Monday, March 22, 2010

मिनखां री माया

आप बूझ्यो,
जे मिनख
इण भौम माथै नीं हुवै
तो
कांई फरक पड़ै ?

ठा नीं थानै सुण्यो कै नीं सुण्यो
म्हैं साफ कैयो है कै

फरक क्यूं नी पड़ै , पड़ै सा
मिनख नीं होंवतो तो
कठै सूं होंवता नित नुंवा प्रयोग
आभै नै नापण री सगति
चांद माथै घर बसावण री ताकत
पांणी नै भेदण री छिमता

अर सो-कीं इज क्यूं
कठै होंवती
मिनख नै जीवावण जोग चिकित्सा पद्धति
नाक-कान-होंठ सो'वणा करण री सर्जरी
कोख मांय पळता टाबरां नै पिछाणण री दीठ
अर कठै होंवतो
दुवाइयां रो लाम्बो-चौड़ो कारबार
सड़कां रो जाळ, गाड्यां री भीड़

आप मानो चायै नीं मानो
भौम माथै
मिनख होवणो सो-कीं होवणो है
क्यूं कै
मिनख नीं होंवतो तो कठै हो नाज
कठै ही पकावण री कळा
अर कठै ही मिट्ठै भोगां री
एक लाम्बी पंगत


आप भासाई हिमायती हो
छिणेक सोचो
मिनख नीं होंवता तो
कठै होंवती थारी भासा
कठै होंवती मानता री बात
अर
कुण उठावंतो आठवीं अनुसूची मांय जोड़ण रो मुद्दो

इज नीं मानो तो
इबकै आपनै हामळ भरणी पड़सी
क्यूं कै आप लोकतंत्र रा हिमायती हो
जद लोक नीं होंवतो तो
तंत्र कठै बणतो

इण खातर म्हारो तो मानणो है कै
मिनख नीं होंवतो तो
कीं नीं हुंवतो

म्हारै आपरै विचारां कारण
कीं फरक नीं पड़ै
क्यूं कै म्हैं जाणूं कै आप कैवणो चावो हो
कै

जे मिनख नीं हुंवतो तो
जंगळां री हुंवती कटाई
जिनावरां रो होंवतो ब्यौपार
अर पांणी रै होंवतै खात्मै
जेड़ा अलेखूं संकट
आज जाबक ई नीं होंवता

विश्‍व जल दिवस, 22 मार्च

2 comments:

  1. कथाकार दुलाराम सहारण को तो हम जानते हैं, लेकिन आप इतनी बेहतर कविता कर सकते हैं, यह मालूम नहीं था। आपको बधाई और शुभकामनाएं...
    इस मुक्त धारा का नाम ही सृजनधर्मिता है, सृजन किसी भी बंधन को नहीं मानता और मानना भी नहीं चाहिए, जो जी में आया कह दिया, जो जी में आया लिख दिया, यही सच्चे सृजन की गति और दिशा है...
    आदमी की करतूतों को बेहतर पर्दाफाश किया है आपने... बधाई.

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