Tuesday, June 1, 2010

ऐसा प्रकाशक पाठकों के लिए देवदूत होता है : इतनी सस्‍ती किताबें, वाह

राजस्थान से हमेशा विभिन् क्षेत्रों में नई पहल होती रही है। राजधानी जयपुर इन दिनों फिर एक नई पहल के कारण चर्चा में है। इस बार चर्चा साहित्यकारों और पाठकों की ओर से शुरू हई है। और हो भी क्यों , जब इसका वाजिब कारण मौजूद है।

कारण पैदा किया है घग्‍घर की मिट्टी से उठे कविवर मायामृग ने। मायामृग न केवल जाने-पहचाने श्रेष्‍ठ कवि हैं अपितु बोधि प्रकाशन के श्रेष्‍ठ प्रबंधक भी हैं। बोधि प्रकाशन एक आर्थिक सोच से विकसित प्रकाशन संस्‍था नहीं है। यह एक ऐसे मंच का नाम हैं जो कि रचनाकारों को प्रकाशकों की मायावी दुनिया से दूर करने के उद्यम में दिन-रात एक किए है।
मायामृग हमेशा से एक सोच से आप्‍लावित रहते थे कि आज भौतिकता की दौड़ में और तकनीक के विकास चरम पर मुद्रित सामग्री खतरे में हैं। उनकी सोच थी कि इन सबमें सबसे ज्‍यादा खतरे में हैं तो पुस्‍तकें। पुस्‍तकों की न केवल बिक्री घटी है अपितु उनकी प्रसारात्‍मकता भी घटी है। सरकारी खरीद और पुस्‍तकालयों के हिस्‍से पर गौर फरमाया जाए तो तीन-चौथाई हिस्‍सा समा जाता है। मात्र चौथाई हिस्‍सा खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों के लिए सुरक्षित रहता है, या यूं कहें कि यह हिस्‍सा ऐसे पाठक बमुश्किल से बचाने में सक्षम रहे हैं। यह बदलाव मायामृग को कचोटा।
पाठक कृति की खरीद से दूर जा रहा है तो क्‍यों ?
पुस्‍तकों के बढ़ते मूल्‍य को बड़ी वजह के रूप में मायामृग ने अपने सामने पाया। और एक मायने में यहीं से बोधि प्रकाशन का उदय हुआ।
बोधि प्रकाशन की शताधिक कृतियां मात्र 50 या 35 रूपये बिक्री की दर से छपी। 100 या 80 पृष्‍ठों की पुस्‍तक का यह मूल्‍य प्रकाशकों की दुनिया में बेवकूफाना कदम माना गया। लेकिन बोधि प्रकाशन ने अपने इस कदम से न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि पाठकों के दिलों में जगह भी बनाई।
पूरे भारत में बोधि प्रकाशन के प्रशंसकों की एक फौज खड़ी हो गई। और एक मायने में प्रकाशन के व्‍यवसाय से बोधि प्रकाशन के मालिक मायामृग ने यही कमाया।

बोधि प्रकाशन, जयपुर अपने इस कदम से कहां संतुष्‍ट होने वाला था। उसके नवीन प्रयोग अभी शेष थे।
इन्‍हीं नवीन प्रयोगों में एक प्रयोग 23 मई, 2010 को साक्षात हुआ है।
और यह प्रयोग 'बोधि पुस्‍तक पर्व' के नाम से जाना जा रहा है तथा सम्‍पूर्ण साहित्‍य जगत अंदर चर्चा में है।
इसी पर चर्चा करते हुए चौथे सप्‍तक के कवि नंदकिशोर आचार्य

'बोधि पुस्‍तक पर्व' के नाम की इस पहल ने पुस्‍तकों के इतिहास में एक नया आयाम स्‍थापित किया है। इस पर्व में दस पुस्‍तक का एक सैट पाठकों के लिए प्रकाशक की ओर से प्रस्‍तुत किया गया है। प्रत्‍येक पुस्‍तक 80 पृष्‍ठ से अधिक की है और सब की सब हार्डबाइडिंग की। उल्‍लेखनीय बात यह नहीं, उल्‍लेखनीय तो यह है कि इस दस ‍पुस्‍तक वाले पूरे सैट की कीमत मात्र और मात्र 100 रूपये रखी गई है। यानी कि एक पुस्‍तक की कीमत 10 रूपये।
रविवार 23 मई 2010 को शाम 4.30 बजे पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर में पुस्तक पर्व के तहत प्रकाशित पहले सैट की 10 पुस्तकों के हुए लोकार्पण में हिंदी की 10 पुस्‍तकें शामिल हैं, एक नजर-
कविता
1. भीगे डेनों वाला गरुण : विजेंद्र
2. आकाश की जात बता भैया : चंद्रकांत देवताले
3. जहाँ उजाले की एक रेखा खिंची है : नन्द चतुर्वेदी
4. प्रपंच सार सुबोधिनी : हेमंत शेष
कहानी
5. आठ कहानियां : महीप सिंह
6. गुडनाइट इंडिया : प्रमोद कुमार शर्मा
7. घग्घर नदी के टापू : सुरेन्द्र सुन्दरम
अन्य
8. कुछ इधर की-कुछ उधर की : हेतु भारद्वाज
9. जब समय दोहरा रहा हो इतिहास : नासिरा शर्मा
10. तारीख की खंजड़ी : सत्यनारायण

इस सैट को हिंदी के वरिष्‍ठ कवि विजेंद्र, प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक नंदकिशोर आचार्य, साहित्‍यकार डॉ. माधव हाडा, डॉ. लक्ष्मी शर्मा ने उपस्थित साहित्यकारों, पाठकों, पत्रकारों के समक्ष जारी किया।

लोकार्पण समारोह में ही 200 सैट हाथोंहाथ लिए गए। यह एक भांति पुस्‍तक पर्व का शानदार स्‍वागत था। अगले दिन दोपहर तक 100 और सैट का आदेश प्रकाशक को मिल चुका था। और तो और उससे अगले दिन 225 सैट का एक नया आदेश प्रकाशक को और मिला। यह क्रम निरंतर जारी रहा और आज स्थिति यह है कि कुल 1000 सैट में से मात्र कुछ ही बचे हैं।
इससे बेहतर योजना-प्रयोजना क्‍या हो सकती है, किसी प्रकाशक की।
पाठकों के लिए समर्पित तथा किताबों को बचाने की दिशा में की गई इस नवीन पहल के लिए बोधि प्रकाशन के श्री मायामृग (9829018087, mayamrig AT gmail.com) बधाई के पात्र हैं।

एक खुशखबरी राजस्‍थानी साहित्‍य के पाठकों के लिए भी बोधि प्रकाशन की ओर से है, बोधि प्रकाशन अगला सैट राजस्‍थानी का लेकर आ रहे हैं। राजस्‍थानी की दस किताबें, मात्र 100 रूपये में।

पुस्‍तक बचाने की इस पहल के सद् प्रयास हेतु प्रयास संस्‍थान, चूरू ने एक समारोह में श्री मायामृग का सम्‍मान करने का फैसला भी किया है। श्रेष्‍ठ कार्य करने वालों को कौन सम्‍मानित नहीं करेगा, यह सम्‍मानित करने वाली संस्‍थाओं का सौभाग्‍य होता है।

श्रेष्‍ठ कार्य के लिए साधुवाद मायामृग जी। हो सकता है आपके इस कदम से दूसरे प्रकाशक भी कुछ बदलें।
आमीन।


9 comments:

  1. बहुत बढ़िया और उपयोगी जानकारी दी है आपने, पुस्तकों के बढ़ते मूल्य देख कर पढने की इच्छा होते हुए भी मन मारकर रह जाना पड़ता है| विशेषकर मेरे जैसे विद्यार्थियों को तो, जो सिमित pocket money के साथ चलते है ......
    पुस्तकों के लिए चिंता जायज है कई पुस्तके तो ऐसी है जो बहुत कम जगह मिलती है मार्केटिंग बहुत poor है ....

    ReplyDelete
  2. सराहनीय और सार्थक प्रयास ,बोधी प्रकाशन को बच्चों के पाठ्य पुस्तक भी इसी सोच के साथ प्रकाशित करने के लिए आगे आना चाहिए ,इस सार्थक कार्य के लिए बोधी प्रकाशन और मायामृग जी का भी बहुत-बहुत धन्यवाद |

    ReplyDelete

  3. श्रीमन सरकार, क्या यह अच्छा न होता कि आप इन किताबों को आर्डर देने की प्रक्रिया के विषय में कुछ जानाकारी भी दे देते !
    लालच लग रही है, पर इन्हें पाऊँ कैसे ?

    ReplyDelete
  4. मायामृग एक आदमी नहीँ वरन एक संस्था है।मैँ उसे 20-25 साल से जानता हूं।धुन का पक्का और बगावती तेवर के साथ नया करने का जुनून की हद तक का आदी।जो सोच लिया वो किया चाहे घर,परिवार,शहर या मित्रोँ ने साथ ना दिया हो।यह योजना आज की नहीँ है वरन उस वक्त की है जब इसका पहला कविता संग्रह छपा था।उस वक्त किताबोँ ज्यादा कीमत ने इसे परेशान किया तो प्रकाशक बनने की ठान ली तो आज प्रकाशक है और अपनी सस्ती किताबोँ के साथ उपस्थित है।इस बीच घर परिवार शहर मित्र और व्याख्याता की सरकारी नोकरी भी छोड़ दी।पेट के लिए नहीँ वरन मिशन के लिए।पेट को तो सरकारी नोकरी प्रयाप्त थी।
    इस जुनूनी बंदे को सलाम !

    ReplyDelete
  5. khushi hui ki aise prakashak bhi hai. mai soch raha hoo ki apni nayi putak-chauthaa upanyaa-mayamrig ji ko hi de doo. badhai. itani achchhi bhasa me kisi prakashak ka parichay dene ke liye.

    ReplyDelete
  6. इस जानकारी के लिए धन्यवाद. जैसा की डॉ अमर कुमार ने कहा, और अधिक जानकारी की अपेक्षा है.

    ReplyDelete
  7. बहुत ही शानदार काम है मायामृग जी का। निश्चित रूप से वे बधाई के पात्र हैं।

    इसी पोस्‍ट में मायामृग जी के मोबाइल नम्‍बर और ई-मेल दिया गया है। वहीं बोधि प्रकाशन के ब्‍लॉग का लिंक भी दिया गया है। यह और भी खूबी है। मैं सेट खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं, अभी फोन करता हूं मायामृग जी को।


    श्रेष्‍ठ पोस्‍ट के लिए आपको भी बधाई।

    ReplyDelete
  8. Bahut Bahut Badhai aur Dhanyavaad!Pl send all these books on my postal address by VPP.

    ReplyDelete