Thursday, April 29, 2010

लोक-इतिहास के बेजोड़ विद्वान : गोविंद अग्रवाल

लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री चूरू के विषय में मेरी पोस्‍ट के माध्‍यम से थोड़ा-सा जिक्र किया था। इस संस्‍थान के प्राण इतिहासकार श्री गोविंद अग्रवाल के विषय में भी लिखने को मेरा मन चाहा। लोक इतिहास की परम्‍परा में 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' इसी विद्वान की देन है।
राजस्‍थानी पारिवारिक मासिक 'माणक' (जलतेदीप भवन, जालोरी गेट, जोधपुर-342003) को मैंने एक आलेख भिजवाया। यह आलेख पत्रिका के अप्रेल, 2010 अंक में छपा।
चूंकि पत्रिका 'माणक' की प्रसार क्षमता का अपना दायरा है इसलिए मैं यहां आलेख को चस्‍पा करना उसके विस्‍तार के रूप में लेता हूं।


चूंकि आलेख राजस्‍थानी भाषा में था अतएव यहां भी उसी रूप में दिया जा रहा है-

लोक-इतियास रा बेजोड़ विद्वान - गोविंदजी अग्रवाळ
इतियास एक अैड़ो विसै है जकौ लोक जातरा रा सांचला आखर मांडतो थकौ खुद नै तारीखां मांय सांमटतौ बगै। इण गेलै री घण भांत डगर्यां। सगळी रळमिळै अर अेक जबरौ मारग बणावै। इण मारग माथै बगणियां खुद अेक इतियास बण जावै पण वै कांईं बण सकै जका इण इतियास नै सांमटै अर कलम री कारीगरी सूं आखी जगती सांमी चवड़ै करै?
इतियासकारां रै इतियास री बात आवै तौ चूरू रा गोविंद अग्रवाळ चैतै आवण सूं कद चुकै। श्री गोविंद अग्रवाळ राजस्थान मांय अैड़ा पैला विद्वान है जका लोक इतियास रै बूतै आपरी ठावी पिछांण राखै। नब्बै साल रै अड़गड़ै री इण लगोलग जीवण जातरा मांय श्री गोविंद अग्रवाळ आपरी तीख दीठ नै इण भांत न्हाखी है कै हरेक पारखी डरतौ थकौ उणां रै सांमी ऊभौ होवै। लोक इतियास मांय 'चूरू मण्डल का शोध पूर्ण इतिहास' अेक अैड़ौ कीर्तिजस रौ थम्म है जकौ अेकल वांनै अमर राखसी।
श्री गोविंद अग्रवाळ रौ जलम राजस्थान रै चूरू नगर मांय भादौ बदी १, बिसपत, विक्रम संवंत १९७९ (१७ अगस्त, १९२२ ई.) नै श्री दुर्गादत्‍त जी केजड़ीवाळ रै अठै हुयौ। गोविंदजी रौ औ बड़भाग रैयौ कै वां रा पिता दुर्गादत्‍त जी अर बड़ा भाई श्री सुबोध कुमार जी अग्रवाळ साहित्यिक संस्कारां वाळा हा अर वांरी सगति अर सैयोग वांनै मिल्यौ।
१९४२ रौ बगत कीं राजनीतिक ऊठा-पटक रौ हौ, इण ईज बगत मांय गोविंद जी री कलम ऊध मचायी अर ललित गद्य-काव्य अर अतुकांत कवितावां री सिरजणां कर न्हाखी। सन् १९४४-४५ में साप्ताहिक 'अर्जुन' मांय कीं गद्य-काव्य छप्या। पैली अतुकांत कविता 'हल` सिरैनांव सूं सन् १९४७ में अलवर सूं छपण वाळी मासिक 'राजस्थान क्षितिज` मांय छपी। सन् १९४७ मांय ई 'तरुण` मासिक, इलाहाबाद में लेख छप्या।
सन् १९५७ रै लगैटगै भोज प्रकासण, धार, मध्यप्रदेस सूं छपण वाळी मासिक 'उषा` गोविंद री रचनावां री ठावी पत्रिका बणी। इण पत्रिका मांय गोविंदजी चतुरसेन रै चावै उपन्यासां 'गोली`, 'सोना और खून` अर 'वयं रक्षाम:` री समीक्षावां करी, जकी घण चावी हुयी।
शोध दीठ रै हुयै विगसाव रा सांवठा दरसण सन् १९६० में बिड़ला एज्युकेशन टघ्स्ट रै राजस्थानी विभाग री मुख पत्रिका 'मरु भारती` में हुया। सन् १९८५ ताणी गोविंदजी लगोलग इण पत्रिका में लिखता रैया, जका री गिणत करां तौ कोयी १५०० पानां बैठै। राजस्थानी लोक कथावां, लोकगीतां रै खांचै गोविंदजी इण पत्रिका में घणौ काम कर्यौ।
राजस्थानी लोक कथावां रौ काम सन् १९६४ में भारती भण्डार, इलाहाबाद सूं पोथी रूप दो भागां मांय छप्यौ। पैलै भाग री भूमिका चावा विद्वान डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाळ अर दूजै भाग री भूमिका उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा लिखी। काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, मोरारजी देसाई, यूजीसी रा अध्यक्ष डॉ. दौलतसिंह कोठारी आद विद्वानां इणां री जम`र बडायी करी।
गोविंद अग्रवाळ राजस्थानी कहावतां माथै-ई भागीरथ कानोड़िया रै साथै मिल`र सन् १९७९ में पोथी रूप मांय आया। इण मांय ३२०९ कहावतां भावार्थ रै साथै अर ३५० रै लगैटगै कहावतां संदर्भ कथा रै साथै दीरीजी। लोक मर्मज्ञ डॉ. सत्येन्द्र इण पोथी री भूमिका लिखी। इण पोथी पेटै डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी कैयौ- ''राजस्थानी कहावत कोस रै संपादकां स्मृतिकारां री भूमिका निभायी है। अै लोकोक्तियां मील रा भाठा है अर औ कोस अैक संदर्भ ग्रंथ है।``
गोविंद जी री रुचि लोक अर लोक इतियास मांय रैयी। इण कारज नै सिरै चढ़ावण पेटै चूरू मांय आपरै तीन संगळियां- श्री सुबोधकुमार अग्रवाळ, कुंजबिहारी शर्मा अर श्रीनिवास दिनोदिया री भेळप सूं 'लोक संस्कृति शोध संस्थान, नगरश्री` री सन् १९६४ में थरपणा करी। खुद रै भवन रौ अैक ठांयचौ थरपिज्यौ।
नगरश्री सूं 'मरुश्री` नांव री शोध पत्रिका १९७१ ई. में सरू करीजी। चूरू अंचल अर दूजै छैड़ै सूं शोध संग्रहालय सारू सामग्री जथा पुराणी मूर्तियां, पुरातात्विक सामग्री, हस्तलिखित पाण्डुलिपियां, ताड़पत्री प्रतियां, पुराणा अभिलेख अर बहियां जोड़ीजी। इण संग्रहालय में भाड़ंग, काळीबंगा, रंगमहळ, करोती, सोथी अर पल्लू रै थेड़ा सूं भेळी करीजी पुरातात्विक सामग्री घणी महताऊ है। नगरश्री रै खुद रै पुस्तकालय री थरपणा करीजी। नगरश्री सभागार मांय नगर रै महापुरखां, थळां आद रै १२०० सूं बेसी चित्रां री माळा लगायीजी। प्रकासण विभाग सूं पोथ्यां प्रकासण सरू करीज्यौ। अैतिहासिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन तेवड़ीज्या। विद्वानां रै सनमान री विगत सरू हुयी।
सन् १९६६ में श्री गोविंद अग्रवाळ री पोथी 'जैन धर्म को चूरू जिले की देन` छपी। इण पोथी रै मारफत इण छेतर रौ अेक हजार बरसां रौ जैन इतियास पैली बार सांमी आयौ।
चूरू नगर रा मींदर-देवरा मांयला भित्तिलेखां, शिलालेखां अर वां सूं जुड़्योड़ा तथ्यां पांण पोथी 'चूरू के मुख्य मंदिर` सांमी आयी। दूजी पोथी 'हमारी सांस्कृतिक परंपराएं` नाम सूं संपादित करीजी। 'चूरू चंद्रिका` नांव सूं छपै संग्रह मांय चूरू रै सगळा पखा नै अंवेरीजा।
चूरू रा चावा समाजसेवी स्वामी गोपालदास रै संघर्ष नै 'स्वामी गोपालदासजी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व` पोथी मांय सांमट्यौ। आ पोथी सन् १९६८ में छपी।
'मरुश्री` पत्रिका नगरश्री री मुख पत्रिका ही। इण मांय सन् १९७४ सूं १९७७ ताणी गोविंद अग्रवाळ रा राजस्थानी गद्य काव्य स्वरूप 'नुकतीदाणा` छप्या। सन् १९७८ में अै १०१ नुगती दाणा पोथी रूप मांय आया। पोथी री आ खास बात ही कै राजस्थानी, हिंदी अर अंग्रेजी तीनूं भासावां मांय अै नुकतीदाणा हा।
'मरुश्री` पत्रिका सन् १९७१ मांय सरू हुयी ही। इण मांय 'ग्राम दर्शन`, 'खोज की पगडंडिया`, 'बस्तों-बुगचों से` जैड़ा ठावा थम्ब हा। इण पत्रिका रै मारफत लोक इतियास पर जबरौ काम हुयौ।
गोविंदजी री अगुवायी में सन् १९६४ मांय अेक योजना बणी ही कै चूरू मण्डल रौ प्रामाणिक इतियास लिखीजै। चूरू रै इतियास ऊपरां अेक भांत सूं औ पैलौ काम हौ, इण कारणै औ महताऊ अर हाड थकाऊ काम हौ। पण, जद ५४२ पानां, २१ अध्याय, ४४ परिशिष्ट अर १०१ चित्र, मानचित्र, अभिलेख, शिलालेख, ताम्रपत्र अर हस्तलिखित ग्रंथां रा चितराम लेय`र एक ग्रंथ जगचवड़ै हुयौ तौ इतियास रौ इस्यौ कुणसौ जाणकार हौ जकै दांतां तळै आंगळी इचरज सूं नीं दाब्यी हुवै। इण ग्रंथ रौ सिरैनांव 'चूरू मण्डल का शोध पूर्ण इतिहास` राखीज्यौ अर चूरू अंचल रै राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक अर सांस्कृतिक इतियास नै चोखी तरियां अंवेरीज्यौ। ग्रंथ री भूमिका चावा इतियासकार डॉ. रघुवीरसिंह सीतामऊ लिखी। ग्रंथ रौ २५ अप्रेल, १९७४ ई. नै चूरू नगर रै आंगणै जबरै जळसै साथै विमोचन हुयौ। इण जळसै मांय आखै देस रा चावा-ठावा इतियासकार पधार्या।
औ ग्रंथ आज आंचळिक इतियास रै मारग मील रौ भाठौ मानीजै।
मुड़िया लिपि रा गोविंद जी चावा विद्वान है। इण लिपि नै आज पढ़ण खातर हांफळा मारीजै तद कै अग्रवाळ जी इण लिपि मांय पढ़ै ई नीं आपरी डूंगी समझ ई राखै। इण लिपि मांय लिखी व्यापारिक घराणां री बहियां नै आळै-दीवाळै सूं ढूंढ`र गोविंदजी महताऊ काम कर्यौ। चूरू रै पोतेदार संग्रह मांय भेळा २०० बरस पुराणां अभिलेख अर १५-१५ किलौ री बहियां नै गोविंद जी खंगाळी अर उणां रै एतिहासिक महतब नै चवड़ै कर्यौ। औ काम सन् १९७६ मांय 'पोतेदार संग्रह के अप्रकाशित कागजात` रै रूप पोथी अंगेजीज्यौ।
व्यापारिक घराणां मांय मुनीम-गुमास्तां रौ जबरौ जोगदान हुवै। पण, किणी इण माथै काम नीं करियौ। गोविंद अग्रवाळ इण नै चैलेंज मान्यौ अर सन् १९८३ में 'वाणिज्य व्यापार में मुनीम-गुमाश्तों की भूमिका` पोथी छपा`र आपरी छाप छोडी।
चूरू रै पोतेदार (पोद्दार) संग्रह में महाराजा रणजीतसिंह अर नाभा, पटियाळा, जींद, कपूरथळा आद रै शासकां, रै साथै ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी रै पदाधिकारियां आद रा ईज फारसी परवानां हा। गोविंद अग्रवाळ इणां री खोज करी अर डॉ. रघुवीरसिंह सीतामऊ २५० अभिलेखां रौ फारसी अनुवादक मुंशी काजीकरामतुल्लाह सूं अनुवाद करवायौ। औ काम 'पोतेदार संग्रह के पारसी कागजात` नांव सूं पोथी रूप में छप्यौ।
श्री गोविंद अग्रवाळ 'उन्नीसवीं शती पूर्वार्द्ध में समृद्ध भारतीय बीमा पद्धति` पोथी १९८७ ई. में छपायी। जकी बीमा रै इतियास नै चवड़ै करै। आ पोथी राजस्थान में भणेसर्यां रै पाठ्यक्रम भेळी ई करीजी।
गोंविंद जी री विद्वता पांण भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, दिल्ली वांनै २ बरस सारू सीनियर फैलोशिप दीन्ही। दूजी संस्थावां ई वांनै घणा मान-सम्मान दीन्हा। पण खास बात आ रैयी कै गोविंद जी पुरस्कार लेंवता अर फोटू खींचवांता आज ई घणा सरमावै अर आ तामझामां सूं अळगा रैवणा चावै।
अग्रवाळ जी री दीठ तीखी है। वांरी आदत है कै वै कोयी पोथी बांचै तौ लाल पैसिंल हाथ मांय राखै। जठै गळत्यां देखै वठै लाल घेरा करै। तथ्य री परख अर भासा रौ ग्यान गजब रौ है वां कनै। वां राजस्थान शिक्षा विभाग री पाठ्यपुस्तकां मांय घणी बार संसोधन करवाया।
राजस्थान गजेटियर विभाग कानी सूं निकाळीजै चूरू गजेटियर मांय संसोधन करवाया। जनसंपर्क विभाग, चूरू कानी सूं 'चूरू दर्शन` पोथी माथै तौ गोविंदजी री काढीजी गळत्यां रै कारणै रोक ई लगायीजी।
आचार्य चतुरसेन शास्त्री रै उपन्यास 'गोली` में गोविंद जी घणी गळत्या काढ़ी, जकी आगलै संस्करण मांय सुधारीजी। उपेन्द्रनाथ अश्क रौ 'गिरती दीवारें` उपन्यास रौ दूजौ संस्करण १९५१ में छप्यौ। गोविंद जी इण री गळत्यां माथै लाल घेरा कर`र अश्कजी कनै भिजवायौ। तीजौ संस्करण जद १९५७ में छप्यौ तो अश्कजी दो शब्द लिखतां थकां उपन्यास में सुधार सारू जकां रो आभार प्रगट्यौ वै हा- गोविंद अग्रवाळ, चूरू अर प्रो. बोसेेबनी, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लेनिनग्राड विश्वविद्यालय।
श्री गोविंद अग्रवाळ आज आपरै लाडका कनै कर्नाटक रै काळजै कुमारपट्टनम् बसै। पण, वां कनै जकी पोथी, कागद पूगै, उण माथै सटीक टिप्पणी अर पोथी लालघेरां साथै पाछी जरूर आवै।
अग्रवाळजी रो इतियासूं अर साहित्यिक दीठ सूं जकौ जोगदान है वौ सबदां में नीं बांधीज सकै। वै तो एक अैड़ा तपस्वी है जका मुंडै माग्यौ बरदान मां सुरसत सूं लेय`र धरती माथै आया है, अर अणथक रूप सूं आजलग भण्डार नै भरण मांय लाग रैया है।
अठै आ बात कैवणी जरूरी हुज्या है कै श्री गोविंद अग्रवाळ रा बडा भाई सुबोध कुमार अग्रवाळ आयोजनधर्मी अर जातरा धर्मी मिनख हा। वांरी जातरावां अर आयोजन नगरश्री संस्थान नै अर संग्रहालय नै गति देंवता। इण सूं गोविंदजी नै सहायक सामग्री अर बळ मिल्यौ।
लोक संस्कृति शोध संस्थान, नगरश्री आजलग आपरी शोध जातरा कर रैयौ है। श्री रामगोपाल बहड़, डॉ. शेरसिंह बीदावत, श्री श्यामसुंदर शर्मा आद विद्वान अग्रवाळ बंधुवां री धरोड़ नै चोखी भांत संभाळ राखी अर बढ़ोतरी री गत मांय लाग रैया है। ओ आलेख उणां री मींणत रौ ई फळ है।
आस अर उम्मीद राखां कै गोविंदजी रै काम नै इणभांत ई गति मिलती रैयसी। गोविंदजी रौ लेखण अमर रैयसी अर वां री साधना नै मानखौ निंवण करतौ रैयसी।

श्री गोविंद अग्रवाळ रा छप्या ग्रंथ-
  • चूरू मण्डल का शोध पूर्ण इतिहास
  • नुकतीदाणां
  • स्वामी गोपालदास का व्यक्तित्व एवं कृतित्व
  • पोतेदार संग्रह के अप्रकाशित कागजात
  • पोतेदार संग्रह के फारसी कागजात
  • वाणिज्य व्यापार में मुनीम गुमाश्तों की भूमिका
  • राजस्थानी लोक कथाएं, खण्ड-१
  • राजस्थानी लोक कथाएं, खण्ड-२
  • राजस्थानी कहावत कोश, सह संपादन
  • चूरू के मुख्य मंदिर
  • जैन धर्म को चूरू जिले की देन
  • चूरू चंद्रिका
  • श्री कुंजबिहारी स्मृति सुमन
  • हमारी सांस्कृतिक परम्पराएं
  • फिल्मीस्तान की सैर, पद्य
  • उन्नीसवीं शती पूर्वार्द्ध में : समृद्ध भारतीय बीमा पद्धति
  • क्या चूरू जिला शेखावाटी में है ?
  • युग पुरुष : स्वामी गोपालदास
श्री गोविंद अग्रवाळ रा अणछप्या ग्रंथ-
  • अग्रवाल समाज
  • ओसवाल एवं माहेश्वरी समाज
  • राजस्थानी लोक गीत
  • चूरू का इतिवृत्‍त
  • सती प्रथा : उत्पत्ति, विकास और अंत
  • राजस्थान के जन जीवन और लोक साहित्य में ऊंट
  • हिंजड़ों एवं नाजिरों की ऐतिहासिक भूमिका
  • लोक जीवन और साहित्य में गधा
  • चूरू मण्डल का शोध पूर्ण इतिहास, भाग-२
  • उन्नीसवीं शताब्दी में भारत का आर्थिक इतिहास
  • नुक्तीदाणां, भाग-२
  • हमारे देशी खेल
  • स्वामी गोपालदासजी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व, भाग-२
  • मेरा घर, मेरा परिवार
  • राजस्थान के कुछ लोक उपचार
  • राजस्थान के लोक जीवन और लोकसाहित्य में बिल्ली
  • नारी तेरे कितने रूप
  • राजस्थान के लोक जीवन और लोक साहित्य में भैंस
  • दर्शकों की दृष्टि में नगरश्री
श्री गोविंद अग्रवाळ : सम्मान अर उपाधियां -
  • १००० रूपये पुरस्कार, पूर्वोघर प्रदेशीय मारवाड़ी युवा मंच, सिलीगुड़ी, बंगाल
  • ५१०० रूपये पुरस्कार, अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन, रांची, बिहार
  • ताम्रपत्र, बीकानेर स्थापना पंच शताब्दी समारोह समिति, बीकानेर
  • प्रशस्ति पत्र, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
  • प्रशस्ति पत्र, जिला प्रशासन, चूरू
  • प्रशस्ति पत्र, अग्रोहा विकास ट्रस्‍ट, अग्रोहा धाम, हरियाणा
  • साहित्य रत्न, राजस्थान साहित्य सम्मेलन
  • सम्मान पत्र, अखिल भारतीय अंतर जनपदीय परिषद्, उनियार घाट, बलिया, उप्र
  • विद्यावाचस्पति, विक्रमशिला हिन्दी पीठ, गांधीनगर, ईशीपुर, भागलपुर, बिहार
  • ११०० रूपये पुरस्कार, साहित्य समारोह, राजस्थान सूचना केंद्र, दिल्ली

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