Friday, February 26, 2010

एक पाती यह भी

मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे किसी विषय पर मुझसे लिखना हो जायेगा।

किसी काम को गलत होते देखते हैं तो दो ढंग की प्रतिक्रियाएं होती हैं। पहली, उसकी निंदा करना और दूसरी, उन गलतियों या कमियों से कुछ सीखते हुए स्‍वयं बेहतर करना। मैं देखने का दूसरा ढंग काम में लेने का प्रयत्‍न करता हूं। और वह ढंग मुझे भाता भी है।

किसी भी सही या गलत को देखकर मानव-मन में भाव उत्‍पन्‍न होने स्‍वाभाविक है। सही को देखकर प्राय: सभी आनंदित होते हैं। गलत तो गलत होता ही है। यहां लिखने का विषय यही है।
मुझे कोई बात गलत लगती है तो मैं स्‍वयं प्रयास करता हूं कि कम से कम यह गलती मैं नहीं करूंगा।
कभी-कभी गलत करने वालों से लड़ना भी पड़ता है और एक संकल्‍प के रूप में उस काम को लेना पड़ता है। कम से कम हमारा पहला कदम होता है कि गलत करने वालों को अपने काम के बूते पर गलती का अहसास कराना। न कि निंदा करके।

मुझे बहुत से काम अपने इर्द-गिर्द के अच्‍छे नहीं लगते। फिर भी, मैं चाहते हुए उनको नहीं रोक सकता। आलोचना करना भी सार्थक नहीं होता, क्‍योंकि सबकी अपनी-अपनी दृष्टि होती है। जो मुझे गलत लग रहा है, हो सकता है वह बहुमत की दृष्टि में सही हो।
ऐसी हालात में मुझमें एक शक्ति उत्‍पन्‍न होती है और वह शक्ति बचपन की उस सीख की बदौलत है, आप जो चाहते हैं वह स्‍वयं करके दिखाओ। दूसरों की तरफ क्‍यों ताकते हो।
और भगवान की मेहरबानी व शरीर के साथ की वजह से आज तक सब अनुकूल होता रहा है।
यह खुशकिस्‍मती है।

छात्रसंघ में और साहित्‍य अकादेमी के परामर्श मंडल के दौर में सब अनुकूल हुआ या हो रहा है, यह जरूरी नहीं। लेकिन कुल कितने काम ऐसे हैं जो आपकी बदौलत हुए और वो सही हैं।

गलत हो रहा है तो उसे अवश्‍य रोकना चाहिए।
गलत को रोकने का प्रयास करना सराहनीय है परंतु, ऐसा करते-करते व्‍यक्ति कभी स्‍वयं भी गलत करने लग जाता है।
यही बात इन दिनों हो रही है। एंटीवायरस जरूरी हैं लेकिन वायरस के रूप में विकसित होना गलत।
भाई नीरज दईया की प्रतिभा का मैं कायल हूं। व्‍यक्तिश: प्रशंसक भी। लेकिन यहां बात रखने से पूर्व इस बात को परे रखूंगा।

मैं साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के राजस्‍थानी एडवायजरी बोर्ड का सदस्‍य हूं। ---- 1/10वां भाग।
अतएव साहित्‍य अकादेमी के राजस्‍थानी बाबत निर्णय पर यश-अपयश का भागी हूं।

विजयदान देथा, चंद्रप्रकाश देवल, मालचंद तिवाड़ी और मेजर रतन जांगिड़। इन सबके बीच में कुंदन माली, के.के. शर्मा और श्री हरीश भादानी
यह व्‍यूह ही रहा है चर्चा का केंद्र।

इसमें कई लोगों के विचारों की छोंक लगती रही। बुरा न माने छोंक स्‍वादिष्‍ट के लिए ही लगाई जाती है।

बिज्‍जी,सीपी, मालचंद व रतन जांगिड़ में से कौन कितने पानी में हैं, हम सभी जानते हैं। साहित्‍य अकादेमी की निर्णय प्रक्रिया से भी हम सब वाकिफ़ हैं। और यह तय भी है कि हममें से कुछ रचनाकार इसमें भागीदार भी रहे हों।

मेजर जांगिड़ का रचनाकर्म किसी से अछाना नहीं है। मैं व्‍यक्तिगत रूप से उन्‍हें जानता हूं और उनके साहित्‍य को पढ़ा भी है परंतु, यहां चर्चा जरूरी नहीं है।

जरूरी यह समझना है कि निर्णायकों की प्रक्रिया से गुजरकर साहित्‍य अकादेमी ने पुरस्‍कार घोषित किया है , वह गलत है या सही।
यहां कुछ बंधु सवाल उठा रहे हैं क‍ि मेजर जांगिड़ को गलत पुरस्‍कार मिला है, यह पुरस्‍कार हरीश भादानी को मिलना चाहिए था।

क्‍यों भई ?

मेजर रतन जांगिड़ की कृति कमजोर है और हरीश भादानी की कृति मजबूत। इसीलिए ना।
या फिर इसलिए कि हरीश जी का राजस्‍थानी में बहुत ज्‍यादा काम है और मेजर का काम कम।

आलोचकों से मेरा सीधा-सा एक सवाल है। कोई साहित्‍य अकादेमी की पैरवी करना नहीं। या संयोजक और निर्णायक मंडल के तेल लगाना नहीं।
पहली बात यह कि हरीश भादानी की कृति 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' जितने लोगों ने पढ़ी उनमें से कितने लोग यह सही मानते हैं कि अकादमिक पुरस्‍कार के लिए इस कृति की रचनाएं साहित्‍य अकादेमी तंत्र के लिए उपयुक्‍त हैं ?
सरकारी अकादमियों के अपने मानदण्‍ड होते हैं और अपनी बाध्‍यताएं।
बुद्धिजीवी पाठक बता पाएंगे कि इस पुस्‍तक में कितने व्‍यक्तियों पर सीधे प्रहार हैं ?
और यह भी बता पाएंगे कि ऐसे प्रहारों के बीच क्‍या यह पुस्‍तक सरकारी तंत्र के पुरस्‍कार के लिए पात्र थी ?
दूसरी बात यह जानना भी वाजिब है कि भादानी जी बीकानेर के रहने वाले थे और बीकानेर में ही स्‍थापित राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी ने उनका कितना सम्‍मान किया ? इस राज्‍य अकादमी ने पुरस्‍कार तो दूर की बात, इसी पुस्‍तक 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' को पांडुलिपि सहयोग देने से भी इंकार कर दिया था। आखिर क्‍यों ? तब भादानी जी जीवित भी थे, यह विरोध क्‍यों नहीं किया गया, जो आज किया जा रहा है ?
तीसरी, यह कि पुस्‍तक 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के पिछले साल के पुरस्‍कार के समय भी निर्णायकों के सामने थी, तब भी उसको पुरस्‍कार नहीं मिला। क्‍या पिछले साल के तीनों निर्णायक भी गलत थे ?

अगर ये सारे निर्णय गलत हैं तो निस्‍संदेह इस साल के निर्णायकों का निर्णय गलत है।


(मैंने हरीशजी की यह पुस्‍तक पढ़ी है और संयोग रहा है कि हरीश जी से चर्चा भी हुई थी, इस बाबत। कुछ टूटे-फूटे शब्‍दों में उनकी बात-
हरीश जी कमला गोइन्‍का साहित्‍य पुरस्‍कार लेने चूरू आए थे। जब मैंने यह सवाल उठाया तो उनका जवाब था‍ कि मुझे सत्‍य लिखने से कोई नहीं रोक सकता। मुझे पुरस्‍कारों की चाह नहीं। यह पुस्‍तक प्रकाशित होते समय भी कई साथियों ने सुझाव दिए थे कि पुस्‍तक के ये विवादास्‍पद अंश हटा दो, तो मैंने एक स्‍वर में कहा था कि मैं कोई अकादमिक पुरस्‍कार हेतु कृति प्रकाशित नहीं कर रहा। ये मेरी रचनाएं हैं जिन्‍हें मैंने जीया है। उन्‍होंने कहा कि कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन का पुरस्‍कार मुझे इसलिए मिल गया कि यह निजी पुरस्‍कार है, सरकारी होता तो यह भी नहीं मिलता। और मैं मिलने की अपेक्षा भी नहीं करता।)

ऐसी सूरत में एक स्‍वर्गीय साहित्‍यकार श्री हरीश जी के नाम का अमलीजामा पहनाकर साहित्‍य अकादेमी के पुरस्‍कार को आड़े हाथों लेना कम से कम मुझे नहीं सुहाता।

और यह भी नहीं सुहाता कि इस मामले को लेकर किसी को फलाणचंद-ढिकड़चंद कहा जाए।
चंदगिरी तो इसी में है कि हमें जिन चंदों से नफरत है, जिनके कामों से घृणा है, जिनके कामों के प्रति विरोध है उनके कामों से श्रेष्‍ठ काम करके मिसाल पैदा की जाए।

आलोचना-प्रत्‍यालोचना का यह दौर समय-बर्बादी का हिस्‍सा है। और मैं मानता हूं कि इस समय में बेहतर काम किया जा सकता है। जहां संभावनाएं होती हैं वहीं निवेदन संप्रेषित किया जाता है। आशा है निवेदन समझा जाएगा।

रही बात भादानीजी की, अगर उनको साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार मिलता तो मुझे भी खुशी होती। लेकिन यह तय है किसी पुरस्‍कार की प्राप्ति और बिछोह से व्‍यक्ति छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरस्‍कार व्‍यक्ति को नहीं, व्‍यक्ति पुरस्‍कार को सम्‍मानित करता है, बशर्ते वह व्‍यक्ति पुरस्‍कार का वास्‍तविक हकदार हो। बहुत से ऐसे महान् साहित्‍यकार हैं जो पुरस्‍कारों से वंचित रहते हुए भी आज अमर हैं और पुरस्‍कार प्राप्‍तकर्ताओं से ज्‍यादा चर्चित हैं। भादानीजी से मिलना और बतियाना हम जैसे रचनाकारों के लिए अपने-आप एक सम्‍मान-पुरस्‍कार की बात थी। ऐसे में, उन्‍हें विवादों में नहीं घसीटा जाना चाहिए।

खैर.... साहित्‍य अकादेमी के कामों का विस्‍तृत लेखा-जोखा दिसम्‍बर, 2012 (वर्तमान एडवायजरी बोर्ड का कार्यकाल) के बाद प्रस्‍तुत करेंगे। कितना सही हुआ, कितना गलत, आप बताना जरूर।


हां, चलते-चलते याद आया। एक अख़बार आया था मेरे पास, उसमें मीन राशि वालों ने बाल साहित्‍य पर पुरस्‍कार देने की राय प्रकट की थी, मैं कूट भाषा नहीं समझता परंतु, यह जानता हूं कि मैं भी मीन राशि वाला हूं। कृपया इस विषय में मेरी इससे पहले वाली पोस्‍ट जरूर पढें।


3 comments:

  1. प्रिय भाई, बात पते की है.. मगर जिन ....चन्दजी की बात आप कर रहे हो, उक्त कृति को पुरस्कार न मिलने की सर्वाधिक पीड़ा तो उन्हें ही है. उन्होंने कुन्दनजी को जो फटकार लगाई और सार्वजनिक घोषणा की कि भविष्य में वे उनकी मित्रता के लायक नहीं रहे.. इस बारे में भी तो कुछ बोलना था मेरे भाई! पाश के शब्द आपको भी याद दिला रहा हूँ कि 'बीच का रास्ता नहीं होता'..
    ...और राजेश जोशी ने कहा है... 'जो सच सच बोलेंगे, मारे जायेंगे.. खैर, चन्दजी के उद्घोष पर कुछ फरमाएंगे.. यही उम्मीद है.

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  2. आभार।


    बीच के रास्‍ते का प्रश्‍न ही नहीं महोदय।
    लिखा है मैंने, पढें 'एंटीवायरस' में पोइण्‍ट नं. 5,
    वह ऐसा है- ''मेजर के बारे में पूर्व संयोजक की अपनी राय हो सकती है, मैं तो हर एक राजस्थानी में लिखने वाले को महान् मानता हूं। खासकर तब जब भाषा मान्यता के मुद्दे पर संघर्ष कर रही है।''

    सादर

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  3. खम्मा घणी सा,

    जे आप बात रै आखिर में जय राजस्थानी लिखो तो पोस्ट भी राजस्थानी में लगाओ अर टिप्पणी भी राजस्थानी में लिखो तो बात चोखी लागै. आप राजस्थानी रो मान बढाओ.


    आपरो

    अजय कुमार सोनी
    परलीका

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