Wednesday, March 31, 2010

साहित्‍यकार रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली से पहली और आखरी मुलाकात

राजस्‍थानी साहित्‍य की अकूत क्षमता को हम बड़े गर्व से बखान करते हैं। प्राचीन एवं मध्‍यकाल की स्‍वर्णिम आभा के बीच हम वर्तमान युग का जब गौरव गान कर रहे होते हैं तो राजस्‍थानी कहानी की समृद्ध परंपरा के बीच श्री रामेश्‍वरदयाल श्रीमाल़ी का नाम अपने-आप ही आ जाता है।
रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली राजस्‍थानी के उन कहानीकारों में शामिल हैं जिन्‍होंने राजस्‍थानी की समकालीन कहानी को विश्‍व कहानी के समक्ष ले जाने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। उनकी कहानियों की अपनी छाप एवं छवि है, जो राजस्‍थानी साहित्‍य कभी विस्‍मृत नहीं कर सकेगा।
यही नहीं श्रीमालीजी ने एक अच्‍छे कवि एवं शायर के रूप में भी पहचान बनाई।

आज सुबह राजस्‍थान पत्रिका में सांसद किरोड़ीमल मीणा और कर्नल किरोड़ीसिंह बैंसला की राजनीतिक खबरों को पार करते हुए आगे बढ़ता हूं तो पृष्‍ठ 15 पर एक छोटी-सी खबर सामने आती है। 'श्रीमाली को पितृशोक' । यह राजस्‍थान पत्रिका ने अपने कर्मचारी के पिता के निधन पर ख़बर लगाई है। मैं अक्‍सर ऐसी ख़बरों को अनदेखा नहीं करता हूं। क्‍योंकि मीडिया से जुड़े लोग अपने-आप में साहि‍त्‍यकारों के करीब होते हैं और उनमें साहित्‍यकार बहुत को अपना कह सकते हैं।
इसी लिए इस ख़बर को बांचता हूं तो सूना-सा हो जाता हूं। मेरे ही परिवार की यह ख़बर होती है। मेरा साहित्यिक परिवार, जिसके मुखियाओं में से एक श्री रामेश्‍वरदयाल जी श्रीमाली के निधन की यह खबर है। श्री प्रमोद श्रीमाली राजस्‍थान पत्रिका के पाली संस्‍करण में उप-संपादक हैं और श्री रामेश्‍वरदयाल जी के सुपुत्र। ख़बर छापने का यही आधार पत्रिका चुनती है।
अभी पिछले दिनों (25 जनवरी, 2010) ही तो श्रीमाली जी से मेरी मुलाकात हुई थी। पहली और आखरी मुलाकात। साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली ने जोधपुर में एक कार्यशाला का आयोजन किया था। श्रीमाली जी के साथ मैं भी उसमें शरीक हुआ था। जयनारायण व्‍यास विश्‍वविद्यालय के गेस्‍ट हाउस में सोफे पर मैं उन्‍हें बैठा देखता हूं और प्रणाम करता हूं। वे पहचानते नहीं हैं और परिचय पूछते हैं।
पहचाने
भी कैसे ? मैं पहली दफा उनसे रू-ब-रू हुआ था। दूरभाष और पत्रों के माध्‍यम से तो हम न जाने कब के परिचित थे। और तो और मुझे साहित्‍यकार रावत सारस्‍वत पर काम करने का जब मौका मिला तब तो मैं श्रीमाली जी के काफी करीब आ गया था, क्‍योंकि श्री रावतजी पर अधिकृत जानकारी देने वाले शख्‍स मात्र श्रीमाली जी ही बचे थे, जो रावतजी के घनिष्‍ठ एवं शार्गिद रहे।
रावतजी पर उन्‍होंने एक पुस्‍तक भी किसी वक्‍त में लिखी थी, उनकी सहृदयता देखिए कि वह पूरी पांडुलिपि मुझे भिजवा दी और कहा कि प्रकाशित करने की योजना बनाओ और प्रकाशित करो।
गेस्‍ट हाउस के सोफे पर बैठते हुए जब मैं उन्‍हें मेरा नाम बताता हूं तो उनका चेहरा खिल उठता है। मैं उनके भाव पढ़ता हूं और स्‍वयं को धन्‍य समझता हूं। मेरे लिए इससे बड़ा और क्‍या सम्‍मान हो सकता है कि वे सोफे से लगभग खड़े हो जाते हैं और कह उठते हैं- ''अरे, आप हो दुलाराम! वाह भई वाह, गजब की शक्ति है आपकी।'' मैं जान जाता हूं कि श्रीमाली कुछ और अतिश्‍योक्ति पूर्ण टिप्‍पणी मेरे बारे में करेंगे इसीलिए मैं बात को दिशा देता हूं और पूछता हूं- ''स्‍वस्‍थ हैं ?'' श्रीमाली जी बड़े उत्‍साह से प्रस्‍तुत होते हैं और सार्थक चर्चा हो जाती है।
इस कार्यशाला के दौरान श्रीमाली का सान्निध्‍य मुझे मिलता है। कार्यशाला की समाप्ति और रवानगी के अवसर पर साहित्‍यकार श्री अशोक जोशी क्रांत, जोधपुर और मैं उनके करीब होते हैं, ये सुखद पल होते हैं।
श्रीमाली जी के हृदय में राजस्‍थानी के लिए कितना प्रेम होता है इसके प्रमाण स्‍वरूप इसी कार्यशाला की एक छोटी-सी घटना का उल्‍लेख करना चाहूंगा- 'राजस्‍थान राज्‍य प्राच्‍य विद्या प्रतिष्‍ठान, जोधपुर के प्रांगण में हम कई लोग खड़े थे और भोजन की तैयारी में थे। कार्यशाला का सत्र समाप्‍त हुआ ही था और बाहर चर्चा का केंद्र बिंदु सत्र में रखे प्रस्‍ताव ही थे। चूंकि कार्यशाला राजस्‍थानी भाषा मानकीकरण पर थी, अतएव सत्र भी उसी से जुड़ा था। मैं साहित्‍यकार श्री किरण नाहटा, बीकानेर से अनुभव बटोर रहा था व राजस्‍थानी के लेखन में जबरन घुसेड़े जाने वाले शब्‍दों पर संवाद कायम कर रहा था। श्री नाहटा जी का अपना मंतव्‍य था, वे तर्क दे रहे थे कि मैं तो यह बदलाव स्‍वीकार नहीं कर सकता, मैं ब्रह्म को बिरम नहीं लिख सकता। तभी बीच में श्रीमाली जी प्रस्‍तुत होते हैं और कहते हैं- ''नाहटाजी, बिरम राजस्‍थानी का अपना प्रयोग है और जो राजस्‍थानी में लिखना चाहेगा उसे बिरम का प्रयोग करना होगा। आप गांवों में जाइये आपको आज भी अनेकों बिरमाराम नाम के आदमी मिल जाएंगे, फिर हम क्‍यों नहीं लिख सकते।'' चर्चा और भी दूसरे शब्‍दों पर भी होती है। लेकिन महत्‍वपूर्ण बात यह रही कि हमें श्रीमाली जी में राजस्‍थानी शब्‍दों के प्रति प्रेम की झलक मिली।'

मेरी श्री रामेश्‍वरदयाल जी श्रीमाली से पहली और आखरी मुलाकात यही जोधपुर की मुलाकात थी।
मंगलवार शाम अर्थात 30 मार्च, 2010 को जब हम राजस्‍थान दिवस पर 'बिना राजस्‍थानी कैसा राजस्‍थान' की बात कर रहे थे तभी एक राजस्‍थानी का प्रबल हिमायती हमें बीच में छोड़कर यकायक यूं चला गया। किसे दु:ख नहीं होगा।
विनम्र श्रद्धांजलि।

इस वक्‍त जालोर में श्रीमाली जी के अंतिम संस्‍कार की तैयारियां हो रही होंगी।
ओम् शांति।

---------------------------परिचय-----------------------------

श्री रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली रो नाम राजस्‍थानी भासा रै कहाणींकारां में ई नीं, आखै भारत में रै ख्‍यातनाम अर टाळवां कहाणींकारां मांय घणै आदर सूं ओळखीजै। श्रीमाली जी री कहाण्‍यां रा हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली, पंजाबी, अर मराठी भासा में उल्‍था हुया। आप राजस्‍थानी रा एकला इसा कहाणीकार है, जिणां री कहाणी साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली सूं छप्‍यै आखै सैकै (शताब्दि 1900-2000) रै टाळवां कहाणींकारां री कहाण्‍यां रै संकलन Indian Short Stories 1900-2000 में भेळीजी।
आपरी कहाणीं 'जसोदा' टलिवीजन सारू फिल्‍मीईजी अर दूरदर्शन रै राष्‍ट्रीय कार्यक्रम में आखै देस में खास वेळा (Prime Timie) में दरसाईजी।
1977 में उणां रै कहाणी संग्रह 'सळवटां' माथै राजस्‍थानी साहित्‍य अकादमी, उदयपुर रो राजस्‍थानी गद्य पुरस्‍कार, 1980 में कविता-संग्रह 'म्‍हारो गांव' माथै साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली रो साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार, 1978 में राजस्‍थान रत्‍नाकर, दिल्‍ली रो 'विण्‍णु हरि डालमिया पुरस्‍कार', 1994 में भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्‍ता सूं 'मरुधारा पुरस्‍कार', 1995 रो मारवाड़ी सम्‍मेलन, बम्‍बई रो घनश्‍यामदास सर्राफ सर्वोत्‍तम साहित्‍य पुरस्‍कार, 1995-96 में राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर रो गणेशलाल व्‍यास उस्‍ताद पद्य पुरस्‍कार, 2001 में बीकानेर रो हजारीमल बांठिया पुरस्‍कार, 2004 में द्वारका सेवा निधि, जयपुर रै कांनीं सूं 'श्रीमती मन्‍नीदेवी जोशी पुरस्‍कार' देय'र श्रीमाली जी रो बहुमान कीनो।
'गुनैगार है गजल' री गजलां, दुष्‍यंत कुमार री गजलां अर 'म्‍हारामीत गंगासिंघ!' हिंदी रै टाळवें कवि 'मुक्तिबोध' रै जोड़ री अर हिन्‍दी काव्‍य 'कौटिल्‍य' हिन्‍दी रै महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रै काव्‍य 'तुलसीदास' रै मुकाबलै गिणीजै।
हाड़ीराणी, बावनौ हिमाळै, कुचमादी आखर, युगदीप अर जाळ पोथ्‍यां श्रीमाली री महताऊ पोथ्‍यां मांय गिणीजै। श्रीमालीजी साहित्‍य अकादमी उदयपुर, राजस्‍थानी भाषा साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी बीकानेर, साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली मांय सदस्‍य रैया। माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्‍थान री पाठ्यक्रम समिति समेत घणै पुरस्‍कारां रै निर्णायक मण्‍डल रा सदस्‍य ई रैया।
'एनसाइक्‍लोपीडिया आव इण्डियन लिटरेचर' लिखण में ई श्रीमाली जी आपरो घणमोलो सैयोग दीनो। श्रीमालीजी राजस्‍थान शिक्षा-सेवा (प्रधानाचार्य पद) सूं सेवानिवृत्‍त हुया अर जालोर रे साक्षरता अभियान में मुख्‍य जिला समन्‍वयक रैया। आपरी वेळा में हुयै साक्षरता रै काम माथै 1999 में महामहिम राष्‍ट्रपति जी रै हाथां सूं जालोर जिला नै घणौ प्रतिष्ठित 'सत्‍येन मैत्रेय पुरस्‍कार' मिल्‍यो। शैक्षणिक शोध अर शिक्षक-प्रशिक्षण बाबत ई आप घणां महताऊ काम करया। राणकपुर आरोग्‍य धाम मानवकल्‍याण संस्‍थान, राणकपुर रोड, सादड़ी, जिला पाली रा आप सचिव रैंवता थकां ई महताऊ काम करया।
(साभार- पोथी 'जाळ' सूं)


10 comments:

  1. हिंदी - राजस्थानी रा वरिष्ठ साहित्यकार श्रद्देय रामेश्वर दयाल श्रीमाली जी रै निधन रो समाचार पढ़ अर दुःख होयो... म्हारी ओर सूं आनै हार्दिक श्रद्दांजलि ....

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  2. भाई दुलाराम जी, बड़ो दुखद समाचार सुणायो। राजस्थानी रै दबंग कहाणीकार अर लूंठै शायर रो यूं अचाणचक जावणो.......
    म्हारी विनम्र श्रद्धांजलि...
    मिलणो-जुलणो होयो हो भोत बारी। वां री आसीसां ई लगोलग मिळती। वां बिनां सूनो-सूनो लागसी मायड़ रो आंगणो.....
    आज रै अखबारां री रीत-नीत भी उजागर हुयी है खबर रै इण तरीकै सूं। ....आपनै लखदाद। मायड़ री साची सेवा करण वाळै साहितकार पर आप कलम चलाई। आपरी सजगता सरावणजोग है।
    -सत्यनारायण सोनी

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  3. हिंदी - राजस्थानी रा वरिष्ठ साहित्यकार श्रद्देय रामेश्वर दयाल श्रीमाली जी रै निधन रो समाचार पढ़ अर दुःख होयो... म्हारी ओर सूं म्हारी विनम्र श्रद्दांजलि ....

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  4. श्रद्धासुमन...

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  5. moklo acraz huyo aa samachar oadhr, pramapita biya ne , shanti deve.

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  6. >>>>> विनम्र श्रद्धासुमन...

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  7. श्रीमाली जी री आत्मा ने भगवान शांति दये अ'र सुरगां विराजे.............. थारो एं बाबत सावचेत रेहनो भी लखदाद रो काम है.
    जीतेन्द्र कुमार सोनी

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  8. राजस्‍थानी साहित्‍य रा एक थम्‍ब हा श्रीमाळीजी, वां रो जावणो राजस्‍थानी नै मोटो नुकसान है।
    भगवान सूं वांरी आत्‍मा री स्‍यांति सारू अरदास।

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  9. jiko in dharti par aayo hai un ne ek din to jaavno hi padsi. o jeevan ro sesu bado saanch hai. in ne koi badal ni sake. pan dukh in baat ro hai ke rajasthani raa eku-ek likhaara mayad bhasha rajasthani ne sanvidhan me thaavi thod deeraavan ri aa aas man me le jaave. kin kin ra naam geenaavu? shrimaliji rajasthani bhasha raa sirmod haa. pan vidhi re vidhaan ne kun taal sake. vaane saachi sardhaanjali aa hi husi ke aapaa mayad bhasha rajasthani re srajan ne aage badhaavaa. puraane loga ri thod abe nuvaa loga ne aage aavno padsi ne srajan re in manch par morcho levno padsi. jai rajasthani.

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  10. श्रीमाली का जाना राजस्थानी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। सम्वेदनाएं................

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