Friday, April 16, 2010

एक मुख्‍यमंत्री के साथ पांच घण्‍टें

तुम्‍हें एक जन्‍तर देता हूं। जब भी तुम्‍हें संदेह हो या तुम्‍हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ :

'' जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्‍ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा ? क्‍या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्‍या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्‍य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्‍या उससे उन करोड़ों लोगों को स्‍वराज्‍य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्‍मा अतृप्‍त है ?

तब तुम देखोगे कि तुम्‍हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्‍त होता जा रहा है।''
- मोहनदास करमचंद गांधी

14 अप्रेल, 2010 का दिन। जब पूरे भारत में अम्‍बेडकर जयंती मनाई जा रही थी। खासकर राजनेता अपने दलित वोट बैंक को पुख्‍ता करने के सपने बुनते हुए बढ़-चढ़कर उन जयंती समारोहों में अपने को हिस्‍सा बनाने का जी-भर यत्‍न कर रहे थे। दलितोद्धार के लम्‍बे-चौड़े कसीदे पढ़कर स्‍वयं को धन्‍य महसूस करते हुए अम्‍बेडकर के प्रति श्रद्धां‍जलि व्‍यक्‍त कर रहे थे वहीं उनके छुट्टभइयै अपने राजनीतिक अंक बढ़ाने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे थे।

ऐसे
समय में दूसरी तरफ राजस्‍थान में जातिवादी आग उगल रहा था। गुर्जर आरक्षण आंदोलन के राह पर अड़े थे। गुर्जरों का गाजीपुर-खावदा से जयपुर तथा अजमेर से जयपुर कूच हो चुका था। पूरा प्रशासन चाक-चौबंद था। सरकार की प्रत्‍येक क्षण पर नजर थी। थोड़ी-सी असावधानी राज्‍य का माहौल ख़राब करने में सक्षम थी।

ठीक ऐसे ही समय में राजस्‍थान का मुखिया अपने सरकारी आवास पर गांधीवाद के जरिये जातिवाद खात्‍मे पर चिंतन कर रहा था।
मीडिया से एकदम दूर मुट्ठी भर लोगों के बीच। संख्‍या बल के हिसाब से देखें तो 100 से कम लोगों के बीच।

श्री पंकज मेहता, संदीप दिवाकर (कोटा), राजकुमार माथुर, सत्‍यनारायण मीणा (बूंदी), सुश्री मीनाक्षी चंद्रावत, आमिर खान (झालावाड़), कैलाश जैन, निर्मल मतोडि़या (बारां), राजेन्‍द्र सांखला, लीलाराम गरासिया (सिरोही), कैलाशचंद गुप्‍ता, अनुराग शर्मा (टोंक), दुलाराम सहारण, हेमंत धारीवाल (चूरू), पंकज शर्मा, सुधीर जोशी (उदयपुर), शंकर यादव, कपिल भट्ट (डूंगरपुर), दिलीप नेभनानी, पीयूष त्रिवेदी (चित्‍तौड़गढ़), अक्षय त्रिपाठी, राजेश चौधरी (भीलवाड़ा), सुभाष गर्ग, देवेंद्र शर्मा (भरतपुर), शिवचरण माली, नफीस अहमद (करौली), भवानीशंकर शर्मा, नवनीत आचार्य (बीकानेर), राजकुमार गौड़, दिलावर सिंह (गंगानगर), श्रवण तंवर, तरूण विजय (हनुमानगढ़), प्रदीप कुमार आर्य, हिमांशु शर्मा (अलवर), प्रेमप्रकाश सैनी, श्रीभगवानसिंह (सीकर), धर्मवीर कटेवा, राजकुमार यादव (झुंझुनू), नित्‍यानंद जोशी, हीरालाल सैनी (नागौर), डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, शक्तिप्रताप राठौड़ (अजमेर), पुखराज पाराशर, रतन देवासी (जालौर), गोवर्द्धन कल्‍ला, उम्‍मेदसिंह तंवर (जैसलमेर), केवलचंद गुलेच्‍छा, जयसिंह राजपुरोहित (पाली), अलाउद्दीन आजाद, डॉ. रामलखन मीणा (सवाई माधोपुर), दुर्गादत्‍त शास्‍त्री, श्रीभगवानसिंह (धौलपुर), हरीश चौधरी, सुभाष जोशी (बाड़मेर), रमेशचंद पाण्‍डे, विकेश मेहता (बासंवाड़ा), नारायणसिंह भाटी, बहादुर सिंह चरण (राजसंमद), विनोद बिहारी शर्मा, राजेश उदाला (दौसा), सवाईसिंह, गिर्राज शर्मा (जयपुर), अजय त्रिवेदी, शिवकरण सैनी (जोधपुर) तथा श्री अरविंद डाया व प्रवीण जैन (प्रतापगढ़)।
राजस्‍थान के कुल 32 जिलों के 64 प्रतिनिधियों की यह सूची महात्‍मा गांधी जीवन-दर्शन समिति, राजस्‍थान से जुड़े समन्‍वयकों की है।
महात्मा गांधी जीवन दर्शन समिति‍ के बैनर के नीचे 14 अप्रेल को मुख्‍यमंत्री आवास, जयपुर में यह निजता भरा आयोजन होता है, जिसमें कुछेक को छोड़कर पूरे राज्‍य से प्रतिनिधि भाग लेते हैं।

इन सबके बीच राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री श्री अशोक गहलोत मुख्‍यमंत्री आवास में पूरे पांच घण्‍टे बीताते हैं। श्री मनीष कुमार शर्मा संयोजक का दायित्‍व निभाते हैं, जबकि श्री पी सी व्‍यास, श्री गिरधारीलाल बाफना और श्री वैभव गहलोत सहकार भाव।
निशक्‍त जन आयोग के पूर्व अध्‍यक्ष श्री दामोदर थानवी, अल्‍पसंख्‍यक आयोग के पूर्व अध्‍यक्ष डॉ. निजाम मोहम्‍मद, गौसेवा आयोग के पूर्व अध्‍यक्ष श्री गुलजारीलाल सोनी प्रभृत जन की भागीदारी भी इसमें होती है। राजस्‍थान माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्‍यक्ष श्री सुभाष गर्ग भरतपुर से और राजस्‍थान राज्‍य क्रीड़ा परिषद् के अध्‍यक्ष शिवचरण माली करौली से समन्‍वयक की हैसियत से भागीदार होते ही हैं।

ठीक 2 बजकर 25 मिनट पर मुख्‍यमंत्री श्री अशोक गहलोत सबके बीच आते हैं। सभी संभागियों के स्‍वागत के साथ विचारों का क्रम चलता है। दोपहर का भोजन मुख्‍यमंत्री की तरफ से आवास पर ही होता है। मुख्‍यमंत्री सबके बीच रूचि से भोजन करते हैं। भोजनोपरांत जाजम जमती है और विचारों का क्रम फिर से बनता है।
पानी बचाओ, बिजलो बचाओ, सबको पढ़ाओ और वृक्ष लगाओ- 4 मूल सूत्रों के बीच महात्‍मा गांधी जीवन दर्शन समिति की तरफ से काफी सुझाव-सलाह मुख्‍यमंत्री को प्रेषित किए जाते हैं। हर-एक को मुख्‍यमंत्री ध्‍यान से सुनते हैं और अंकण योग्‍य को अपनी डायरी में अंकित करते चलते हैं।
ठीक 5 बजकर 25 मिनट पर मुख्‍यमंत्री का उदबोधन शुरू होता है जो पूरे एक घण्‍टें चलता है।

मुख्‍यमंत्री अपने को एक आम आदमी मानते हुए बेबाकी से वह सब कह जाते हैं जो राजनीति के गलियारों में दूसरे अर्थों में लिया जा सकता है। आम आदमी की पीड़ा एवं कार्यशैली में आने वाले अंतर को वे रेखांकित करते हैं और महात्‍मा गांधी के जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश संप्रेषित करते हैं। निरंतर होते जा रहे दिखावे और विलासिता पूर्वक जीवन शैली के चलते होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के प्रति वे सावचेत करते हैं और अपनी राजनीतिक विवशताओं का संकेत छोड़ जाते हैं।
भागीदारों से वे आह्वान करते हैं कि महात्‍मा गांधी के संदेश जन-जन तक पहुंचाने का दायित्‍व वहन करें और स्‍वयं गांधी साहित्‍य की ओर मुड़ें। वे उल्‍लेख करते हैं कि गांधी अतीत नहीं भविष्‍य भी है।
भागीदारों के बीच अपने को सहज महसूस करने का जिक्र करते हुए वे बात को आगे बढ़ाते हैं और दृढ़ता से आगाह करते हैं कि गांधी जीवन दर्शन समिति के मंच पर राजनीति की बातों से परहेज किया जाना चाहिए।
आरक्षण की मांग और आरक्षण का पुख्‍तापन विषय उन्‍हें उद्वेलित करता है और वे कहते हैं कि हमें विश्‍वास है कि हम गांधीवाद से इससे निपट लेंगे।
सभा-सम्‍मेलनों में सामाजिक दूरियां और बैठने के अलग-अलग स्‍थान निर्धारण उन्‍हें अखरता है और वे कहते हैं कि मैं कार्यक्रम समापन के बाद अक्‍सर ऐसे भेदभाव के शिकार लोगों के बीच ही जाता हूं और भेदभाव करने वालों को आगाह करके आता हूं। राजनीतिक विविशताओं के बीच ऐसा करना दुष्‍कर होता है परंतु करना अपना दायित्‍व समझता हूं। आपका भी दायित्‍व मानता हूं कि आप भी ऐसा करें कि वर्गभेद न बढ़े। दूरिया बढ़ें नहीं मिटें।
वे आगाह करते हैं कि समाज महापुरुषों को बांटने का जो काम कर रहा है वह बड़ा दुखद है। आज अम्‍बेडकर जयंती में जाता हूं तो वहां दलित बंधु मिलते हैं, क्‍या हम लोगों का दायित्‍व नहीं कि हम सब वहां पर मौजूद हों।
सरकार और जनता के बीच बढ़ती दूरिया उन्‍हें खलती है और वे पाटने का वादा भी करते हैं।
नक्‍सलवाद की बढ़ती समस्‍या भी उन्‍हें प्रभावित करती है और वे उन कारणों का खुलासा करते हैं कि यह एक दिन में नहीं हुआ, वर्षों की अनदेखी का खामियाजा है। हम किसी की उपेक्षा करेंगे तो आक्रोश होगा और आक्रोश जब संगठित होगा तब ऐसे वाकिये होते रहेंगे। क्‍यों न हम आक्रोश पैदा ही न होने दें।

किसी सरकार के मुखिया के साथ पांच घण्‍टे बिताने और अंदर से उभरे विचारों को सुनने का मेरा यह पहला अवसर था। चूंकि सरकार के काम में आम धारणा भले ही कुछ हो परंतु मेरी इस धारणा को बल मिला कि श्री अशोक गहलोत एक अच्‍छे इंसान ही नहीं एक गांधीवाद से प्रभावित पूर्ण पुरुष भी हैं। राजनीति से दूर व्‍यक्ति जब बात करता है तब उसका स्‍व-चिंतन मुखर होता है और वह अंतरमन का खाका खींचता है।

चलते-चलते वे सबको हिदायत देते हैं कि अगली बार मिलेंगे तब तक गांधीजी की आत्‍मकथा को आप सब लोग कई बार पढ़ चुके होंगे। गांधी साहित्‍य को वे प्रोत्‍साहन और महात्‍मा गांधी जीवन दर्शन समिति के माध्‍यम से प्रचार-प्रसार का भी वक्‍तव्‍य देते हैं। सभा-संगोष्ठियों, प्रतियोगिताओं, आयोजन की शृंखला का एक खाका बनता है और सभी की विदाई होती है।

दिन के इन घण्‍टों में जो कुछ हासिल होता है वह अपने जिले में प्रसारित करने की भावना के साथ अन्‍य पचासाधिक सहभागियों के साथ लौटता हूं तो मेरे साथ एक खादी का थैला होता है-

जिसमें होता है गांधी साहित्‍य और गांधीजी से जुड़े विचारों की शृंखला के कागजात-






साथ ही होती है शिक्षा, बिजली, वृक्ष और पानी से जुड़ी सामग्री-
शायद सबके लिए नहीं, लेकिन मेरे लिए यह सब खा़स होता है। कुछ जज्‍बात, कुछ संकल्‍पों के मायने से।

8 comments:

  1. श्री दूलाराम सहारण पिछले कुछ वर्षों से साहित्य व सामाजिक क्षेत्र में समान रूप से सक्रिय है। ऊर्जा से भरपूर ये युवा रचनात्मक सोच के साथ साहित्य व समाज में समरसता का संचार करता है। अम्बेडकर जयंती पर मुख्यमंत्री महोदय के साथ बिताए पलों का प्रकटीकरण आपके अभिव्यक्ति कौशल का ही नतीजा है.............साथ ही माननीय मुख्यमंत्री महोदय की संवेदनशीलता का प्रमाण है कि वे गाँधीवादी मूल्यों की स्थापना हेतु प्रयासरत है।

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  2. अब तक जातिवाद खत्म नहीं होने के पीछे ये राजनेता ही जिम्मेदार है | बेशक ये जातिवाद मिटाने के लिए कितने ही भाषण दे पर इनकी असली हकीकत चुनावों में पता चलती है जब ये लोग सीट निकालने के जातिगत गोटियाँ फिट करते है | अशोक गहलोत भी इसके अपवाद नहीं है | ये भाषण बाजी सिर्फ घडियाली आंसू है | अशोक गहलोत यदि इस मुद्दे पर इतने इमानदार होते तो लोकसभा चुनावों में जोधपुर सीट जीतने के लिए महारानी चंद्रेश कुमारी को शिमला से लाकर चुनाव नहीं लड़वाते | पर परिसीमन के चलते जोधपुर सीट राजपूत बहुल होने के कारण उन्होंने ये जीतने के लिए खेल खेला | और जोधपुर के राजपूत भी जातिवाद के चलते गहलोत की इस चाल के शिकार हो गए |
    यही होता है जातिवादी सोच रखने पर , न चाहते हुए भी लोग जातिवाद के नाम पर इस्तेमाल हो जाते है |

    यही कारण है कि गांव की साँझा संस्कृति में एक साथ घुलमिलकर रहने वाली जातियों के लोग चुनावों में अपना अलग-अलग तम्बू ताने नजर आते है |

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  3. गांव में एक साथ रहने वाले लोगों को चुनावों में राजनैतिक विचार धारा के बजाय जातिगत आधार पर अलग-अलग तम्बू लगाते देख मन बहुत विचलित होता है इसलिए चुनावों के समय गांव जाने का मन ही नहीं करता |

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  4. राजनेता ऐसा तब करते हैं जब हम और आप भी इसी बोध से ग्रसित उन्‍हें मिलते हैं। यह सत्‍य है और इसे स्‍वीकारना पड़ेगा। राजनीति में जनता की नब्‍ज पकड़ने वाला शिखर पर होता है। किसी को बुरा-भला कहने से पूर्व हमें स्‍वयं को सुधारना होगा। क्‍यों न शुरूआत आज से ही करें।


    आपके 'राजपूत वर्ल्‍ड' वेब कार्य को देखकर प्रसन्‍नता हुई।
    सादर।

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  5. मैं काँग्रेस की विचारधारा का समर्थक नहीं लेकिन मैंने महसूस किया है कि अशोक गहलोत राजस्थान के विकास के प्रति काफी हद तक ईमानदारी बरत रहे है. पिछली मुख्यमंत्री तो जनता से मिलना दूर कार्यकर्ताओं से या एमएलए से भी नहीं मिलती थी। मीडिया के कितनी बार मुखातिब हुई? गेहलोत के राज में फिर भी पारदर्शिता है. पिछली बार उन्होंने कर्मचारियों पर कायदे से चलने के लिए सख्ती की जिसके कारण जनता ने भी साथ नहीं दिया और पार्टी में भी भ्रष्ट लोगों (जिन के कारण जनता नाराज थी) ने भी गेहलोत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. सब जानते है कि गहलोत के कारण ही काँग्रेस वापस सत्ता में आई है. ईमानदार और भ्रष्ट लोगों को एक ही नज़रिये से देखना उचित नहीं लगता, चाहे किसी भी दल के हो. गहलोत के ऊपर भी हाई कमान है, संसद में सिर गिने जाते है, सीएम की परफॉर्मेंस देखी जाती है। गहलोत की भी मजबूरियां है. राजनीति में कोई महात्मा पुरुष नहीं होता फिर भी भाजपा के राज में जातिवाद का जो खेल हुआ वैसा आरोप गहलोत पर नहीं है.
    जातिवाद नेता नहीं बल्कि जातियों के पंच करवाते है. यह बात बहुत ही कड़वी है लेकिन हकीकत भी है कि किस प्रकार भाजपा और काँग्रेस ने दो प्रमुख जातियों के नेताओं और अफसरों को वोट के खातिर क्या क्या लाभ दिये है. नेता पर जाती बिरादरी वाले दबाव बनाते है. आईएएस, आईपीएस की बात तो और है थानेदार तक में जातिगत लेवल पर ज़ोर आजमाइस चलती है. जातिवाद में लाभ प्रभावी व्यक्ति को मिलता है. जिसके गोरखधंधे है वही लाभ उठाता है. जो कायदे से अपना काम करता है और योग्य है उसके लिए इसका कोई लाभ नहीं.
    वैसे अराजकता और सामाजिक आर्थिक असुरक्षा के दौर में सभी जातियाँ लामबंद हो रही है. जाती के बल पर ही गुंडे और अपराधी राजनीति में प्रवेश पाते है, पैसा तो सेकंडरी माध्यम होता है। असल में जातियों का नेतृत्व देख लीजिए सम्पन्न लोगों के हाथ में ही है, जिनमें शराब माफिया भी है.
    अशोक गहलोत ही थे जो जोधपुर मेहरानगढ दुखांटिका में राजघराने के कुप्रबंध के खिलाफ बोले, किसी और नेता में कहाँ दम है.
    विचारों का मंथन जारी रहना चाहिए और नेताओं पर दबाव भी बना रहना चाहिए, जो ईमानदार है उसे उसकी बातें याद दिलाते रहना चाहिए ताकि जब तक उसका जमीर जिंदा है एक हद तक समझौतों के बावजूद मर्यादा (अपनी खुद की तय की हुई ही सही)में तो रहे.

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  6. मैं काँग्रेस की विचारधारा का समर्थक नहीं लेकिन मैंने महसूस किया है कि अशोक गहलोत राजस्थान के विकास के प्रति काफी हद तक ईमानदारी बरत रहे है. पिछली मुख्यमंत्री तो जनता से मिलना दूर कार्यकर्ताओं से या एमएलए से भी नहीं मिलती थी। मीडिया के कितनी बार मुखातिब हुई? गेहलोत के राज में फिर भी पारदर्शिता है. पिछली बार उन्होंने कर्मचारियों पर कायदे से चलने के लिए सख्ती की जिसके कारण जनता ने भी साथ नहीं दिया और पार्टी में भी भ्रष्ट लोगों (जिन के कारण जनता नाराज थी) ने भी गेहलोत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. सब जानते है कि गहलोत के कारण ही काँग्रेस वापस सत्ता में आई है. ईमानदार और भ्रष्ट लोगों को एक ही नज़रिये से देखना उचित नहीं लगता, चाहे किसी भी दल के हो. गहलोत के ऊपर भी हाई कमान है, संसद में सिर गिने जाते है, सीएम की परफॉर्मेंस देखी जाती है। गहलोत की भी मजबूरियां है. राजनीति में कोई महात्मा पुरुष नहीं होता फिर भी भाजपा के राज में जातिवाद का जो खेल हुआ वैसा आरोप गहलोत पर नहीं है.
    जातिवाद नेता नहीं बल्कि जातियों के पंच करवाते है. यह बात बहुत ही कड़वी है लेकिन हकीकत भी है कि किस प्रकार भाजपा और काँग्रेस ने दो प्रमुख जातियों के नेताओं और अफसरों को वोट के खातिर क्या क्या लाभ दिये है. नेता पर जाती बिरादरी वाले दबाव बनाते है. आईएएस, आईपीएस की बात तो और है थानेदार तक में जातिगत लेवल पर ज़ोर आजमाइस चलती है. जातिवाद में लाभ प्रभावी व्यक्ति को मिलता है. जिसके गोरखधंधे है वही लाभ उठाता है. जो कायदे से अपना काम करता है और योग्य है उसके लिए इसका कोई लाभ नहीं.
    वैसे अराजकता और सामाजिक आर्थिक असुरक्षा के दौर में सभी जातियाँ लामबंद हो रही है. जाती के बल पर ही गुंडे और अपराधी राजनीति में प्रवेश पाते है, पैसा तो सेकंडरी माध्यम होता है। असल में जातियों का नेतृत्व देख लीजिए सम्पन्न लोगों के हाथ में ही है, जिनमें शराब माफिया भी है.
    अशोक गहलोत ही थे जो जोधपुर मेहरानगढ दुखांटिका में राजघराने के कुप्रबंध के खिलाफ बोले, किसी और नेता में कहाँ दम है.
    विचारों का मंथन जारी रहना चाहिए और नेताओं पर दबाव भी बना रहना चाहिए, जो ईमानदार है उसे उसकी बातें याद दिलाते रहना चाहिए ताकि जब तक उसका जमीर जिंदा है एक हद तक समझौतों के बावजूद मर्यादा (अपनी खुद की तय की हुई ही सही)में तो रहे.

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  7. मैं काँग्रेस की विचारधारा का समर्थक नहीं लेकिन मैंने महसूस किया है कि अशोक गहलोत राजस्थान के विकास के प्रति काफी हद तक ईमानदारी बरत रहे है. पिछली मुख्यमंत्री तो जनता से मिलना दूर कार्यकर्ताओं से या एमएलए से भी नहीं मिलती थी। मीडिया के कितनी बार मुखातिब हुई? गेहलोत के राज में फिर भी पारदर्शिता है. पिछली बार उन्होंने कर्मचारियों पर कायदे से चलने के लिए सख्ती की जिसके कारण जनता ने भी साथ नहीं दिया और पार्टी में भी भ्रष्ट लोगों (जिन के कारण जनता नाराज थी) ने भी गेहलोत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. सब जानते है कि गहलोत के कारण ही काँग्रेस वापस सत्ता में आई है. ईमानदार और भ्रष्ट लोगों को एक ही नज़रिये से देखना उचित नहीं लगता, चाहे किसी भी दल के हो. गहलोत के ऊपर भी हाई कमान है, संसद में सिर गिने जाते है, सीएम की परफॉर्मेंस देखी जाती है। गहलोत की भी मजबूरियां है. राजनीति में कोई महात्मा पुरुष नहीं होता फिर भी भाजपा के राज में जातिवाद का जो खेल हुआ वैसा आरोप गहलोत पर नहीं है.
    जातिवाद नेता नहीं बल्कि जातियों के पंच करवाते है. यह बात बहुत ही कड़वी है लेकिन हकीकत भी है कि किस प्रकार भाजपा और काँग्रेस ने दो प्रमुख जातियों के नेताओं और अफसरों को वोट के खातिर क्या क्या लाभ दिये है. नेता पर जाती बिरादरी वाले दबाव बनाते है. आईएएस, आईपीएस की बात तो और है थानेदार तक में जातिगत लेवल पर ज़ोर आजमाइस चलती है. जातिवाद में लाभ प्रभावी व्यक्ति को मिलता है. जिसके गोरखधंधे है वही लाभ उठाता है. जो कायदे से अपना काम करता है और योग्य है उसके लिए इसका कोई लाभ नहीं.
    वैसे अराजकता और सामाजिक आर्थिक असुरक्षा के दौर में सभी जातियाँ लामबंद हो रही है. जाती के बल पर ही गुंडे और अपराधी राजनीति में प्रवेश पाते है, पैसा तो सेकंडरी माध्यम होता है। असल में जातियों का नेतृत्व देख लीजिए सम्पन्न लोगों के हाथ में ही है, जिनमें शराब माफिया भी है.
    अशोक गहलोत ही थे जो जोधपुर मेहरानगढ दुखांटिका में राजघराने के कुप्रबंध के खिलाफ बोले, किसी और नेता में कहाँ दम है.
    विचारों का मंथन जारी रहना चाहिए और नेताओं पर दबाव भी बना रहना चाहिए, जो ईमानदार है उसे उसकी बातें याद दिलाते रहना चाहिए ताकि जब तक उसका जमीर जिंदा है एक हद तक समझौतों के बावजूद मर्यादा (अपनी खुद की तय की हुई ही सही)में तो रहे.

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  8. ऋतुराजAugust 17, 2010 at 10:13 PM

    क्षमा करें error के कारण एक से ज्यादा बार post हो गया.

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