Sunday, November 20, 2011

20 11 20 11

आज 20 11 20 11 है। यानी 20.11.2011, यह पल न जाने क्‍यों महत्‍त्‍वपूर्ण लग रहा है। तवारीख के हिसाब से कुछ खास नहीं फिर भी खास। 

निज मायने में 20 नवम्‍बर को एक माह पूर्ण हो लिया, पूर्ण इस मायने में कि आज से ठीक एक महीने पहले यानी 20 अक्‍टूबर को प्रयास संस्‍थान, चूरू के साहित्यिक-सांस्‍कृतिक-सामाजिक सरोकारों के लिए चूरू शहर में 800 दरगज भूमि का टुकड़ा खरीदा था। 
टुकड़ा दूसरों की नजर में, हमारी नजर में एक पूरा संसार, जिसको हमने आबाद करने के लिए अपनी जद में किया। वर्षों से जागते-सोते लिए गए सपने पूरे करने की कार्यस्‍थली। इस मुददे पर लम्‍बी चर्चा फिर कभी..... । 

पर आज यानी 20 11 20 11 को अंचल में कुछ खास घटा।

चूरू जिले के राजगढ़ तहसील मुख्‍यालय पर सात दशक पुरानी एक साहित्यिक संस्‍था है- साहित्‍य समिति, राजगढ़ (चूरू)। उसी साहित्‍य समिति के वर्तमान मुखिया साहित्‍यकार-साहित्‍यसेवी डॉ. रामकुमार घोटड़ ने  इतिहास रचने की ओर आज कदम बढ़ाया है। 
साहित्‍य समिति ने राजगढ़ ही नहीं अपितु अंचल की थाती को संजोने वाले श्रेष्‍ठी सूरजमल मोहता की 101 वीं जयंती पर एक साहित्यिक पहल की है। 'सेठ सुरजमल मोहता साहित्‍य पुरस्‍कार' का शुभारंभ करके।
और हम सब उस समारोह के गवाह बने, सूत्र यहीं से भी पकड़े जा सकते हैं 20 11 20 11 के।

समारोह की सूचना भर यह कि दर्शनशास्‍त्र के आधिकारिक विद्वान और साहित्‍य सेवी डॉ. कृष्‍णाकांत पाठक को वर्ष 2011 का 'सेठ सूरजमल मोहता साहित्‍य पुरस्‍कार' प्रदान किया गया। मुख्‍य अतिथि थे- डॉ. चंद्रप्रकाश देवल, साहित्‍यकार, अजमेर और अध्‍यक्षता की डॉ. महेन्‍द्र खड़गावत, अध्‍यक्ष, राजस्‍थानी भाषा साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर ने। कार्यक्रम में साहित्‍यकार बैजनाथ पंवार, नागराज शर्मा और पृथ्‍वीराज रतनू , सचिव, राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर बतौर अतिथि उपस्थिति थे। 

यह शुरूआत बहुत खास है। वह इस मायने में कि अंचल के इस क्षेत्र को सबसे अधिक साहित्यिक संस्‍कारों की जरूरत है। पुलिस थाने के रिकॉर्ड इस बात की गवाही देते हैं कि यह अंचल किस ओर जा रहा है। 

साहित्‍य व्‍यक्ति को संस्‍कारवान बनाता है। और इसी सत्‍य को पकड़ने पर खुशी का इजहार किया जा सकता है ऐसी शुरूआत पर। 

स्‍वागत...... 
फिलहाल इतना ही।

Saturday, October 16, 2010

एक गांव जो प्रतिभाएं गढ़ता है





समूचा राजस्‍थान प्रांत आजकल कृष्‍णा पूनिया के राष्‍ट्रमंडल पदक के स्‍वागत में उमड़ रहा है। कृष्‍णा पूनिया ने डिसकस थ्रो में महिला वर्ग में गोल्‍ड जीता है। कृष्‍णा पूनिया हरियाणा (अग्रोहा) के किसान दंपती श्रीमती शांतिदेवी- श्री महासिंह सूरा की बेटी है और राजस्‍थान के चूरू जिले के गांव गागड़वास  (राजगढ़) की बहू है। गागड़वास के श्री वीरेन्‍द्र पूनिया स्‍वयं अच्‍छे खिलाड़ी रहे हैं और अपनी पत्‍नी कृष्‍णा के कोच रहते हुए उन्‍होंने बड़ी मेहनत से (कृण्‍णा को) तराशा भी है। 
कृष्‍णा ने स्‍वागत के बाद  कहा कि हर घ्‍ार में मेरी जैसी कृष्‍णा हैं, लेकिन उन्‍हें उचित अवसर व मददगार मिलना चाहिए। 
सही है, प्रतिभाएं हर ओर होती हैं। उन्‍हें सही मंच और सही दिशा देने वाला चाहिए। कुछ प्रतिभाएं ऐसी भी होती हैं जो दिशा का निर्धारण कभी-कभी स्‍वयं कर लेती हैं परंतु उनके पीछे गहरा संघर्ष छिपा होता है। 
ऐसे ही एक संघर्ष का नाम है सुरेन्‍द्र सिंह। 
कृष्‍णा पूनिया और वीरेन्‍द्र पूनिया के गांव गागड़वास का निवासी सुरेन्‍द्रसिंह। 
अपनी कूची के बल पर करामात दिखाता किसान पुत्र सुरेन्‍द्रसिंह, जिसकी पीढि़यों में भी कूची से वास्‍ता नहीं रहा। किसानी के बल पर यापन करनेवाले परिवार का एक सदस्‍य, जो राजधानी जयपुर की कलादीर्घाओं में ऊपर उकेरे गए चित्रों जैसे अनेक चित्रों के बूते पर अपना मुकाम बनाने के लिए संघर्षरत है।
पिछले दिनों अंतरजाल के मायाजाल के बीच से सुरेन्‍द्रसिंह मेरे सामने निकला और अपनी कला के बल पर मुझे मोह गया। 
लिखने-समझने को बहुत मन चाह रहा है, लेकिन जब बात कृष्‍णा पूनिया और गांव गागड़वास की होने लगी तो आज यकायक सुरेन्‍द्रसिंह का स्‍मरण हो आया और त्‍वरित गति से टूटे दो शब्‍द आपके सामने रख दिए। 
शायद सुरेन्‍द्रसिंह आपको ही पसंद आ जाए।
आप सुरेन्‍द्रसिंह के विषय में कुछ और यहां से जान सकते हैं-






Monday, August 16, 2010

युवा काम बेहतर कर सकता है, बुरा लगे तो लगे

काफी समय से एक ऊर्जावान युवा के विषय में लिखने को मन कर रहा था परंतु, लगा कि नहीं, कहीं स्‍थानीयता हावी न हो जाये। स्‍थानीय-जुड़ाव के साथ कुछ और कारणों का जुड़ाव भी लोग कर लेते हैं। बस इसी कारण यह पोस्‍ट टलती रही। परंतु अब यह टलनी नहीं चाहिए, क्‍योंकि 37 साल के इस युवा ने स्‍वतंत्रता दिवस पर चूरू को शानदार तोहफा दिया है। राजस्‍‍थान की इस मरुभूमि को तकनीक से जोड़ने का साहस किया है।
इस युवा ने आम आदमी के हित का खयाल रखते हुए सरकारी तंत्र में चुस्‍ती और राजनीति के बहाने घुसे घुसपैठियों में सुस्‍ती ला दी है।

मैं बात कर रहा हूं, चूरू जिला कलक्‍टर डॉ. कृष्‍णाकांत पाठक का। श्री के. के. पाठक ने हाल ही 11 अगस्‍त को अपना 37वां जन्‍मदिन मनाया है। मूल रूप से मोहानिया, बिहार के निवासी, फिलॉसफी में डॉक्‍टर, साहित्‍यधर्मी श्री के. के. पाठक अपने 2001 बैच के टॉपरर्स में से एक रहे हैं। चूरू में आपका आना एक मायने में ऐसे समय में हुआ जब केन्‍द्र सरकार की महत्‍वपूर्ण योजना कानून का रूप लेने की करवट ले रही थी।
नरेगा और अब महानरेगा के माध्‍यम से ग्रामीण क्षेत्रों में एक क्रांतिकारी पहल हुई। परंतु यह भी सत्‍य है कि कोई महत्‍वाकांक्षी योजना अपने साथ कुछ दूसरे पहलू भी लेकर आती है। महानरेगा में राजनीति के घुसपैठियों के माध्‍यम से होने वाला भ्रष्‍टाचार इस योजना का मूल बन गया। ग्रामीण बिना काम पर जाए अपना नाम लिखाने लगे और आधा भुगतान लेकर संतुष्‍ट रहने लगे। वहीं मस्‍टरोल में नाम दर्ज अपने हिसाब से होने लगे। मूल रूप से यथार्थ धरातल पर योजना का खाका बदलता-सा नजर आने लगा।
ऐसे में चूरू कलक्‍टर ने ई-मस्‍टरोल की पहल की। चूरू जिला पहला जिला बना जिसमें ई-मस्‍टरोल जारी हुए। यह एक बहुत बड़ा काम था, जोकि श्री के के पाठक ने कर दिखाया। बाद में इस पहल का राज्‍य के दूसरे जिलों में अनुसरण हुआ। यही नहीं, श्री के के पाठक की कार्यक्षमता के बूते पर चूरू जिला राज्‍य का प्रथम जिला बनने की स्थिति में आया जहां 15 दिनों के बाद महानरेगा का भुगतान सीधे खातों में पहुंचना प्रारंभ हुआ।
इस पहल के पीछे एक युवा की सूक्ष्‍म दृष्टि, गहरी समझ एवं कार्यक्षमता ही है।

बात यहीं समाप्‍त नहीं होती। बात यहां से शुरू होती है। डीसीटीसी के माध्‍यम से कम्‍प्‍यूटर शिक्षा के क्षेत्र में जिला कलक्‍टर ने गहरी रूचि दिखायी। उन्‍हीं के प्रयास एवं प्रेरणा रही कि डीसीटीसी, चूरू आज एक अपना मुकाम लिए हुए तीर्थसम है।
पिछले दिनों जब पूरा देश स्‍वतंत्रता दिवस की तैयारियों में लगा था तब युवा के.के.पाठक का दिमाग नये सपने बुनने में लगा था। उन्‍हें अपने इन सपनों को अंजाम देना था- स्‍वतंत्रता दिवस पर।
11 अगस्‍त, 2010 को जिला कलक्‍टर ने एक बैठक आहुत कर एक ऐसी घोषणा की, एक ऐसा खाका सबके सामने रखा, जो कि चौंकाने वाला था।
भारत सरकार तथा दिल्‍ली राज्‍य सरकार एवं अन्‍य कुछ दूसरे क्षेत्रों में संचालित एक बहुत ही उपयोगी आमजन हितार्थ स्‍कीम को चूरू में लागू करने वाला यह फैसला कम नहीं था। स्‍कीम थी- जन शिकायत निवारण प्रणाली यानी Public Grievance Redressal System.
Public Grievance Redressal System को 'लोकवाणी' नाम दिया गया। यह श्री के. के. पाठक का निजी चिंतन था कि यह चूरू जिले में लागू हो सकी। इस सिस्टम का जिला परिषद सभागार में 15 अगस्, 2010 को विधिवत उदघाटन किया गया।
इस सिस्‍टम के तहत कोई भी आमजन अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करा सकता है। उसे शिकायत दर्ज कराने पर एक शिकायत नम्‍बर मिलता है। उस शिकायत नम्‍बर के आधार पर वह की हुई शिकायत का समय-समय पर पीछा कर सकता है। उसके द्वारा की गई शिकायत पर क्‍या कार्रवाई हुई, कौनसी स्‍टेज में शिकायत है आदि-आदि। अपनी शिकायत के प्रति वह रिमाइण्‍डर भी ऑनलाइन लगा सकता है।
अब तक यह प्रथा प्रचलन में थी कि एक कागज पर शिकायत की गई। वह जनता प्रकोष्‍ठ/सर्तकता प्रकोष्‍ठ की धरोहर बनते हुए न जाने कहां-कहां घुमता। शिकायतकर्ता अगर उसका पीछा भी करे तो कहां तक।

मेरा मानना है कि राजनीति के कुछ गंदे कीड़े (माफ करें) भले ही कुछ अनाप-शनाप बकें, सत्‍य तो यही है कि काम करने वाले भले ही कहीं रहे, वे अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ ही जाते हैं। यह उस क्षेत्र का सौभाग्‍य होता है, जहां वे रहते हैं।
चूरू जिला ऐसे कलक्‍टर, युवा ऊर्जावान कलक्‍टर को लिए हुए है, मैं तो इसे सौभाग्‍य ही कहूंगा।


Monday, July 5, 2010

एक शानदार पहल

राजस्‍थान के चूरू जिला मुख्‍यालय स्थित राजकीय लोहिया कॉलेज एक ख्‍यातनाम संस्‍थान है। कला, विज्ञान, वाणिज्‍य, विधि के स्‍नातक और स्‍नातकोत्‍तर स्‍तर के हजारों विद्यार्थी यहां से ज्ञान अर्जन करते हैं।
इसी महाविद्यालय के लगभग 200 सदस्‍यों वाले शैक्षणिक व अशैक्षणिक स्‍टाफ के कुछ प्रबुद्ध सदस्‍यों द्वारा 1 जुलाई, 2010 को की गई एक शानदार पहल मुझे ही नहीं मुझ जैसे अनेक लोगों को लुभा गयी।

पहल थी - स्‍टाफ द्वारा साइकिल के माध्‍यम से पूरे शिक्षा सत्र महाविद्यालय आने की।
पहल की गई महाविद्यालय के 30 के करीब सदस्‍यों द्वारा।
स्‍वागत किया जाना चाहिए-








Tuesday, June 15, 2010

डॉ. घासीराम वर्मा साहित्‍य पुरस्‍कार-2010 हेतु नाम भेजें

राजस्‍थान के हिंदी लेखन को समर्पित 'डॉ. घासीराम वर्मा साहित्‍य पुरस्‍कार-2010' हेतु 2005-2009 में छपी किसी एक कृति की 30 जून, 2010 तक अनुशंसा/संस्‍तुति करें-
prayas.sansthan@rediffmail.com पर।


वर्ष-2008 का पुरस्‍कार डॉ. सत्‍यनारायण (सितम्‍बर में रात) व 2009 का पुरस्‍कार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ (कठपुतलियां) को दिया गया।

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प्रयास संस्थान
चूरू-331001 राजस्थान
www.prayas-sansthan.blogspot.com


डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार
पुरस्कार नियम
१. राजस्थान के हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन-सम्मान देने के लिए वर्ष-2008 से यह वार्षिक पुरस्कार प्रारम्भ किया गया।
राजस्थान से तात्पर्य जन्म राजस्थान में होना या फिर विगत दस वर्षों से राजस्थान में निवासी होना होगा।
२. इस पुरस्कार का नाम 'डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार` रहेगा।
३. पुरस्कार किसे दिया जाये; इसका निर्धारण विगत वर्ष/वर्षों में प्रकाशित कृतियों के मूल्यांकन के बाद संस्थान कार्यकारिणी द्वारा किया जायेगा। किसी एक रचनाकार की कोई एक कृति का चयन पुरस्कार के लिए किया जाएगा।
४. चयनित लेखक को 5100 रुपये नगद, शॉल, श्रीफल, स्मृति चिह्न आदि पुरस्कार/सम्मान स्वरूप दिये जायेंगे। यात्रा-व्यय, भोजन व आवास की व्यवस्था भी संस्थान करेगा। सभी खर्चों का प्रबंधन संस्थान अपने संसाधनों से करेगा।
५. पुरस्कार वितरण समारोह राजस्थान के चूरू जिला मुख्यालय पर प्रतिवर्ष अगस्त/सितम्‍बर माह में आयोजित किया जायेगा। बशर्ते कोई अपरिहार्य कारण न हो।
६. संस्थान उचित समझे तो हिन्दी की राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रतिवर्ष विज्ञापन निकालकर पाठकों/साहित्यकारों से पुरस्कार हेतु कृति-कृतिकार के नाम की अनुशंसा मांग सकेगा।
७. विज्ञप्ति के माध्यम से पाठकों/साहित्यकारों से सिर्फ कृति-कृतिकार के नाम की अनुशंसा मांगी जायेगी। किसी कृति की प्रति नहीं मांगी जायेगी। अनुशंसित किसी कृति की अनुपलब्धता की स्थिति में जरूरत समझे तो वह कृति प्रकाशक से संस्थान स्वयं अपने खर्चे द्वारा मंगवायेगा।
८. ऐसी सूरत में आये नामों पर कार्यकारिणी विचार करेगी और योग्य रचना-रचनाकार का चयन करेगी। जरूरी हुआ तो संस्थान साहित्यकारों का तीन सदस्यीय निर्णायक मण्डल भी बना सकेगा।
९. संस्थान पुरस्कार वितरण समारोह में राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हिन्दी के किसी एक लेखक-विद्वान व राज्य से किसी एक हिन्दी रचनाकार को आमंत्रित करेगा। ऐसे आमंत्रित रचनकारों के आवागमन व्यय तथा रहने-खाने का प्रबंध संस्थान अपने संसाधनों से करेगा।
१०. संस्थान जरूरी समझे तो किसी समानधर्मी दूसरे संस्थान को सहभागी बना सकेगा।
११. पुरस्कार हेतु नाम के चयन के विषय में संस्थान की अपनी स्वतंत्रता रहेगी। संस्थान कार्यकारिणी द्वारा नियमों में संशोधन-परिवर्द्धन किया जा सकेगा तथा कार्यकारिणी का हर निर्णय अंतिम व सर्वमान्य होगा।



Tuesday, June 1, 2010

ऐसा प्रकाशक पाठकों के लिए देवदूत होता है : इतनी सस्‍ती किताबें, वाह

राजस्थान से हमेशा विभिन् क्षेत्रों में नई पहल होती रही है। राजधानी जयपुर इन दिनों फिर एक नई पहल के कारण चर्चा में है। इस बार चर्चा साहित्यकारों और पाठकों की ओर से शुरू हई है। और हो भी क्यों , जब इसका वाजिब कारण मौजूद है।

कारण पैदा किया है घग्‍घर की मिट्टी से उठे कविवर मायामृग ने। मायामृग न केवल जाने-पहचाने श्रेष्‍ठ कवि हैं अपितु बोधि प्रकाशन के श्रेष्‍ठ प्रबंधक भी हैं। बोधि प्रकाशन एक आर्थिक सोच से विकसित प्रकाशन संस्‍था नहीं है। यह एक ऐसे मंच का नाम हैं जो कि रचनाकारों को प्रकाशकों की मायावी दुनिया से दूर करने के उद्यम में दिन-रात एक किए है।
मायामृग हमेशा से एक सोच से आप्‍लावित रहते थे कि आज भौतिकता की दौड़ में और तकनीक के विकास चरम पर मुद्रित सामग्री खतरे में हैं। उनकी सोच थी कि इन सबमें सबसे ज्‍यादा खतरे में हैं तो पुस्‍तकें। पुस्‍तकों की न केवल बिक्री घटी है अपितु उनकी प्रसारात्‍मकता भी घटी है। सरकारी खरीद और पुस्‍तकालयों के हिस्‍से पर गौर फरमाया जाए तो तीन-चौथाई हिस्‍सा समा जाता है। मात्र चौथाई हिस्‍सा खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों के लिए सुरक्षित रहता है, या यूं कहें कि यह हिस्‍सा ऐसे पाठक बमुश्किल से बचाने में सक्षम रहे हैं। यह बदलाव मायामृग को कचोटा।
पाठक कृति की खरीद से दूर जा रहा है तो क्‍यों ?
पुस्‍तकों के बढ़ते मूल्‍य को बड़ी वजह के रूप में मायामृग ने अपने सामने पाया। और एक मायने में यहीं से बोधि प्रकाशन का उदय हुआ।
बोधि प्रकाशन की शताधिक कृतियां मात्र 50 या 35 रूपये बिक्री की दर से छपी। 100 या 80 पृष्‍ठों की पुस्‍तक का यह मूल्‍य प्रकाशकों की दुनिया में बेवकूफाना कदम माना गया। लेकिन बोधि प्रकाशन ने अपने इस कदम से न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि पाठकों के दिलों में जगह भी बनाई।
पूरे भारत में बोधि प्रकाशन के प्रशंसकों की एक फौज खड़ी हो गई। और एक मायने में प्रकाशन के व्‍यवसाय से बोधि प्रकाशन के मालिक मायामृग ने यही कमाया।

बोधि प्रकाशन, जयपुर अपने इस कदम से कहां संतुष्‍ट होने वाला था। उसके नवीन प्रयोग अभी शेष थे।
इन्‍हीं नवीन प्रयोगों में एक प्रयोग 23 मई, 2010 को साक्षात हुआ है।
और यह प्रयोग 'बोधि पुस्‍तक पर्व' के नाम से जाना जा रहा है तथा सम्‍पूर्ण साहित्‍य जगत अंदर चर्चा में है।
इसी पर चर्चा करते हुए चौथे सप्‍तक के कवि नंदकिशोर आचार्य

'बोधि पुस्‍तक पर्व' के नाम की इस पहल ने पुस्‍तकों के इतिहास में एक नया आयाम स्‍थापित किया है। इस पर्व में दस पुस्‍तक का एक सैट पाठकों के लिए प्रकाशक की ओर से प्रस्‍तुत किया गया है। प्रत्‍येक पुस्‍तक 80 पृष्‍ठ से अधिक की है और सब की सब हार्डबाइडिंग की। उल्‍लेखनीय बात यह नहीं, उल्‍लेखनीय तो यह है कि इस दस ‍पुस्‍तक वाले पूरे सैट की कीमत मात्र और मात्र 100 रूपये रखी गई है। यानी कि एक पुस्‍तक की कीमत 10 रूपये।
रविवार 23 मई 2010 को शाम 4.30 बजे पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर में पुस्तक पर्व के तहत प्रकाशित पहले सैट की 10 पुस्तकों के हुए लोकार्पण में हिंदी की 10 पुस्‍तकें शामिल हैं, एक नजर-
कविता
1. भीगे डेनों वाला गरुण : विजेंद्र
2. आकाश की जात बता भैया : चंद्रकांत देवताले
3. जहाँ उजाले की एक रेखा खिंची है : नन्द चतुर्वेदी
4. प्रपंच सार सुबोधिनी : हेमंत शेष
कहानी
5. आठ कहानियां : महीप सिंह
6. गुडनाइट इंडिया : प्रमोद कुमार शर्मा
7. घग्घर नदी के टापू : सुरेन्द्र सुन्दरम
अन्य
8. कुछ इधर की-कुछ उधर की : हेतु भारद्वाज
9. जब समय दोहरा रहा हो इतिहास : नासिरा शर्मा
10. तारीख की खंजड़ी : सत्यनारायण

इस सैट को हिंदी के वरिष्‍ठ कवि विजेंद्र, प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक नंदकिशोर आचार्य, साहित्‍यकार डॉ. माधव हाडा, डॉ. लक्ष्मी शर्मा ने उपस्थित साहित्यकारों, पाठकों, पत्रकारों के समक्ष जारी किया।

लोकार्पण समारोह में ही 200 सैट हाथोंहाथ लिए गए। यह एक भांति पुस्‍तक पर्व का शानदार स्‍वागत था। अगले दिन दोपहर तक 100 और सैट का आदेश प्रकाशक को मिल चुका था। और तो और उससे अगले दिन 225 सैट का एक नया आदेश प्रकाशक को और मिला। यह क्रम निरंतर जारी रहा और आज स्थिति यह है कि कुल 1000 सैट में से मात्र कुछ ही बचे हैं।
इससे बेहतर योजना-प्रयोजना क्‍या हो सकती है, किसी प्रकाशक की।
पाठकों के लिए समर्पित तथा किताबों को बचाने की दिशा में की गई इस नवीन पहल के लिए बोधि प्रकाशन के श्री मायामृग (9829018087, mayamrig AT gmail.com) बधाई के पात्र हैं।

एक खुशखबरी राजस्‍थानी साहित्‍य के पाठकों के लिए भी बोधि प्रकाशन की ओर से है, बोधि प्रकाशन अगला सैट राजस्‍थानी का लेकर आ रहे हैं। राजस्‍थानी की दस किताबें, मात्र 100 रूपये में।

पुस्‍तक बचाने की इस पहल के सद् प्रयास हेतु प्रयास संस्‍थान, चूरू ने एक समारोह में श्री मायामृग का सम्‍मान करने का फैसला भी किया है। श्रेष्‍ठ कार्य करने वालों को कौन सम्‍मानित नहीं करेगा, यह सम्‍मानित करने वाली संस्‍थाओं का सौभाग्‍य होता है।

श्रेष्‍ठ कार्य के लिए साधुवाद मायामृग जी। हो सकता है आपके इस कदम से दूसरे प्रकाशक भी कुछ बदलें।
आमीन।