Friday, April 30, 2010

क्‍या यह बहस का विषय नहीं ?

गांव रोहिणी, जिला वर्धा, (विदर्भ) महाराष्‍ट्र के समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े वासु परिवार में 4 मार्च 1935 को जन्‍मी प्रभा हमारे बीच नहीं रहीं। प्रभा राव राजस्‍थान में राज्‍यपाल के रूप में काम कर रही थीं। 26 अप्रेल, 2010 को उन्‍होंने अंतिम सांस ली।
वासु परिवार विनोबा भावे एवं महात्‍मा गांधी से जुड़ा एक संभ्रात परिवार रहा। विनोबा भावे का आश्रम शुरू में वासु परिवार के घर में चला था। वासु परिवार ने दलितों के लिए पीने के पानी और मंदिर प्रवेश के मामले में होने वाले भेद को पाटा और उन्‍हें सम्‍मान प्रदान करवाया।
प्रभा के पिता श्री गुराव वासु पेशे से ग्‍लासगो में इंजीनियर रहे और मां श्रीमती मनुबाई डॉक्‍टर थीं। श्री गुराव वासु की उदारता व राष्‍ट्र जुड़ाव इतना था कि वे स्‍वदेशी आंदोलन में नौकरी को तवज्‍जो न देते हुए शामिल हो गए। यही नहीं उन्‍होंने कस्‍तूरबा ट्रस्‍ट को मैटरनिटी अस्‍पताल दान कर दिया।
मां श्रीमती मनुबाई भी अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर गांधीजी के सेवाग्राम आश्रम का रास्‍ता पकडा़ और वहां अपनी सेवाएं दीं।
ऐसे परिवार में जन्‍मीं प्रभा प्रारंभ से ही प्रतिभावान थीं। उन्‍होंने अपने छात्र जीवन में खेलकूद एवं सांस्‍कृतिक प्रतिनिधि की हैसियत से देश का दो बार प्रतिनिधित्‍व किया। वे अच्‍छी एथलीट थीं।
पॉलिटिकल साइंस में मास्टर तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्‍त प्रभा ने राजनीति में समाजसेवा के लिए प्रवेश किया और एक शिखर को प्राप्‍त किया।
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प्रभा राव का राजनीतिक जीवन-

संसद व विधानसभा में :
कैबिनेट
मंत्री, महाराष्ट्र सरकार, (चार बार) -

योजना, उद्योग और शिक्षा राज्य मंत्री (1972-1976),
शिक्षा, खेल एवं युवा मामलों की मंत्री (1976-1977),
सहकारिता, पर्यटन मंत्री (1978),
राजस्व विभाग के आयोजन, सांस्कृतिक मामलों की मंत्री (1988-90)।
नेता प्रतिपक्ष, कांग्रेस (आई) - महाराष्ट्र राज्य विधान सभा (1979)
उपनेता महाराष्‍ट्र विधानसभा, कांग्रेस विधायक दल (
1985-90)
सांसद, वर्धा, महाराष्ट्र, लोकसभा क्षेत्र (1999)
कांग्रेस पार्टी में काम : सदस्‍य- कांग्रेस कार्य समिति। सदस्‍य- केंद्रीय चुनाव समिति। महासचिव- अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी। सदस्‍य- केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण। अध्‍यक्ष- महाराष्‍ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी। पंजाब, हरियाणा, केरल, हिमाचल प्रदेश, असम, गुजराज, मध्‍यप्रदेश, तमिलनाडू आदि राज्‍यों में राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष कांग्रेस के दिशा-निर्देशों के तहत दायित्‍व निर्वहन। राष्‍ट्रपति चुनाव में पार्टी दायित्‍व।
प्रभा राव ने अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर भी भारत का प्रतिनिधित्‍व किया, जिनमें प्रमुख अवसर हैं-
अंतरराष्‍ट्रीय महिला वर्ष पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल में प्रति‍निधित्‍व (मैक्सिको, 1975)। यूनेस्‍को सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्‍व (बर्लिन, 1976)। वियना में अंतरराष्‍ट्रीय महिला दशक पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए भारतीय सम्मेलन और प्रशांत देशों के समूह के अध्यक्ष का दायित्‍व (1993)। कॉमनवेल्‍थ देशों के सम्मेलन के लिए प्रतिनिधित्व नैरोबी में।
प्रभा राव अध्यक्ष, महाराष्‍ट्र राज्य महिला आयोग (1993-95) भी रहीं। उन्‍होंने 25 जनवरी राजस्थान के राज्यपाल का पद ग्रहण किया था।
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दुखद घटना :
राजस्‍थान को राज्‍यपाल के रूप में उनका इतना साथ हम सबके लिए जहां दुखद है वहीं हमने एक श्रेष्‍ठ नेता को खो देने का गम भी है। देश उनको सेवाओं के लिए हमेशा याद करता रहेगा।

प्रभा राव का व्‍यक्तित्‍व एवं कर्तृत्‍व एक मिसाल की भांति हैं वहीं उनके परिवार का योगदान भी राष्‍ट्र सेवाओं के लिए अतुलनीय है। प्रभा राव की दोनों बेटियां एवं उनके परिवार को सारा देश सांत्‍वना एवं संबल दे रहा है। हम भी एक हिस्‍सा हैं।
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राजकीय शोक :
प्रभा राव के निधन के बाद राजस्‍थान सरकार ने उनके सम्‍मान में सात दिन का राजकीय शोक रखने की घोषणा की वहीं 26 अप्रेल को निधन का समाचार मिलते ही सरकारी छुट्टी की घोषणा कर दी गई। यह अवकाश अगले दिन 27 अप्रेल को भी घोषित किया गया।
एक राष्‍ट्रसेविका, देशभक्‍त, राजनेता एवं राज्‍यपाल के प्रति राज्‍य का सम्‍मान था।



कार्यक्रमों में फेरबदल :
राज्‍य सरकार की राजकीय शोक की घोषणा वाले निर्णय से कई कार्यक्रम निरस्‍त हुए, कुछ कार्यक्रमों में फेरबदल की गईं-







वहीं कई जगह इस आदेश की धज्जियां उड़ती नजर आईं-


बदलाव का वक्‍त :

राजकीय शोक की घोषणा और बदलते दौर में काम की अधिकता दोनों के मद्दे नजर एक नए दृष्टिकोण का विकास हो रहा है। यह सही है या गलत परंतु, इसे एक नई बहस के रूप में देखा जा सकता है। चूंकि इससे पहले भी ऐसे अवसरों पर मंद स्‍वर में जिक्र होता रहा हैं। पर इस बार तो यह स्‍वर कुछ तीव्र रूप में उभरा है।
स्‍वर का मूल यह है कि समय का बदलाव ऐसी घोषणाओं में परिवर्तन चाहता है। सात दिन का राजकीय शोक अधिक है और यह शोक अधिकतम तीन दिन का होना चाहिए। माना कि दिवंगत का योगदान अतुलनीय होता है परंतु काम के आधिक्‍य में दिवंगत के प्रति श्रद्धा होते हुए भी नियमों की अवहेलना अनायास ही हो जाती है। और बदलते दौर में काम के महत्‍व को समझा जाना नितांत आवश्‍यक है।

जन भावना को देखकर सरकार घोषणाएं करती हैं और उसी जनभावना के अनुरूप नियम बनते हैं। राजकीय शोक के मामले में नियमों में बदलाव का अब वक्‍त आ गया है और सरकारों को इस तरफ ध्‍यान देना चाहिए।

क्‍या आप भी मानते हैं कि यह बहस का विषय है ?

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