Thursday, April 15, 2010

शिक्षा मंत्री जी जवाब दीजिए

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शिक्षा मेरा अधिकार : मातृभाषा में हो परिष्‍कार
अनिवार्य शिक्षा कानून के पारित होते ही राजस्थान में इन दिनों एक अहम् सवाल सबके सामने खड़ा हो गया है। वह यह है कि राज् में मातृभाषा किसे माना जाए ? चूंकि यह सवाल एक मायने में खड़ा हुआ नहीं है, खड़ा किया गया है। कहने का तात्पर्य है कि राजस्थान के वाशिंदों की मातृभाषा राजस्थानी है। जनगणना के आंकड़े और सारे तथ् इस बात के गवाह रहे हैं। आज भी इस दिशा में कोई सर्वे किया जाए तो इस बात की ताहीद हो सकती है।


2
एक आदमी का बेतुका बयान
फिर यह सवाल कहां से ?
राजस्‍थान सरकार के शिक्षा मंत्री मास्‍टर भंवरलाल मेघवाल ने एक बेतुका बयान देकर पूरे राजस्‍थान के राजस्‍थानी भाषी समुदाय का अपमान कर डाला। उनका कहना था कि ''राजस्‍थान की फिलहाल मातृभाषा हिन्‍दी है।''
इस बयान की जमकर आलोचना हुई। बयान आलोचना होने लायक भी था। बयान की कमजोरी यह 'फिलहाल' भी है। मां और मातृभाषा फिलहाल नहीं स्‍थायी होती हैं। पूछने वाला सीधे से पूछे कि मेघवालजी आपने अपनी मां से कौनसी भाषा सीखी। और तो और आपकी धर्मपत्‍नी ने अपने बच्‍चों को किस भाषा में लोरी सुनाई। और तो और आप जरा यह भी बता दें कि आपके परिवार के सारे सदस्‍य राजस्‍थानी के बिना काम चला लेते हैं ? मैं व्‍यक्तिगत रूप से जानता हूं कि ऐसा नहीं है। घर में हिंदी संवाद कायम कर काम नहीं चल सकता।

सवाल यह भी उठाया जा सकता है कि आप काबीना मंत्री होकर ऐसे बयान दे रहे हैं कि राजस्‍थान की मातृभाषा हिंदी है और वह बयान भी आप राजस्‍थानी भाषा में ही दे रहे हैं। धन्‍य हैं आप !
और सारी बातें एक तरफ, क्‍या आप यह दावा कर सकते हैं कि मातृभाषा हिंदी है और मैं प्रण लेता हूं कि अगले चुनाव में हिंदी में भाषण दूंगा, हिंदी में बात करूंगा और हिंदी में ही मतदाताओं से वोट मांगूगा और कसम खाता हूं कि राजस्‍थानी का एक भी टप्‍पा जुबान पर नहीं लाऊंगा, फिर भी चुनाव जीतकर आऊंगा ?
ऐसा कर सकते हैं तो हम आपके साथ हैं मंत्री जी।

अगर नहीं तो जवाब दीजिए। अपने विभाग को संभालिए और प्राथमिक शिक्षा राजस्‍थानी में प्रारम्‍भ करवाइए।
कानून आपके कहीं आड़े नहीं आ रहा। अनिवार्य शिक्षा कानून में साफ लिखा है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में हो और यह भी बाध्‍यता नहीं डाली गई है कि वह मातृभाषा संवैधानिक मान्‍यता प्राप्‍त हो। फिर देर किस बात की ?

3
एक दैनिक का शानदार प्रयास
राजस्‍थान के एक प्रमुख अखबार 'दैनिक भास्‍कर' ने इस मुद्दे को बखूबी उठाया और शिक्षा मेरा अधिकार नाम से एक शृंखला प्रारंभ की। अख़बार की यह दूरदर्शिता रही कि उसने जनता की हकीकत समझी और उसके साथ मजबूती से खड़ा हुआ। अखबार ने वह किया जो एक संजीदा संपादक वाला पत्र कर सकता है।
जनता में टॉक शो करवाए। आम जन, शिक्षक, भाषाविद, विधायक और मंत्रियों के विचार लिए गए। संपादकीय पृष्‍ठ पर भाषा से जुड़े लोगों के आलेख छपे।
एक दो को छोड़ दें तो सब ओर से यही विचार आया कि राजस्‍थान के अंदर राजस्‍थानी भाषा में ही प्राथमिक शिक्षा दी चाहिए। इससे बच्‍चे स्‍कूल से जल्‍दी जुड़ सकेंगे और जल्‍दी सीख सकेंगे।

4
अशोक गहलोत के लिए अवसर
राजस्‍थान सरकार के पास अब बेहतरीन अवसर है कि वह शिक्षा के साथ राजस्‍थानी को जोड़ सके। राजस्‍थान सरकार के मुखिया राजस्‍थानी के प्रबल हिमायती श्री अशोक गहलोत हैं और ये वे ही अशोक गहलोत हैं जिनक पिछले कार्यकाल में राज्‍य विधानसभा में सर्वसम्‍मत संकल्‍प प्रस्‍ताव पारित किया गया था कि संविधान की 8वीं अनुसूची में राजस्‍थानी भाषा को जोड़ा जाए।
ऐसे मुखिया की सरकार क्‍या ऐसे अवसर को गंवा देगी? बस सोचना यही है।

5
भाषा का त्रिस्‍तरीय फार्मूला
किसी भी वर्ग समुदाय के सर्वांगीण विकास की परिकल्‍पना हम करते हैं तो उसमें सबसे पहली जरूरत जमीन जुड़ाव की होती है। उस वर्ग, क्षेत्र की स्‍थानीय आवश्‍यकताओं को महसूस करने की होती है। यह स्‍पष्‍ट है कि उन आवश्‍यकताओं तक तभी पहुंचा जा सकता है, समझा जा सकता है जब हम उनकी भाषा समझते हों। तभी तो भाषाविद एक मत से स्‍वीकार करते हैं कि भाषा का त्रिस्‍तरीय फार्मूला लागू किया जाना चाहिए। स्‍थानीय भाषा (मातृभाषा), देश की भाषा (राष्‍ट्रीय भाषा) और विश्‍व संपर्क की भाषा (अंतरराष्‍ट्रीय भाषा) का चलन ही प्रगति की ओर ले जाते हुए सार्थक परिणाम दे सकता है।
राजस्‍थान में राजस्‍थानी जाने बिना न तो प्रशासनिक काम किया जा सकता है और न समझ विकसित हो सकती है। गांव का आदमी बचपन से जो बोलता आया है वह क्षणभर में नहीं छोड़ सकता। और जब वह अपनी बात अपनी भाषा में रखता है तथा समझने वाला सामने नहीं है तब हो गया समाधान ?
इसी प्रकार देश के दूसरे प्रांतों में जाकर हम अपनी मातृभाषा में बात करें तो कहां से संवाद कायम होगा, यह हाल दूसरे देश में जाने पर होना है, वहां अंतरराष्‍ट्रीय भाषा काम में लेनी ही होगी।
इसलिए राजस्‍थान में राजस्‍थानी मातृभाषा, हिंदी राष्‍ट्रभाषा और अंग्रेजी अंतरराष्‍ट्रीय भाषा के रूप में पढाई जानी चाहिए।
राजस्‍थानी को भुलाने का उपक्रम किया जाता है तो हम सब राजस्‍थानी भाषा हिमायतियों को एकजुट हो जाना चाहिए। परंतु, यह ध्‍यान रखना चाहिए कि सत्‍ता के गलियारों और निर्णायकों के इर्द-गिर्द की संरचना कैसी है, वहां हमें विरोध से नहीं तर्क से जीतकर आना है। और ऐसे तर्क हमारे पास हैं, बस उन्‍हें बेहतर ढंग से प्रस्‍तुत करने की कला का प्रयोग करना है।

जय भारत। जय राजस्‍थानी।


1 comment:

  1. स्थानीय बोली, भाषा में प्राथमिक शिक्षा का महत्व बहुत है। पर यहाँ तो लोग अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दिलाने को तुले हैं अपने बच्चों को।

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