Monday, November 30, 2009

राजस्‍थानी संस्‍कृति और राजस्‍थान से परिचय : रतन जी जैन का कमाल

राजस्‍थान या इससे छूते अंचल से कोई व्‍यक्ति बाहर जाता है तो उसे पहचान मिलती है- मारवाड़ी। उसे मिलने वाला यह संबोधन बरसों पुरानी पहचान को दर्शाता है। एक लम्‍बे संघर्ष को याद करने के प्रति विवश करता है। वह संघर्ष जो राजस्‍थान की अकाल ग्रस्‍ता भूमि में जन्‍मने के बाद यहां के निवासियों ने सीखा। यहां जीवन को परम् सत्‍ता माना गया है। अकाल हो या कोई विभीषिका, जीवन बचाना पहला सूत्र वाक्‍य होता है। जीवन बचाने के लिए अपने स्‍थाई ठिकाने, घर आदि को त्‍याग दिया जाए तो कोई परवाह नहीं। तभी तो यहां कहा जाता है कि 'नर है तो घर है।' मतलब यदि नर जिंदा रहा तो वह फिर से घर का निर्माण कर लेगा, अगर संकटों में आत्‍मविश्‍वास त्‍याग कर जीवन से पलायन कर लिया गया तो फिर क्‍या विकल्‍प बचेगा।
इसी जीवन के प्रति उत्‍साह की सीख का ही परिणाम था कि राजस्‍थान के लोग अकालों में पलायन कर जाया करते थे। जहां दो पैसे का रोजगार और अपनापन दीखता, वहीं जा ठहरते। जमकर मेहनत करते और संचय कर अपने देश में फिर से स्‍थापित होने के सपन संजोते। ऐसी हालातों में उसे नाम मिलता 'मारवाड़ी'।
आज दूसरे प्रांतों में मारवाड़ी को समृ‍द्ध के रूप में जाना जाता है। कुछ भ्रांतियां भी बनी और संचय वृत्ति के कारण हेय का भी जोड़ हुआ परंतु, चिकीर्ष का उत्‍कट उदाहरण बना मारवाड़ी।
इसी परम्‍परा का निर्वाह करते हुए एक शख्‍स से इन दिनों मेरा वास्‍ता पड़ा है। ये हैं, पडि़हारा (चूरू) राजस्‍थान के श्री रतन जैन। श्री रतन जैन हिन्‍दी में मासिक 'मारवाड़ी डाइजेस्‍ट' निकालते हैं। अंतरजाल की खंगाल के बीच से न जाने कहां से रतनजी हाजिर हो उठे, संवाद सार्थक रहा और परिणति हुई- मेरे हाथ में मारवाड़ी डाइजेस्‍ट के अंक आने के रूप में।
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट का सितम्‍बर, अक्‍टूबर और नवम्‍बर- 2009 अंक मुझे डाक से मिलते हैं। मेरे लिए यह सुखद अनुभूति के पल होते हैं। अपनी व्‍यस्‍तता को नजर अंदाज करते हुए मैं अंकों को पलटता हूं तो उनमें खो सा जाता हूं।
यह विरल से सघन में जाने का माध्‍यम नजर आता है मुझे। अपने ही पड़ोस से निकलने वाली पत्रिका का यह दूसरा वर्ष होता है और ये अंक दूसरे वर्ष के 5,6 व 7वां अंक होते हैं।
सितम्‍बर-2009 का अंक 2 वर्ष का 5वां अंक है। सबसे पहले इसी को खंगालता हूं। 'डाइजेस्‍ट क्‍लब' के रूप में संरक्षक और विशिष्‍ट सदस्‍य, सम्‍मानित सदस्‍य की एक लम्‍बी फेहरिस्‍त पाकर मन संतुष्‍ट होता है कि पत्रिका थमेगी नहीं। मजबूत आधार जुटना किसी भी पत्रिका के लिए अनिवार्य होता है और यह आधार रतनजी जैसे कुछ लोग ही जुटा पाता हैं। मुझे यहां स्‍मरण हो आता है, राजस्‍थानी की निकलने वाली एक मासिक पत्रिका का, जो बड़े उत्‍साह से और बड़ी साज-सज्‍जा से निकली लेकिन, दो-चार अंकों के बाद धड़ाम हो गई। ' डाइजेस्‍ट क्‍लब' के भरोसे कहा जा सकता है कि ऐसा इस पत्रिका के साथ नहीं होने वाला।
सितम्‍बर के अंक में ललित आलेख, स्‍वास्‍थ आलेख, कहानियां, धारावाहिक उपन्‍यास, सरस कविताएं आदि अनुक्रम के भाग हैं। स्‍थाई स्‍तम्‍भों में बिन्‍दु-बिन्‍दु सिन्‍धु, जोग लिखी, मानसी, राजस्‍थली, प्राच्‍य भारती, समाचार हैं।
इस अनुक्रम से ही जाना जा सकता है कि पत्रिका का स्‍तर कैसा होगा, निश्चित रूप से रतनजी की सूझबूझ काबिले तारीफ है।
अक्‍टूबर के अंक में डॉ. तारादत्‍त निर्विरोध, ताराचंद आहूजा, अक्षय जैन, डॉ. मनोहर गोयल, वैद्य रायचंद शर्मा, संपत सरल, सोनी सांवरमल, सुधा भार्गव, श्‍यामसुंदर सुमन आदि की रचनाएं उन्‍हीं स्‍तम्‍भों के साथ आती हैं। अंक में धारावाहिक उपन्‍यास 'दशानन' (सीताराम महर्षि) गति पकड़ता नजर आता है।
नवम्‍बर का अंक साध्‍वी संघप्रभा, ललित शर्मा, प्रीति स्‍वर्णकार, डॉ. गिरीश गुप्‍ता, डॉ. विष्‍णु भूतिया, डॉ. पंकज शर्मा, लक्ष्‍मीनारायण रंगा, योगिता यादव, संगीता सेठी, राकेश सैन आदि की रचनाओं से श्रेष्‍ठ बन पड़ा है।
पत्रिका का खास बात यह है कि अंक प्रति अंक 'डाइजेस्‍ट क्‍लब' में तीनो प्रवृत्ति के सदस्‍यों की संख्‍या बढ़ती जाती है। वहीं नवम्‍बर के अंक से एक अच्‍छी पहल है कि समाजसेवा के प्रति समर्पण करने वाले दानवीर का परिचय देने का क्रम भी बना है। इस अंक में ललित शर्मा ने दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़ का परिचय प्रस्‍तुत किया है।
पत्रिका की रचनाओं में हर पहलू से यह प्रयास किया गया है कि उनमें राजस्‍थान की संस्‍कृति और राजस्‍थान से पाठक का परिचय हो। राजस्‍थान से बाहर रहने वाले मारवाड़ी परिवारों की उन संतानों के लिए यह पत्रिका बहुउपयोगी है, जिनका जन्‍म राजस्‍थान से बाहर ही हुआ हो। इस पत्रिका के माध्‍यम से वे अपने पुरखों की धरती से जुड़ सकते हैं, उनके बारे में जान सकते हैं।
पत्रिका का एक पहलू और सुनहरा हो सकता है, यदि इसमें राजस्‍थानी भाषा में रचनाओं की मात्रा कुछ बढाई जाए। इससे भाषाई मोह भी पाठकों में आएगा। अपनापन बढ़ेगा।
ऐसी अच्‍छी पत्रिका के लिए मैं रतनजी जैन को साधुवाद देता हूं और उम्‍मीद करता हूं कि यह स्‍तर बनाए ही नहीं रखें बल्कि, इसमें उत्‍तरोत्‍तर गुणवत्‍ता लाते जाएं।

पत्रिका : मारवाड़ी डाइजेस्‍ट मासिक
आवृत्ति : मासिक
संपादक : रतन जैन
प्रकाशक : मारवाड़ी डाइजेस्‍ट प्रकाशन
ज्ञान भारती मार्ग,
पडि़हारा-331505 चूरू
राजस्‍थान
फोन 01567-240217, 9829442520
मूल्‍य : 150 रूपये वार्षिक, 15 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ : 34 + 4
e-mail : marwaridigest@gmail.com
visit : www.marwaridigest.blogspot.com

Sunday, November 29, 2009

दलित का बयान

हिन्दी साहित् में वाद और विमर्शों का दौर सदैव से ही रहा है। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, छायावाद और भी जाने क्या-क्या। यही हाल उत्तर आधुनिक युग के साहित् का है। यहां नारी विमर्श और दलित विमर्श की धूम है। जल विमर्श तीसरा मोटा विमर्श है। भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के बीच रचा गया साहित् इन मुद्दों पर कहां तक खरा उतरा है, यह बात अलग है परंतु, यह सत् है कि इन विमर्शों के बहाने उस वर्ग को प्रमुखता जरूर मिली है जो आज तक साहित् में एक भांति हाशिए पर था।
दलित विमर्श में दलित तबके की पीड़ाओं और दंशों का दिग्‍दर्शन है। अज्ञान के अंधकार में शोषित होता यह वर्ग धर्म-पाखण्‍ड के जाल में ऐसा उलझा की नीच कर्म को अपनी नियति मानता रहा। शिक्षा का वास्‍ता ऐसी परिस्थितियों में होना असंभव ही था। यह तो भला हो बाबा साहेब अम्‍बेडकर जैसे महापुरूषों का कि उन्‍होंने इस तबके का ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश दिखाया। जैसे ही शिक्षा का प्रसार हुआ, हकों का भान स्‍वाभाविक था। हक पहचाने पर आज तक होते आए शोषण का विशद विवेचन तो होना ही था। और ऐसे ही विशद विवेचन के बीच से नाम निकला- दलित विमर्श।
मराठी से पैदा हुआ दलित विमर्श आगे चलकर दो धाराओं में बंटता है- दलित द्वारा लेखन, दलित के लिए लेखन। स्‍वयं द्वारा भोगी पीड़ाओं का वर्णन और दूसरे द्वारा भोगी पीड़ा का अहसास, ये दो भेद व्‍यापक स्‍तर पर किए गए।
इन दिनों मेरे पास 'बयान' नामक पत्रिका नियमित आती है। बयान के संपादक हैं- मोहनदास नैमिशराय। समकालीन हिन्‍दी साहित्‍य में नैमिशराय का नाम प्रमुखता से स्‍थापित हुआ है। 'अपने-अपने पिंजरें' के दो भाग आज भी नैमिशराय को अन्‍य दलित लेखकों से अलग करते हैं।
बयान के अंकों में साहित्यिक भूचाल हो कुछ ऐसा तो नहीं हैं लेकिन ऐसा साहित्‍य जरूर है जिससे मानसिक भूचाल पैदा होता है। प्राय: दलित लेखकों की आत्‍मानुभूति परक रचनाओं के साथ राजनीति, विश्‍लेषण, भाषा, समीक्षा आदि के नियमित कॉलम बयान में समाहित रहते हैं। कार्यक्रम जो दलित और दलित साहित्‍य पर केंद्रित होते हैं, की विस्‍तृत रपट, सबको जोड़े रखती है। साक्षात्‍कार के बहाने आत्‍म मंथन किया जाता है और प्रेरणा चिह्न छोड़ते हुए आगे बढ़ा जाता है।
बयान का नवम्‍बर-2009 अंक 4थे वर्ष का अंक है। कुल मिलाकर यह 40वां अंक। रूपचंद गौतम व मनीषा दहिया का सहायक संपादन मेहनत को दर्शाता है। नैमिशराय इन दिनों शिमला के राष्‍टरपति भवन में यहां हैं। वहां से संपादन का जिम्‍मा बखूबी निभाना लक्ष्‍य के प्रति समर्पण दिखाता है।
इस अंक में रत्‍नकुमार सांभरिया का विश्‍लेषण 'कफ़न का सच' व विमर्श के बीच 'राजनीति में साहित्‍यकार की हैसियत' सनसनीखेज हैं। कहानियों और कविताओं का मिश्रण पत्रिका के साहित्‍य स्‍वरूप को निखारता है। वहीं हर रचना के माध्‍यम से एक दलित अपने को प्रकट करता हुआ नजर आता है तभी तो एक मायने में कहा जा सकता है कि यह पत्रिका दलित का बयान है। दलित दस्‍तावेज है।
मोहनदास नैमिशराय को साधुवाद।

पत्रिका : बयान
आवृत्ति : मासिक
संपादक : मोहनदास नैमिशराय
प्रकाशक : बयान मासिक
बी.जी. 5ए/30-बी, पश्चिम विहार,
नई दिल्‍ली-110063
फोन 011-25268414, 42316106, 9350862298
मूल्‍य : 10 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ : 58 + 4

Wednesday, November 25, 2009

कविता के माध्‍यम से कवि का संबोधन

राजस्थान की हिन्दी पत्रकारिता काफी सुदृढ़ रही है। आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद में काल विभाजन कर इसका मूल्यांकन समय-समय पर होता रहा है। आजादी के बाद के काल का मूल्यांकन किया जाए तो राजस्थान की पत्रिकाओं 'संबोधन' का बड़ा स्थान है। 'संबोधन' को मासिक 'लहर' की अगली कड़ी के रूप में देखा जाता रहा है। राजसमंद का कांकरोली कस्बा साहित्यिक धरातल पर संबोधन के कारण पहचाना जाता है। यहां से श्री कमर मेवाड़ी गत 43 वर्ष से त्रैमासिक 'संबोधन' का प्रकाशन कर रहे हैं। हिन्दी साहित् के लिए यह फ़ख्र की बात है।
कांकरोली का कमर मेवाड़ी के कारण और महत्‍व इसलिए बढ़ जाता है कि वे संबोधन के मार्फत प्रतिवर्ष आचार्य निरंजननाथ पुरस्‍कार समारोह आयोजित करते हैं।
इन दिनों मैंने संबोधन के 44 वर्ष का पहला अंक पढ़ा है। यह अक्‍टूबर-दिसम्‍बर, 2009 के अंक के रूप में है। मेवाड़ी जी ने इसे बड़े ही करीने से सजाया है। इस सजावट में इस अंक के अतिथि संपादक असद जैदी का योगदान भी मेवाड़ी जी को मिला है। आंतरिक और बाह्य दोनों रूपों से बेहतर अंक है। संबोधन के विशेषांकों की परम्‍परा से जुड़ा यह अंक 'समकालीन युवा कविता अंक' के रूप में है।
श्री असद जैदी 'हिन्‍दी कविता के पिछले बीस साल' के बहाने अपनी बात कहने का प्रयास करते नज़र आते हैं। बात संपूर्ण हुई या नहीं हुई यह बात अलग है, लेकिन बात में से बात यह जरूर काम की निकलती है कि युग विभाजन की तस्‍वीर के बीच जैदी जी भरमाते हैं- 'हम जिस युग में रह रहे हैं उसकी शुरूआत 1989-90 से हुई, इससे पहले की दुनिया कुछ और थी----।'
बाबरी मस्जिद घटनाक्रम के बाद एक नए युग की शुरूआत हुई थी, जिससे हिन्‍दी कविता आंदोलित हुई। इसी आंदोलित कविता के बीच से कई नाम हिन्‍दी साहित्‍य में उभरते हैं जो यथार्थ की जमीन पर टिके नजर आने के साथ-साथ यथार्थ प्रकट करने में दक्ष होते हैं। 'संबोधन' के इस अंक में ऐसे ही कई नाम शुमार हैं, जिन्‍हें पढ़कर अंक की सार्थकता महसूस होती है।
अंक में ढेरों युवा कवि हैं। अंशुल त्रिपाठी, अनीता वर्मा, अरूण शीतांशु, कृष्‍ण कल्पित, कुमार अनुपम, कुमार वीरेन्‍द्र, केशव तिवारी, गिरिराज किराड़ू, गीत चतुर्वेदी, ज्‍योत्‍सना शर्मा, तरूण भारतीय, नरेश चन्‍द्रकर, निर्मला गर्ग, नीलेश रघुवंशी, पंकज चतुर्वेदी, परमेन्‍द्रसिंह, पवन करण, प्रकाश, प्रभात, मंजरी दुबे, मनोज कुमार झा, मृत्‍युंजय, यतीन्‍द्र मिश्र, रवीन्‍द्र स्‍वप्निल प्रजापति, व्‍यामेश शुक्‍ल, शिरीष कुमार मौर्य, शिव प्रसाद जोशी, शैलेय, संजीव बख्‍़शी, सर्वेन्‍द्र विक्रम, सुन्‍दरचंद ठाकुर आदि इस विशेषांक में स्‍थान पाते हैं।
अंक की कविताएं बेहतर है, शिल्‍प के स्‍थान पर भावों को प्रधानता मिलना समकालीन कविता की विशेषता है।

पत्रिका : सम्‍बोधन
आवृत्ति : त्रैमासिक
संपादक : कमर मेवाड़ी
प्रकाशक : सम्‍बोधन
कांकरोली-313324
जिला- राजसमंद, राजस्‍थान
फोन 02952-223221, 9829161342
e-mail : qamar.mewari@rediffmail.com
मूल्‍य : 2100 रूपये आजीवन, 200 रूपये तीन वर्ष के लिए, 20 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ :186

Monday, November 23, 2009

हंस के बहाने निराशा बकलम प्रभा खेतान

मासिक 'हंस' हिन्‍दी की बेहतरीन पत्रिकाओं में से एक है। जाने-माने कथाकार राजेन्‍द्र यादव का एक अद्भुत प्रयोग। समकालीन विमर्शों और विवादों का 'हंस' सदैव केंद्र बिंदु रही है। हंस के बहाने श्री यादव अपने विचारों को हवा देते रहे हैं और हंस को भी इससे लाभ मिलता रहा है। हंस में कभी स्‍नोबावार्ने का हौव्‍वा खड़ा होता है तो कभी यादव-नामवर टकराहट। कुछ भी कहो, हंस साहित्‍य का केंद्र है। राजेन्‍द्र यादव के कथनानुसार दिल्‍ली में न रहने वाला साहित्‍याकर जैसे चर्चाओं के केंद्र में नहीं रहता वैसे ही हंस में प्रकाशित न होने वाला रचनाकार चर्चा में नहीं रहता। और तो और 'हंस' न पढ़ने वाला पाठक भी समकालीन चर्चाओं से परिचित नहीं हो पाता।
हंस ने न केवल वैचारिक धरातल पर नए मुकाम हासिल किए हैं अपितु रचनात्‍मक धरातल को भी मजबूती दी है। यादवजी ने कितने ही नए रचनाकार हंस के माध्‍यम से खड़े कर दिए हैं, जो आने वाले समय में लम्‍बी दौड़ दौड़ने वाले हैं।
हंस का हर एक अंक विशिष्‍ट होता है। परंतु, जब से हंस के अंदर प्रभा खेतान पर विशेषांक निकालने की खबर प्रकाशित हुई, मन व्‍यग्र हो उठा। इंतजार न जाने क्‍यों लम्‍बा होता जा रहा था।
जैसे ही हंस का नवम्‍बर, 2009 अंक हाथ में आया तो बांछें खिल उठी। आवरण पर लिखा मिला - 'स्‍त्री विमर्श : अगला दौर/ स्‍मृति प्रभा खेतान' । परंतु, जैसे ही अंक में घुसते गए निराशा होती गई। यह पहला अवसर था जब हंस के अंक से निराशा हुई।
इस अंक में 'प्रभा खेतान के बहाने : नारीवाद की हिंदी-राजनीति' (अभय कुमार दुबे) व 'अरे, ये लाइन क्‍यों कट गई?' (राजेन्‍द्र यादव) दो ही ऐसे आलेख हैं, जो प्रभा की स्‍मृति से ओतप्रोत हैं। इनमें श्री यादवजी के आलेख का कुछ भाग तो पूर्व प्रकाशित भी है।
प्रभा खेतान का हंस इस ढंग से स्‍मरण करेगा, सोचा भी न था। क्‍या दो-चार आलेख और प्रभा की कुछ रचनाएं अंक में नहीं आनी चाहिए थी? हालांकि अंक में सामग्री दूसरे नज़रिये से काफी महत्‍वपूर्ण हैं परंतु, किसी पर अंक केंद्रित करने के अलग दायित्‍व बन जाते हैं। संपादकीय में राजेन्‍द्रजी यादव खीझ निकालते हैं कि प्रभा के घर से कोई सहयोग नहीं मिला। कौनसा प्रभा का घ्‍ार ? वह, जहां संदीप भूतोडि़या अपना व्‍यापारिक साम्राज्‍य स्‍थापित किए है, या वह जहां श्री मोहन कुमार विवशता के साथ ताक रहे हैं?
प्रभा खेतान की बहुत सी रचनाएं विभिन्‍न लघु पत्रिकाओं में छपी हैं, अच्‍छा होता यादव जी उनको ही 'हंस' के विस्‍तृत कैनवास पर स्‍थान देते। या फिर प्रभा से जुड़े लोगों से एक-एक आलेख मांगते। प्रभा के घर से सहयोग की कल्‍पना करना भी अब बेमानी है। यादवजी अगर अब सोचते हैं कि प्रभा के घर से सहयोग मिलेगा और वे बेहतरीन अंक को अंजाम देंगे तो यह उनका कोरा भ्रम है। भला हो यह बात यादवजी तक पहुंचे। यादवजी को बगैर पारिवारिक सहयोग के अंक निकालने की हिम्‍मत करनी चाहिए थी।
खैर ...... अभी वक्‍त नहीं गुजरा है, यादवजी और सफ़ल प्रयास करेंगे। प्रभा खेतान को सच्‍ची श्रद्धांजलि तभी होगी।
पत्रिका : हंस
आवृत्ति : मासिक
संपादक : राजेन्‍द्र यादव
प्रकाशक : अक्षर प्रकाशन प्रा.लि.
2/36, अंसारी रोड, दरियागंज,
नई दिल्‍ली-110002
फोन : 011-23270377, 41050047
e-mail : editorhans@gamail.com
visit : www.hansmonthly.in
मूल्‍य : 250 रूपये वार्षिक, 5000 रूपये आजीवन

Saturday, November 21, 2009

सरिता के स्‍वरों के बीच डूबकी

'वीणा' कैसेट का राजस्‍थानी लोक संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय काम है। गत वर्षों में श्री के.सी.मालू के निर्देशन में वीणा ने अनेक कैसेट बाज़ार में उतारे और अप्रत्‍याशित सफलता अर्जित की। पाश्‍चात्‍य प्रभाव के कारण परंपरागत लोक गीत और लोक संगीत के प्रति मोह भंग होती राजस्‍थान की जनता के लिए वीणा वरदान बनकर उभरी।
कभी पीछे न मुड़कर देखने वाले के.सी. मालू ने राजस्‍थान के लोक मानस को टटोला। पुराने के प्रति मोह और नवीन के प्रति आकर्षण के द्वंद्व के बीच झूलते लोक की नब्‍ज मालू के हाथ में आसानी से आ गई। बाजारीकरण के युग में उन्‍होंने लोकगीत-लोकसंगीत का बाज़ारीकरण किया। परंपरागत धुनों और गीतों के साथ नवीन प्रयोगों के कारण उन्‍हें आलोचना भी झेलनी पड़ी। परंतु, यह सत्‍य और सटीक है कि के.सी. मालू ने लोक की रचनाओं को बचाने का काम भी किया। भले ही लोक को वीणा के माध्‍यम से प्राचीन माल ही नवीन ढंग से परोसा गया हो परंतु, वह उसे रास आया।
विभिन्‍न आलोचनाओं के बीच यह कहा जाये कि वीणा ही वह माध्‍यम बनी, जिसके कारण फिल्‍मी गीत बजने वाली जगह राजस्‍थानी संगीत बजने लगा, तो वीणा के योगदान का मूल्‍यांकन हो सकेगा।
ऑडियो के क्षेत्र में आगे बढ़ने के बाद वीणा ने विडियो क्षेत्र में कदम रखा तो नृत्‍य के क्षेत्र राजस्‍थान ने अपार संपदा सौंपी। परंपरागत नृत्‍य की भरमार राजस्‍थान में सदैव से ही रही है। घूमर तो जग विख्‍यात है। चरी, भवाई, कालबेलिया, मयूर, कच्‍छीघोड़ी आदि नृत्‍य भी किसी मायने में कम नहीं। वीणा ने इन्‍हीं सबके समिश्रण में युवा कलाकारों को थिरकाया। गीत-संगीत-वेशभूषा के साथ-साथ राजस्‍थान की शानदार शूटिंग लोकेशन ने भी वीणा का साथ दिया। यह प्रयोग भी चल निकला।
सफलताएं जब कदम चूमने लगती हैं तो व्‍यक्ति नितांत निज बनता चलता है। लेकिन इसके उलट के.सी. मालू सार्वजनिक होते चले गए। राजस्‍थान के सुजानगढ् (चूरू) में गुजारे गए मुफलिसी के दिन मालू कभी नहीं भूले। और न ही भूले सुजानगढ़ की समृद्ध संगीत परम्‍परा को। शंभु सेन, समीर सेन, दलीप सेन की भूमि सुजानगढ़ की प्रेरणा ही रही कि के.सी. मालू ने वीणा अकादेमी की स्‍थापना की। लोक संगीत के जानकारों का ज्ञान अर्जित कर विभिन्‍न प्रयोग किए गए। लुप्‍त होते गीत और गीतों के संग्रहों के एकत्रीकरण का काम शुरू किया गया। लोक वाद्यों के भण्‍डारण का काम द्रुत गति से किया गया। इन सबके बीच अकादेमी के माध्‍यम से देश के विभिन्‍न अंचलों में सांस्‍कृतिक प्रस्‍तुतियां दी गई।
यह क्रम अभी जारी ही था कि इसी बीच से एक और सरिता बह निकली। मासिक पत्रिका 'स्‍वर सरिता' के बहाने।
गत दिनों महाकवि कन्‍हैयालाल सेठिया की प्रथम पुण्‍यतिथि पर श्री के.सी. मालू अपने गृह नगर सुजानगढ़ आए। वहीं उनकी भेंट राजस्‍थानी के वयोवृद्ध साहित्‍यकार श्री बैजनाथ्‍ा पंवार से मुलाकात हुई। वहीं पंवारजी को'स्‍वर सरिता' के अंक समर्पित हुए, जो आगे चलकर मेरे हाथों में आए।
'स्‍वर सरिता' के सितम्‍बर व अक्‍टूबर-2009 अंक मेरे सामने हैं। इन दिनों का यह एक और सुखद अहसास है। अंक आकर्षक ही नहीं मोहक भी हैं। रंगीन ग्‍लेज्‍ड कागज पर बेहतरीन साज-सज्‍जा के साथ पत्रिका 'राजस्‍थान सुजस' की याद दिलाती है।
आंतरिक ढांचें के रूप में संपादक श्री देवदत्‍त शर्मा का रचना-चयन मजबूती से खड़ा है। याद आ रहा है कि श्री देवदत्‍तजी से पहला वास्‍ता भी 'राजस्‍थान सुजस' के माध्‍यम से पड़ा था। उनका अनुभव 'स्‍वर सरिता' के काम आ गया। यहां, यह उम्‍मीद भी की जा सकती है कि उनका 'स्‍वर सरिता' को लम्‍बा साथ मिलेगा। उन्‍हें काम करना भी चाहिए क्‍योंकि, राजस्‍थान की संगीतमय-सुरमय-स्‍वरमय धरती में दोहन योग्‍य बहुत सामग्री है।
गीत-संगीत के क्षेत्र में डॉ. जयचंद्र शर्मा (बीकानेर) के बाद काम पर विराम सा लग गया था, अब 'स्‍वर सरिता' ने मौन को तोड़ा है। दूसरे वर्ष के 3,4 अंक देखकर कहा भी जा सकता है कि सिर्फ मौन टूटा ही नहीं, बुलंद आवाज के साथ राजस्‍थानी संगीत और राजस्‍थान की संगीत परंपरा ने अगड़ाई ली है। सुप्‍त अवस्‍था समाप्ति के बाद जागृत अवस्‍था की लहर राजस्‍थान को पाटते हुए अखिल भारतीय स्‍तर पर दिखनी चाहिए। तब आनंद आए। बहरहाल, शुरूआत के लिए श्री के.सी. मालू को बधाई।
सितम्‍बर के अंक में मंदिर परंपरा के पखावजी, ब्रज का लोक संगीत, मध्‍य भारत का लोक संगीत, हरियाणवी लोकगीत आदि आलेखों के साथ-साथ लता मंगेशकर पर विशेष सामग्री है। वहीं अक्‍टूबर के अंक में लोक तथा शास्‍त्रीय संगीत का पारस्‍परिक सम्‍बन्‍ध, संगीत सम्‍बन्‍धी गद्य-ग्रन्‍थ, जैन योग में संगीत का स्‍थान, मेवाती विवाह गीत, श्रेष्‍ठ है संगीत आदि आलेख हैं। इसी अंक में गवरी देवी, कन्‍हैयालाल वर्मा, रवि शंकर के सम्‍मान में भी सामग्री है।
पत्रिका : स्‍वर सरिता
आवृत्ति : मासिक
प्रकाशक : श्री के.सी. मालू
(प्रधान संपादक)
हल्दिया हाउस, जौहरी बाजार,
जयपुर-302003
फोन : 0141-2570517, 2572666
संपादक : डॉ. देवदत्‍त शर्मा
मूल्‍य : 15 रूपये प्रति अंक
पृष्‍ठ : 34 + 4

Monday, November 16, 2009

युग दर्शन : कलि कथा के बहाने



पुस्‍तक : कलि कथा - वाया बाइपास
लेखिका : अलका सरावगी
प्रकाशक : आधार प्रकाशन प्रा.लि.
एस.सी.एफ. 267, सेक्‍टर-16,
पंचकूला-134113 हरियाणा
aadhar@sancharnet.in
प्रकाशन वर्ष : 1998
पृष्‍ठ : 216
मूल्‍य : 150 रूपये
ISBN : 81-7675-069-7

Wednesday, November 11, 2009

एक दलित की आत्‍मकथा : सच को उघाड़ने की प्रमुखता












































पुस्‍तक : अपने अपने पिंजरे, दो भाग
लेखक : मोहनदास नैमिशराय
विधा : आत्मकथा
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
21-, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
प्रथम संस्‍करण : 1995
तृतीय संस्करण : 2006
मूल्‍य : 60 रूपये प्रति भाग, पेपरबैंक
फोन 011-23273167, 23275710
e-mail : vani_prakashan@yahoo.com

Tuesday, November 10, 2009

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