Sunday, April 11, 2010

लोक संस्‍कृति एवं इतिहास की कहानी बयान करता एक आगार

चूरू (राजस्‍थान) के इतिहास से जुड़ी सामग्री का जिक्र आते ही हमें बरबस श्री सुबोध कुमार अग्रवाल एवं श्री गोविंद अग्रवाल का स्‍मरण हो आता है। वह इसलिए की 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' ग्रंथ के मूल स्रोत ये अग्रवाल बंधु ही हैं। इस ग्रंथ की तथ्‍यात्‍मक सामग्री के पठन-पाठन के बाद ही हम इतना जिक्र एवं चर्चाएं कर लेते हैं। इतिहास संचय करते-करते इन बंधुओं का काम स्‍वयं अपने-आप में इतिहास बन गया है। आज सुबोधजी हमारे बीच नहीं हैं और गोविंदजी अपने बच्‍चों के साथ कर्नाटक के कुमारपट्टनम् में रह रहे हैं, परंतु उनका किया गया काम हमारे बीच पुस्‍तकों एवं म्‍यूजियम के रूप में हमारे पास है।
लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान, नगरश्री का संग्रहालय बेजोड़ है। यहां भाड़ंग, पल्‍लू, कालीबंगा, रंगमहल, सोथी एवं करोती के थेहड़ों से प्राप्‍त हजारों वर्षों पुरानी पुरातात्विक सामग्री मौजूद है। वहीं संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों, सिक्‍कों, ताड़पत्रीय प्रतियों, हस्‍तलिखित पुस्‍तकों, बहियों-दस्‍तावेजों आदि का संग्रह है। चूरू को राज्‍य सरकार ने जब हेरिटेज सिटी घोषित किया तो उस स्‍वरूप में नगरश्री म्‍यूजियम भी हेरिटेज सिटी का एक प्रमाण रहा है।
चूरू के मुख्‍य बाजार से सटी इन हवेलियों के बीच पोद्दार हवेली में लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री का स्‍थाई भवन है।
भवन के भीतरी द्वार की बनावट पुरातात्विक दृष्टि से स्‍वय महत्‍वपूर्ण है-
वहीं आंतरिक स्‍वरूप तो और भी बेहतर कल्‍पना लिए हुए है। सभागार में चित्र प्रदर्शनी के रूप में नगर के महापुरूषों, समाजसेवियों, योद्धाओं, साहित्‍यकारों, इतिहासविदों एवं अन्‍यान्‍य विभूतियों के साथ-साथ नगर के प्रमुख स्‍थलों के लगभग 1200 चित्र संयोजित हैं-

सेठ चम्‍पालाल पारख सभागार का यह मदन मंच नगरश्री की शान है। यहां साहित्‍यकार विष्‍णु प्रभाकर, क्षेमचंद्र सुमन, वियोगी हरि, इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा, न्‍यायाधिपति गुमानमल लोढ़ा, राजनेता मधु दण्‍डवते, हरिशंकर भाभड़ा, खेतसिंह राठौड़, उजला अरोड़ा, कुंभाराम आर्य, दौलतराम सहारण, स्‍वतंत्रता सेनानी रघुवर दयाल गोयल, गौरीशंकर आचार्य, पत्रकार-संपादक कप्‍तान दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, हरिदत्‍त शर्मा, गुलाब कोठारी, सिनेगीतकार भरत व्‍यास, अभिनेता बी.एम. व्‍यास, जादूगर शंकर सम्राट सहित अनेक विभूतियों ने विचार व्‍यक्‍त किए हैं।
10 अप्रेल, 2010 को मैं यहां पहुंचता हूं तो नगरश्री के कार्यकारी अध्‍यक्ष डॉ. शेरसिंह बीदावत नगरश्री के संबंध में जानकारियों के साथ स्‍वागत करते हैं-
नगरश्री ट्रस्‍ट के फाउण्‍डर ट्रस्‍टी श्री रामगोपाल बहड़ अपने अनुभव और नगरश्री के विकास क्रम की कहानी सटीक शब्‍दावली के माध्‍यम से बताते चलते हैं तो लगता ही कि सुनते ही जाएं-

आंचलिक इतिहास की परम्‍परा में 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' अपनी साख रखता है। इतिहासकार गोविंद अग्रवाल की दक्षता, तीक्ष्‍णता और श्रम की देश के अनेक विद्वानों ने मुक्‍त कण्‍ठ सराहना की है। वहीं संयोजक, भ्रमणशील, तत्‍वान्‍वेषी सुबोधकुमार अग्रवाल की अनथक यात्राएं नगरश्री म्‍यूजियम के रूप में आज भी अपनी कहानी कहती हैं।

इतिहास ही नहीं लोक संस्‍कृति के उपासक, अन्‍वेषी जनों के लिए भी यह संस्‍थान आज किसी तीर्थ से कम नहीं है।

4 comments:

  1. राजस्थान प्रशासनिक सेवा की तैयारी करते समय श्री दूलाराम जी के सहयोग से चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास पढने का अवसर मिला........ये ग्रन्थ संकलित सूचनाओ की दृष्टि से बेजोङ है। लोक संस्कृति शोध संस्थान नगर श्री न केवल चूरू का गौरव है वरन राजस्थान मे समादृत है। पिछले कुछ वर्षों से चूरू में आयोजित सांस्कृतिक व साहित्यिक कार्यक्रमों का मै दर्शक,श्रोता रहा हूँ.......इस दिशा में श्री दूलाराम जी बधाई व धन्वाद के पात्र है कि उन्होंने चूरू के शुष्क वातावरण में सरसता का संचार किया है।

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  2. नगरश्री निश्चित रूप से अग्रवाल बंधुओं की श्रम-सीकर है। व्‍यक्तिवादी और आर्थिक तंत्र की प्रधानता के बीच कौन कर पाता है आज सार्वजनिक महत्‍त्‍व के काम, बिरले ही लोग। निजी रूप से ऐसा प्रयास करना प्रशंसनीय ही नहीं वंदनीय है।

    मेरे प्रति प्रशंसा, आपका सिर्फ अपनापन।


    करने को तो है बहुत कुछ मीत
    हमने तो अभी
    मंजिल पर कदम रखने का प्रयास भर ही किया है------

    और उस प्रयास में आपका सदैव सहयोग रहा है।
    उम्‍मेदजी को स-आदर।

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  3. अद्भुत कार्य कर रहे हैं आप..!

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