Friday, February 26, 2010

बाल साहित्‍य की सुध ली साहित्‍य अकादेमी ने

किसी भी भाषा का विस्‍तार तीव्र गति से तभी हो सकता है जब वह भाषा प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी हो। स्‍कूल में बच्‍चा पहुंचते ही घर में अपनी मां से सीखी भाषा को न छोड़े और उसी में पढ़ते हुए आगे बढ़े तो ठाठ ही निराले होते हैं। लेकिन यह खुशकिस्‍मती कुछ भाषाओं तक ही है।

हमारी भाषा राजस्‍थानी को संवैधानिक मान्‍यता नहीं है और यह प्राथमिक शिक्षा की भाषा का सम्‍मान पाने से दूर है। यह दीगर बात है कि दसवीं व उसके बाद की कक्षाओं में एक भाषा के रूप में इसका चुनाव किया जा सकता है, लेकिन यह भी सत्‍य है कि तब तक आते-आते मातृभाषा लिखने की क्षमता से विद्यार्थी जुड़ा नहीं रह पाता।
राजस्‍थानी लिखना शायद आज 80 प्रतिशत राजस्‍थानियों के लिए संकट बना हुआ है। कारण कि उनका लिखने की शुरूआत के बाद इस काम से वास्‍ता ही नहीं पड़ा। कभी-कभी तो पाठकों से ऐसे संवाद स्‍थापित होते हैं कि राजस्‍थानी में पहली दफा आपकी पुस्‍तक देखी। उनका दूसरा वाक्‍य होता है कि वास्‍तव में राजस्‍थानी पढ़ी नहीं जाती।
यहां दो सवाल उठते हैं, पहला महत्‍वपूर्ण हैं। वह यह कि राजस्‍थानी में लिखा, राजस्‍थानी लोगों की पहुंच में नहीं है। दूसरा भी कम महताऊ नहीं है कि राजस्‍थानी पढ़ी नहीं जाती।
राजस्‍थानी लोगों तक पुस्‍तकें पहुंचे भी कैसे, जब लेखक स्‍वयं जोड़-तोड़ करके पुस्‍तक की मात्र 500 प्रतियां ही मुश्किल से छपवा पाता है। कहां से लाए लेखक पैसा ?
दूसरा यह कि राजस्‍थानी पढ़ी भी कैसे जाए, जब हमने कभी इसका अभ्‍यास ही नहीं किया।
इसका एक विकल्‍प है-

स्‍कूल की पढ़ाई में भाषा नहीं, मगर बाल साहित्‍य के रूप में बच्‍चों को राजस्‍थानी साहित्‍य की पुस्‍तकें उपलब्‍ध हों तो निश्चित रूप से बच्‍चों का मोह राजस्‍थानी से होगा और वे भाषा को पढ़ने में पारंगत होंगे।
यह काम एक मिशन के रूप में लिया जा सकता है।
परंतु, विडम्‍बना यह रही कि अधिकतर साहित्‍यकार बाल साहित्‍य को हेय समझते रहे।
मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर और भी न जाने कितने नाम हैं जिन्‍होंने बाल साहित्‍य विपुल मात्रा में सृजित किया। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने तो नोबेल पुरस्‍कार मिलने के बाद भी बाल साहित्‍य लिखा। हमें उन पर गर्व होना चाहिए।

बाल साहित्‍य खासकर राजस्‍थानी का बाल साहित्‍य काफी उपेक्षित रहा है। राजस्‍थानी बाल साहित्‍यकारों के अंगुलियों पर गिने जाने वाले नाम सामने हैं। और जो नाम सामने हैं उनका कभी अकादमी एवं निजी मंचों से यथोचित सम्‍मान नहीं किया गया। राजस्‍थानी में बाल साहित्‍य के नाम पर मुझे दो पुरस्‍कार ध्‍यान में आ रहे हैं- एक, राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर का 'जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्‍य पुरस्‍कार' और दूसरा निजी 'चंद्रसिंह बिरकाळी पुरस्‍कार'।
खुश खबरी-

अब इसमें एक तीसरा नाम और जुड़ने जा रहा है। जी हां, यह खुशख़बरी है- साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली ने हाल ही में फैसला किया है कि वह सभी 24 भाषाओं में बाल साहित्‍य के लिए एक पुरस्‍कार शुरू करेगी। पुरस्‍कार की राशि 51 हजार रूपये नगद होगी।

अब साहित्‍य अकादेमी की तरफ से राजस्‍थानी सहित सभी 24 भाषाओं में प्रत्‍येक भाषा के लिए तीन पुरस्‍कार हो गए। पहला- साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार (एक लाख रूपये), दूसरा- अनुवाद पुरस्‍कार (51 हजार रूपये) और तीसरा- बाल साहित्‍य पुरस्‍कार (51 हजार रूपये)।

क्‍या साहित्‍य अकादेमी की यह पहल स्‍वागत योग्‍य नहीं ?


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