो लेने के लिए तत्पर आज के दौर के हर एक आदमी के गाल पर तमाचा है रावतराम जी जैसे लोगों की ईमानदारी और निष्ठा। निसंदेह इन लोगों के मन में एक जज्बा था और समाज के लिए काम करने का जुनून था। आज एक चुनाव में प्रत्याशी मात्र रहा आदमी भी ताजिंदगी ऎश से बसर करने का जुगाड़ कर लेता है। इन सादगी, निष्ठा और ईमानदारी को बनाए रखने के लिए जिस आत्मबल और साहस की जरूरत होती है, वह आत्मबल अपने भीतर लगातार संजोए रखने के लिए, वह साहस लगातार बनाए रखने के लिए बधाई के पात्र हैं रावतराम जी...
    इस प्रेरणास्पद प्रस्तुतिकरण के लिए आपको भी साधुवाद...

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  2. सच में ये तो बहुत ही गर्व की बात है!!!कृपया रंग संयोजन सही कीजिये ..टिप्पणी पढ़ी नहीं जा रही है..

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