Sunday, May 16, 2010

मीडिया का दायरा बढा नहीं घटा है



राजस्‍थानी के प्रसिद्ध कवि बुद्धिप्रकाश पारीक नहीं रहे। राजस्‍थानी में ढूंढ़ाड़ी बोली के प्रबल हस्‍ताक्षर थे पारीकजी। उनका जाना एक बड़ी क्षति है। मन विचलित है, सबसे बड़ा विचलन उनके चुपचाप चले जाने के कारण है।
मेरा यहां अर्थ अखबारों की स्‍थानीयता से है। यह एक सवालिया निशान है मीडिया पर।
क्‍या वे कोने भर के बने रहे जाएंगे। यह राज्‍यभर की खबर थी, क्‍यों नहीं दी सभी संस्‍करणो में ?
पर वे नहीं देंगे, क्‍यों‍कि यह आर्थिक महत्‍ता की खबर नहीं थी। यह नितांत एक खबर थी, कोरी खबर। जो कि सनसनी या लोकरुचि मुजब नहीं थी।

आज मैं न जाने कैसे जयपुर के कवि किशोर पारीक किशोर के ब्‍लॉग 'काव्‍यादेश' पर पहुंच जाता हूं। शायद यह बुरी खबर मिलने का एक बहाना था। वहां से पता चलता है कि बुद्धिप्रकाशजी गत 22 अप्रेल, गुरुवार को ही चले गए थे। यह सदमा था, खासकर मेरे लिए।
एक संवेदना पत्र भी समय पर न जा सका मेरी तरफ से उनके परिजनों तक। शायद मेरे जैसे और भी संवेदना देना चाहते होंगे। पर हतभाग्‍य-----।
भगवान बुद्धिप्रकाशजी पारीक की आत्‍मा को शांति दे, साथ ही यही कामना की उनके परिवार को संबंल दे। आशा है उनका परिवार हम अभागे राजस्‍थानी लेखकों को सूचना के अभाव में माफ कर देगा।

राजस्‍थानी की गिनी-चुनी पत्रिकाओं में शुमार थी- ईसरलाट। जयपुर का एक प्रसिद्ध स्‍थल ईसरलाट। ऐतिहासिक महत्‍व की मीनार। एक मायने में वहीं से शुरू हुआ राजस्‍थानी की ढूंढ़ाड़ी बोली के आधुनिक दौर का सफर। बुद्धिप्रकाशजी इसके संपादक थे, मासिक आवृति थी। वर्ष 1975 एवं 1976 दो साल निरंतर छपी।

श्री बुद्धिप्रकाश पारीक ने इसमे दम भरा। श्रेष्‍ठ रचनाएं ही प्रस्‍तुत नहीं की अपितु उन्‍होंने एक आंदोलन खड़ा किया राजस्‍थानी के लिए। खासकर राजधानी जयपुर से। रावत सारस्‍वत, चंद्रसिंह बिरकाली, लक्ष्‍मीकुमारी चूण्‍डावत सब जयपुर में ही थे। उन्‍हीं के समकक्ष थे बुद्धिप्रकाश।

बुद्धिप्रकाश जी अच्‍छे कवि थे। मंच पर तो वे खूब जमते थे। उनकी प्रकाशित रचनाओं में चूंटक्यां, चबड़का, तिरसा, कलदार, सिणगार, मैं गयो चांद पर एक बार, नाक और इंदर सूं इंटरव्यू काफी प्रसिद्धि को प्राप्‍त हुई।
जय साहित्‍य संसद के माध्‍यम से उन्‍होंने जयपुर के राजस्‍थानी-हिंदी रचनाकारों को मंच दिया। मासिक गो‍ष्‍ठी का प्रारंभ एक नायाब कला थी उनकी, पांच दशकों तक प्रत्‍येक माह के अंतिम रविवार उनके घर गो‍ष्‍ठी होती रही।

बुद्धिप्रकाशजी पारीक को अनेक सम्‍मान मिले, जिनमें कवि रत्न, साहित्यश्री, लंबोदर, मिर्जा गालिब व मारवाड़ी सम्मेलन का सर्वोच्च सम्मान शामिल हैं।
श्री बुद्धिप्रकाशजी 87 वर्ष के होकर गए।

मेरी उनसे कुछेक मुलाकात हुईं। लेकिन स्‍मरण रहेगी पिछले ही वर्ष हुई वह मुलाकात जब हम उनके घर घण्‍टों बतियाते रहे, खासकर ईसरलाट पर। वे अस्‍वस्‍थ थे लेकिन मन चंचलता से ग्रस्‍त था। साहित्‍य चर्चा में आनंदित हो रहे थे। मेरे साथ राजस्‍थानी साहित्‍यकार डॉ. भरत ओला भी थे। पुरानी बस्‍ती में स्थित उनका घर एक पवित्र धाम के समान लगा हमें।
ईसरलाट के सभी अंकों की मैं छायाप्रति (फोटो कॉपी) करवाकर लाया। जो कि मेरे संग्रह की थाती है।
ईसरलाट पर आलेख मेरे राजस्‍थानी ब्‍लॉग 'हेलो' में काफी पहले लगा दिया था।

हुई मुलाकातों के संबंध में विस्‍तार से कभी। फिलहाल मन कुछ कच्‍चा हो रहा है। कैसे चला जाता है अपना, हम सबके बीच में से--------।

पुनश्‍च:-
पारीक भवन, जय साहित्‍य संसद, 2486/20, नीम की गली, पुरानी बस्‍ती, जयपुर-302001 के प‍ते पर उनसे जुड़े संवेदना प्रेषित कर सकते हैं।
ओम् शांति।

1 comment:

  1. श्री बुद्धिप्रकाश जी पारीक राजस्थानी साहित्य में ख्यातनाम थे,उनका जाना अपूरणीय क्षति है। ये विडम्बना की बात है कि ये सूचना आज हम तक पहुँची है। घोर आर्थिक युग व बदलते परिवेश एवं सामाजिक मूल्यों ने मानवीय संवेदनाओं को लील लिया है,तभी तो एक सच्चा सपूत गुमनामी में प्रयाण कर जाता है।.............भगवान उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें।

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