Saturday, March 20, 2010

यह क्‍या हो रहा है ?

राजस्‍थान विधानसभा का बजट सत्र हंगामें के भेंट चढ़ रहा है। नुमाइंदें बेबुनियादी बहस में उलझ रहे हैं। आरोप-प्रत्‍यारोप का दौर चल पड़ा है। मूल मुद्दे इन सबके बीच कहीं गुम हो गए हैं और बजट की अनुदान मांगें बिना बहस के एक-एक करके पारित होती जा रही हैं। वहीं विपक्ष संगठित होने का दावा करता विधानसभा में अनशन पर बैठा है और मिडिया को नित नए बयान सौंप रहा है।
यह सब क्‍या हो रहा है ?

बात गत बुधवार अर्थात् 17 मार्च से शुरू हुई। विधानसभा सदस्‍य श्री हनुमान बेनिवाल (खींवसर-नागौर, 94141-18677) शून्‍यकाल में स्‍थगन प्रस्‍ताव पर शराब तस्‍करों की बात उठाते हुए सरकार द्वारा उन्‍हें प्रोत्‍साहन देने का आरोप लगाते हुए कहा कि शराब ठेकेदारों के 55 करोड़ रूपये माफ कर दिए गए। और तो और उत्‍तेजित अवस्‍था में बात रखते हुए अलोकतांत्रिक तरीके से सरकार पर भ्रष्‍टाचार का तमगा भी लगा दिया। असंसदीय भाषा का इस्‍तेमाल हुआ और वैल में आकर जमकर हंगामा किया गया। सत्‍ता पक्ष के सदस्‍यों ने श्री बेनिवाल को सदन से बाहर करने की मांग करने लगे। परिणाम स्‍वरूप शाम 4 बजे के लगभग विधानसभा में ध्‍वनि मत से सत्र के शेष अवधि तक के लिए श्री हनुमान बेनिवाल का निलम्‍बन हुआ।
विपक्ष ने इस पर आक्रामक मूड रखा।
श्री हनुमान बेनिवाल के कृत्‍य पर अगले दिन राजस्‍थान के प्रमुख दैनिक राजस्‍थान पत्रिका के संपादकीय में जो लिखा गया वह यहां ज्‍यों का त्‍यों दिया जा रहा है, अब आप ही अंदाजा लगा लिजिएगा-
''--- राजस्‍थान विधानसभा में बुधवार को जो हआ, वह प्रदेश की जनता को शर्मसार करने के लिए पर्याप्‍त है। भाजपा विधायक हनुमान बेनिवाल का बिना किसी आधार सदन में भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाना और तैश में आकर संसदीय मंत्री की सीट तक जा पहुंचना किस संसदीय परम्‍परा का निर्वहन माना जा सकता है ? क्‍या यह उन लाखों मतदाताओं का अपमान नहीं है, जो जनप्रतिनिधियों को अपनी आवाज बनाकर विधानसभा में भेजते हैं। भ्रष्‍टाचार हो रहा है तो उसे रोकना जनप्रतिनिधियों का काम हो सकता है, विधानसभा में भी मामला उठना चाहिए लेकिन निमय-कायदों के तहत। संसदीय नियमों के तहत मामला उठेगा तो उस पर चर्चा भी होगी और आरोपों के किसी अंजाम तक पहुंचने की उम्‍मीद भी की जा सकती है। लेकिन सिर्फ हंगामा खड़ा करने के लिए आरोप लगाने से क्‍या हासिल होने वाला है ? अखबारों और समाचार चैनलों की सुर्खियां बनना ही अगर मकसद हो, तो ऐसे सदस्‍यों का सदन में क्‍या काम ?
बेवजह हंगामा करने वाले सदस्‍यों को अगर सदन से निलम्बित किया जाता है, तो इसका स्‍वागत करना चाहिए न कि विरोध। भाजपा नेता यदि बेनिवाल के आचरण को गलत मानते हैं, तो उनके निलम्‍बन का विरोध क्‍यों कर रहे हैं ? यह दोमुंहा आचरण क्‍यों ? पक्ष के साथ-साथ विपक्ष को भी यह ध्‍यान रखना होगा कि नियम और कानून से ऊपर कोई नहीं है। सदन की गरिमा पर अगर कोई आंच आती है तो इसकी रक्षा के लिए सम्‍पूर्ण सदन को एकजुटता दिखानी ही होगी। विधानसभा की राजनीति और विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ की राजनीति को एक तराजू पर रखकर नहीं तोला जा सकता। विधायकों को अपने अधिकार के साथ दायित्‍वों को भी समझना होगा।''
सनद रहे कि श्री हनुमान बेनिवाल राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर के छात्रसंघ अध्‍यक्ष रहे हैं। यह राजस्‍थान के छात्र नेताओं का सौभाग्‍य ही है कि वक्‍त-वक्‍त पर जनता ने उनका साथ दिया है। यह इसी से सिद्ध हो जाता है कि वर्तमान में श्री राजेन्‍द्र राठौड़ (98292-48999), कालीचरण सर्राफ (93140-43888), राजकुमार शर्मा(94133-49994), महेन्‍द्र चौधरी (94140-70312) आदि विधायक है और ये सभी राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ के अध्‍यक्ष रहे हैं। इन सबके अलावा भी छात्र राजनीति से आए कई और विधायक भी राजस्‍थान की वर्तमान 13वीं विधानसभा में सदस्‍य हैं।

श्री हनुमान बेनिवाल के निलम्‍बन के विरोध में पूरा विपक्ष खड़ा होता है और संसदीय कार्यमंत्री श्री शांति धारीवाल के खिलाफ नियम 119 के तहत निंदा प्रस्‍ताव लाता है।
जलदाय मंत्री, राजस्‍थान सरकार श्री महिपाल मदेरणा (94141-34600) दूसरे दिन जब अनुदान मांगों पर चर्चा का प्रस्‍ताव रख रहे थे तो विपक्ष के विधानसभा सचेतक श्री राजेन्‍द्र राठौड़ ने वही सब किया जो उनको नहीं करना चाहिए था।
श्री राठौड़ के खिलाफ जलदाय मंत्री को बोलने से रोकने के प्रयास को आधार बनाकर सत्‍ता पक्ष निलम्‍बन प्रस्‍ताव लाया और उन्‍हें एक साल के लिए विधानसभा से निलम्बित कर दिया गया।
गतिरोध फिलहाल भी जारी है।

राजस्‍थान में हो रहा यह घटनाक्रम हमें क्‍या संकेत दे रहा है ? हम और हमारे जनप्रतिनिधि किस ओर जा रहे हैं?

राजस्‍थान पत्रिका के उसी संपादकीय के हवाले से बात को समाप्‍त करता हूं- ''आज निलम्‍बन और कल निलम्‍बन वापस लेने से सदन में ऐसे 'हादसों' को बढ़ावा मिलेगा।''
फिर क्‍या विकल्‍प हो सकता है ?


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