Wednesday, December 16, 2009

कवि विजेन्‍द्र का आभार

कल ही 'बदळती सरगम' (राजस्‍थानी कहानी संग्रह-नंद भारद्वाज) पूरी की। नया ज्ञानोदय और कथादेश के अंकों की पठनीय सामग्री को पढ़ने के क्रम से भी मुक्‍त हुआ।
'बदळती सरगम' निश्चित रूप से नंद भारद्वाज की बेहतरीन कहानियों का संग्रह है। बात को संक्षिप्‍त में न समेटा जाए इसलिए एक पूरी पोस्‍ट उस पर लिखी जानी चाहिए।

इसी बीच मासिक हंस तथा बयान का दिसम्‍बर-2009 अंक भी आ गया।

एक और उल्‍लेखनीय बात रही कि लोक चेतना की साहित्यिक पत्रिका 'कृति ओर' का 54वां अंक अक्‍टूबर-दिसम्‍बर-2009 ख्‍यातनाम कवि विजेन्‍द्र की ओर इस दौरान प्राप्‍त होता है।

विजेन्‍द्र के प्रधान संपादकत्‍व वाली यह पत्रिका इन दिनों डॉ. रमाकांत शर्मा, जोधपुर के संपादकत्‍व में निकल रही है।
इस अंक में डॉ. जीवन सिंह (ईमानदारी और आलोचना की प्रामाणिकता) व दूधनाथ सिंह (हिंसक लालित्‍य का कवि चार्ल्‍स बॉदलेयर) आलेख उल्‍लेखनीय हैं। कुमार वीरेंद्र, रामकुमार आत्रेय, बलराम कांवट, मीठेश निर्मोही, सुरेश सेन निशांत, अशोक तिवारी की कविताएं सराहनीय हैं। डॉ. शिवकुमार मिश्र से बातचीत (डॉ. हरियशराय) भी पत्रिका की महत्‍ता बढ़ाती है।

पत्रिका : कृति ओर
आवृत्ति : त्रैमासिक
प्रधान संपादक : विजेन्‍द्र
संपादक : डॉ. रमाकांत शर्मा
संकेत, ब्रह्मपुरी-प्रतापमंडल,
जोधपुर, 9414410367
शुल्‍क : एक प्रति 20 रूपये, वार्षिक 70 रूपये, आजीवन 1000 रूपये
पृष्‍ : 80

श्री विजेन्‍द्र और डॉ. रमाकांत शर्मा का आभार।

Tuesday, December 8, 2009

साहित्‍य नगरी बीकानेर : अन्‍नाराम सुदामा की छाया

कब क्‍या संयोग बन पड़े, व्‍यक्ति नहीं जान पाता। पिछली पोस्‍ट में कुछ पढ़ने का संकल्‍प किया था, यकायक निजी काम आ बना और बीकानेर जाना पड़ा। जी हां, वही बीकानेर जिसे राजस्‍थान में 'साहित्‍य नगरी' के रूप में जाना जाता है।
अब साहित्‍य नगरी में गये तो कुछ साहित्यिक यादें भी लेकर आए। चर्चा उन्‍हीं की।
काम के सिलसिले में साहित्‍यकार डॉ. मदन सैनी से मिलना होता है। ढेरों चर्चाएं, गप्‍पे होती हैं। 'भोळी बातां', 'फुरसत' आदि कालजयी राजस्‍थानी कहानी संग्रहों के रचयिता और स्‍नेही डॉ. मदन सैनी मुझे काफी अपनत्‍व के साथ 'कोटगेट' छोड़ते हैं। (7 दिसम्‍बर, 2009, प्रात: 9.30 बजे।) कोटगेट बीकानेर का प्रसिद्ध स्‍थान है। पुरातत्‍व विभाग द्वारा इसे संरक्षित भी घोषित किया हुआ है। सैलानियों का कभी-कभी यह गेट आकर्षण भी बनता है।
मैं इसी कोटगेट से मन में संकल्‍प लिए आगे की ओर बढ़ता हूं। थोड़ा ही चलने पर मुझे एक भवन दिखाई देता है। ध्‍यान से देखा तो कॉलेज के दिन स्‍मरण हो आए। भवन के आगे से गुजरते हुए उन दिनों सोचा था, कि इसी के पास रहते हैं, हमारे डॉ. मनोहर शर्मा। उनसे मिलूंगा। लेकिन उन दिनों वह नहीं हो पाया और साहित्‍यकार डॉ. मनोहर शर्मा हमसे दूर चले गए। जी, यह नागरी भंडार है। बीकानेर की साहित्यिक गोष्ठियों का आगार। हिन्‍दी विश्‍वभारती के कार्यक्रम यहीं से संचालित होते रहे हैं। कभी पहले यहां राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी का कार्यालय भी हुआ करता था।
नागरी भंडार में एक पुस्‍तकालय भी संचालित है और इन दिनों 'विकास प्रकाशन, बीकानेर' का कार्यालय भी।
विकास प्रकाशन जाने-माने साहित्‍यकार और सिद्ध साहित्‍य के विद्वान श्री सूर्यशंकर पारीक के सुपुत्र द्वारा संचालित है।
विकास प्रकाशन में खोज होती है, लेकिन कुछ ऐसा नहीं पाता हूं, जो फि़लहाल खरीदा जा सके।
थोड़ा आगे निकलते ही बीकानेर का रेलवे स्‍टेशन आता है। रेलवे स्‍टेशन से ठीक सामने की सड़क पर मेरे कदम अनायास ही बढ़ जाते हैं। न जाने कहां से कदमों में त्‍वरा प्रवृत्ति आ जाती है। मन भी आवेशित-सा लगता है।
थोड़ा-सा चलते ही साइन बोर्ड मेरी नज़रों में आता है। मैं ठिठकता हुआ रूक जाता हूं।
भीनासर के शुभु पटवा ख्‍यातनाम पत्रकार, जिनसे मेरा बी.ए. के दौरान पत्र-व्‍यवहार था, याद हो उठते हैं। वे बीकानेर में ही हैं, उनसे मिलने का भी मन हो उठता है, लेकिन साइन बोर्ड पर लिखा 'गंगाशहर' मुझे ज्‍यादा आकर्षित करता है। कारण कि यहां मेरे प्रिय राजस्‍थानी कथाकार श्री अन्‍नाराम सुदामा रहते हैं। उन्‍हीं सुदामाजी से मिलने का संकल्‍प ले मैं डॉ. सैनी से विदा हुआ था।
मीरां पुरस्‍कार, सूर्यमल्‍ल मीसण शिखर पुरस्‍कार, कमला गोइन्‍का साहित्‍य पुरस्‍कार और हाल ही मिले एक लाख के लखोटिया पुरस्‍कार से समादृत अन्‍नाराम सुदामा। बीसाधिक पुस्‍तकों के रचयिता। 'मैकती काया : मुळकती धरती', 'मैवै रा रूंख' जैसे राजस्‍थानी उपन्‍यास अन्‍नाराम सुदामा की पहचान हैं।
गोगागेट होते हुए मैं गंगाशहर की ख्‍यातनाम प्‍याउ के पास से गुजरता हुए पेट्रोल पम्‍प के सामने जा ठहरता हूं। एक बार पूछना पड़ता है कि अन्‍नाराम जी का घर ? हालांकि मैं 1996 में यहां आ चुका था, लेकिन वे परिपक्‍वता के दिन नहीं थे।
एक पीसीओ की तरफ इशारा होता है, और वहां मुझे अन्‍नारामजी का पोता मिलता है। सज्‍जन युवा अन्‍नारामजी के संस्‍कारों का अनुसरण करता है और मेरे आगे-आगे हो लेता है। सौ कदम चलते ही मेरे प्रिय राजस्‍थानी कथाकार अन्‍नाराम सुदामा का वहीं कमरा सामने होता है, जो सन 1996 में हमारी प्रथम मुलाकात का माध्‍यम बना था। मैं स्‍मृतियों में खो जाता हूं।
यकायक श्री अन्‍नारामजी आते हैं और मुझे थाम लेते हैं। वे भी मुझे न भूल पाए थे।
बातों का सिलसिला सन 1996 से ही शुरू होता है और फिर तो थमने का नाम ही नहीं लेता।
समकालीन राजस्‍थानी साहित्‍य, इक-दूजे का सृजन, समाज में खत्‍म होते नैतिक मूल्‍य, पुरस्‍कारों की आपा-धापी, राजनीति और बीकानेर में सुधार, मिली पुरस्‍कार राशि और परिवार, विश्‍वविद्यालयों के शिक्षकों का गिरता आचरण और न जाने कितने विषय हमारे बीच बिखर जाते हैं। ऐसे विषय जो कभी समेटे न जा सकते हों।
चाय-कॉफी मैं कभी नहीं पीता, इस कारण सुदामाजी मुझे जबरदस्‍ती नाश्‍ता करवाते हैं, अखरता है। सोचता हूं कि चाय शुरू कर देनी चाहिए। ऐसे मौकों पर एक व्‍यक्ति आवभगत और क्‍या करे ? लेकिन दूसरे क्षण विचार दूर छिटक जाता है।
सुदामाजी का उल्‍लास और बार-बार प्रशंसा करने का तरीका, मुझे भी उल्‍लसित करते हैं। वहीं, उनकी आतंरिक पीड़ाएं मुझे आंदोलित भी करती हैं। ऐसी पीड़ाएं जो एक साहित्‍यकार ही झेलता है। सोचता हूं, अन्‍नाराम सुदामा ने अपनी निज पीड़ाओं से वास्‍ता करवाकर क्‍या मुझे साहित्‍य सृजन हेतु प्‍लाट नहीं दिया। परंतु, अभी नहीं, उनके बाद, विचार आता है।
पीड़ाओं के बीच वे खुश हैं। खुश इसलिए कि एक साहित्‍यकार के मान के कारण कभी-कभी समस्‍याएं भी हल हो जाती हैं। अपने शिष्‍य श्री अर्जुन मेघवाल (Retd. I.A.S.), सांसद लोकसभा क्षेत्र, बीकानेर के प्रसंग वे बीच में छेड़ते हैं और ढेरों बातें बताते हैं। शिष्‍य-सांसद का बार-बार घर आकर जाना और कुशलक्षेम पूछते रहना, सुदामाजी को सुहाता है।
परंतु, दुनिया को मार्ग दिखाने का संकल्‍प लिए पूरी उम्र सृजनधर्मिता में जीने वाला व्‍यक्ति जब समाज को उसी ढर्रे पर खड़ा देखता है तो दु:ख होना स्‍वाभाविक है। सांसद चर्चा जैसे कुछ क्षणों को छोड़कर पूरी मुलाकात में यही दु:ख उभरता रहता है।
बातों का अनथक सिलसिला खत्‍म होने का नाम नहीं लेता, हालांकि दो घण्‍टे से ज्‍यादा का वक्‍त गुजर चुका था। आगे के बाकी निजी काम मुझे विवश करते हैं, मैं चरण-स्‍पर्श कर खड़ा हो लेता हूं।
पिछले दसाधिक सालों में मेरे साथ हो रहे पत्र-व्‍यवहार में जो सुदामाजी का अपनत्‍व भाव झलकता रहा है, वैसा ही मैं फिर से उनमें देखता हूं। सुदामाजी मेरे साथ हो लेते हैं, बगैर पैरों में कुछ पहने। मेरे मना करते रहने को अनसुना करते हुए वे सड़क तक मुझे छोड़ते हैं। काफी हिदायतों के साथ।
और मैं लौट पड़ता हूं उनसे बहुत कुछ लेकर ----------।

Sunday, December 6, 2009

इन दिनों की खुराक तैयार

अभी आज ही डाक से मेरे पास दो पत्रिकाएं पहुंची हैं। पहली है भारतीय ज्ञानपीठ से श्री रवीन्‍द्र कालिया के संपादन में निकले वाली मासिक 'नया ज्ञानोदय' और दूसरी है सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. की श्री हरिनारायण के संपादकत्‍व वाली मासिक 'कथादेश'। दोनों ही पत्रिकाओं के दिसम्‍बर-2009 अंक हैं।
इन दोनों को इन दिनों में ही मुझे मनोयोग से पढ़ना है। तब कुछ लिख पाउंगा, बहरहाल, पढ़ने की सबसे पहले ललक 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित एक रचना के प्रति है। शायद वह ललक आपमें भी होगी, वह रचना है- महात्‍मा गांधी कृत 'हिन्‍द स्‍वराज' कृति। नया ज्ञानोदय के दिसम्‍बर-2009 अंक में 'हिन्‍द स्‍वराज' की अविकल प्रस्‍तुति की गई है। नया ज्ञानोदय के पृष्‍ठ 87 से लेकर 113 तक।


पत्रिका : नया ज्ञानोदय
आवृत्ति : मासिक
संपादक : रवीन्द्र कालिया
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ
18, इंस्टीट्यूशनल एरिया,
लोदी रोड, पो.बॉक् नं.-3113,
नई दिल्ली-110003
फोन : 011-24626467, 24654196
e-mail : nayagyanoday@gmail.com
मूल्‍य : 30 रूपये प्रति अंक, 300 रूपये वार्षिक
पृष्‍ठ : 120 + 4
वहीं 'कथादेश' का अनुक्रम भी अपनी ओर खींचने वाला है। परंतु, प्रथम रचना के रूप में इस अंक में मैं श्री गिरिराज किशोर का आलेख ' विष्णुजी के बेटे अतुल की डायरी पढ़ते हुए' को लेना चाहूंगा। ओमप्रकाश वाल्मीकि का 'मेरी कविताओं का आन्तरिक यथार्थ' का स्थान दूसरा
होगा। हर हमेस की तरह सत्यनारायण की 'यायावर की डायरी' तो खंगालनी ही खंगालनी है।
पूरा अंक चाटने के बाद क्या विमर्श उभरता है, चर्चा करेंगे।
पत्रिका : कथादेश
आवृत्ति : मासिक
संपादक : हरिनारायण
प्रकाशक : सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि.,
सी-52/जेड-3, दिलशाद गार्डन,
दिल्ली-110095
फोन : 011-22570252
e-mail : kathadeshnew@gmail.com, kathadeshsahyatra@hotmail.com
मूल्‍य :
पृष्‍ठ : 98 + 4


दो पुस्‍तकों के प्रति मोह :-

पिछले कुछ समय से भागमभाग ऐसी रही कि एक-दो बेहतरीन पुस्‍तकें पढ़ने से छूट गया। वैसे तो जीवन में भी यही भागमभाग बनी रहती है, न जाने क्‍या-क्‍या छूट जाता है। कॉलेज के दिनों से ही मन में था कि महाश्‍वेता देवी का '1084वें की मां', चतुरसेन शास्‍त्री का 'गोली', रवीन्‍द्रनाथ टैगोर का 'गोरा' उपन्‍यास पढ़ूंगा, आगे चलकर शिवाजी सावंत के 'महामृत्‍युंजय' की अभिलाषा बनी। परंतु, उपलब्‍धता का अभाव कहें या प्रयास की कमी, ये अब तक छूटे पड़े हैं। जिंदगी करीने से सजी मिलने से रही, और उसकी सजावट में तल्‍लीनता ऐसे खेल खिलाती है कि सबकुछ छूटता चलता है।
ऐसे ही छूटने वाली पुस्‍तकों में दो पुस्‍तकों को बड़ी हिम्‍मत के साथ आलमारी में से उठाकर मेज पर ला पटका है। अब शायद ही ये छूट सकें। इ‍न दिनों में इन पर ही धावा रहेगा। ये पुस्‍तकें राजस्‍थानी व हिन्‍दी के ख्‍यातनाम हस्‍ताक्षर श्री नंद भारद्वाज की हैं- 'आगे खुलता रास्‍ता' (उपन्‍यास) व 'बदळती सरगम' (राजस्‍थानी कहानी संग्रह)। श्री भारद्वाज साहब का स्‍नेह रहा कि उन्‍होंने वक्‍त पर एक-एक प्रति सादर प्रेषित की। मगर अफसोस, कि मैं उनको अब तक पढ़ न पाया। खैर -----
अब दृढ़ निर्णय के साथ पुस्तकें सामने हैं। पढ़ने के बाद ही चर्चा समीचीन होगी। वैसे 'आगे खुलता रास्ता' श्री नंदजी के पूर्व प्रकाशित राजस्थानी उपन्यास 'साम्ही खुलतो मारग' का हिन्दी अनुवाद एवं पुनर्सृजना है। श्री नंदजी को इस राजस्थानी उपन्यास पर ही केन्द्रीय साहित् अकादेमी पुरस्कार मिला था।
'बदळती सरगम' राजस्थानी कहानियों का संग्रह है। इसमें कुल 10 कहानियां हैं। नंदजी का कहानियों पर काफी काम है और बड़ी मात्रा में उनकी कहानियां भी हैं पिछले ही वर्षों में नेशनल बुक ट्रस् ऑफ इंडिया से राजस्थानी कहानियों का 'तीन बीसी पार' नाम से संपादन कर नंदजी ने काफी ख्याति बटोरी थी। श्री नंद भारद्वाज की 'बदळती सरगम' क्या बदलाव पेश करती हैं, चर्चा करेंगे।
पुस्‍तक : आगे खुलता रास्‍ता
लेखक : नंद भारद्वाज
विधा : उपन्‍यास
प्रकाशक : रचना प्रकाशन
57, नाटाणी भवन, मिश्रराजाजी का रास्‍ता,
चांदपोल बाजार, जयपुर-302001
संस्‍करण : 2009
ISBN : 978-81-89228-64-4
मूल्‍य : 200 रूपये
पृष्‍ठ :224

पुस्‍तक : बदळती सरगम
लेखक : नंद भारद्वाज
विधा : राजस्‍थानी कहानी
प्रकाशक : रचना प्रकाशन
57, नाटाणी भवन, मिश्रराजाजी का रास्‍ता,
चांदपोल बाजार, जयपुर-302001
संस्‍करण : 2009
ISBN : 978-81-89228-63-7
मूल्‍य : 200 रूपये
पृष्‍ठ : 176

Friday, December 4, 2009

चामत्‍कारिक साधना : गोविन्‍द अग्रवाल का कमाल


राजस्‍थान को इतिहासकारों की आधारभूमि कहा जाए तो कोई अतिशयो‍क्ति नहीं होगी। यहां के वीर योद्धाओं ने नित नवीन इतिहास पेश किया। उन्‍होंने इतिहास को अपनी मर्जी से रचा। यही वजह रही कि मराठों के बाद गर्वीले इतिहास की झांकी राजस्‍थान में ही मिलती है। राजस्‍थान इतिहासकारों का पसंदीदा क्षेत्र रहा है।
राजस्‍थान ने सिर्फ सुनहरा इतिहास ही नहीं दिया, विद्वान इतिहासकार भी दिए हैं। इनमें चूरू के डॉ. दशरथ शर्मा और गोविंद अग्रवाल का नाम प्रमुखता से है।
श्री गोविंद अग्रवाल ने आंचलिक इतिहास लेखन की परंपरा में मिसाल कायम कर अपने को जीते-जी अमर क‍र लिया। अपने बड़े भाई श्री सुबोधकुमार अग्रवाल व साथियों के साथ मिलकर उन्‍होंने लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान 'नगरश्री', चूरू का गठन किया। बड़ा भाई ऐतिहासिक तथ्‍यों के संग्रहण में लगा तो छोटे भाई गोविंद ने कलम संभाली। गोविंदजी की तीक्ष्‍ण दृष्टि की बदौलत नगरश्री से अनेक इतिहास के प्रकाशन हुए, जो अखिल भारतीय स्‍तर पर सराहे गए। नगरश्री की पत्रिका 'मरूश्री' को तो आज भी याद किया जाता है।
नगरश्री के बेहतरीन प्रकाशनों में सर्वोपरि है- 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास'। यह सन् 1974 (रामनवमी, 2031 वि.) को प्रकाशित हुआ। उस वक्‍त पुस्‍तक का मूल्‍य पचास रूपये रखा गया था।
चूरू मण्‍डल का शोधपूर्ण इतिहास' में इतिहासकार डॉ. रघुवीरसिंह की विद्वतापूर्ण भूमिका है। अध्‍यायवार विभाजन में 21 अध्‍यायों का विस्‍तृत खाका सामने रखकर महत्‍वपूर्ण काम किया।
अध्‍याय-1 परिचयात्‍मक विवरण, अध्‍याय-2 प्राक् ऐतिहासकि काल, अध्‍याय-3 ऐतिहासिक काल, अध्‍याय-4 चौहान-राज्‍य, अध्‍याय-5 चौहानों के स्‍थानीय ठिकाने, अध्‍याय-6 चौहानों के प्रमुख ठिकाने, अध्‍याय-7 जाट-जनपद, अध्‍याय-8 राठौड़ राज्‍य (प्रारंभ से राव रणमल तक), अध्‍याय-9 राठौड़ राज्‍ (रावत कांधल से ठा. बणीर तक), अध्याय-10 राठौड़ राज्य (ठा.मालदेव से ठा. भीमसिंह तक), अध्याय-11 राठौड़ राज्य (ठा.कुशलसिंह से ठा. धीरतसिंह तक), अध्याय-12 राठौड़ राज्य (ठा. हरीसिंह), अध्याय-13 राठौड़ राज्य (ठा. शिवजीसिंह), अध्याय-14 राठौड़ राज्य (ठा. पृथ्‍वीसिंह), अध्याय-15 राठौड़ राज्य (ठिकाणा कूचोर, चूरू वाला /बणीरोतों के अन्‍य ठिकाने), अध्‍याय-16 चूरू मण्‍डल के अन्‍य ठिकाने, अध्‍याय-17 चारण व उनके ठिकाने, अध्‍याय-18 धर्म और सम्‍प्रदाय, अध्‍याय-19 भाषा, लिपि, साहित्‍य और शिक्षा, अध्‍याय-20 वाणिज्‍य व्‍यवसाय एवं लेन-देन, अध्‍याय-21 समाज और संस्‍कृति।
पांच सौ से अधिक पृष्‍ठों में समेटा गया यह इतिहास आंचलिक इतिहासों में सर्वोपरि है। खास बात इस इतिहास की यह है कि इसके तथ्‍यों की प्रामाणिकता इतनी है कि किसी भी विद्वान द्वारा आज तक अंगुली नहीं उठाई जा सकी। चूरू मण्‍डल के लिए यह न केवल थाती है बल्कि उसके सुनहरे पन्‍नों की पुनरावृत्ति है।
अफसोस सिर्फ इतना है कि यह कृति अब अप्राप्‍य है और पुनर्प्रकाशन की कोई नजदीकी संभावना नहीं है। इतिहासकार श्री गोविंद अग्रवाल अब अपने पुत्रों के पास कर्नाटक में स्‍वास्‍थ्‍य लाभ ले रहे हैं जबकि उनके अग्रज श्री सुबोधकुमार अग्रवाल स्‍वर्गवासी हो चुके हैं। हालांकि नगरश्री ट्रस्‍ट अभी भी सक्रिय है और हो सकता है इस सक्रियता के बीच इस महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक के पुनर्प्रकाशन का कोई रास्‍ता निकल आए। आमीन।

Wednesday, December 2, 2009

जुगलजी का जागरण : सेठियाजी का स्‍मरण

राजस्थानी भाषा में नियमित निकलने वाली मासिक पत्रिका कोई है तो वह है- माणक
माणक का यह 29वां वर्ष है। पत्रिका के संपादक-स्वामी श्री पदम मेहता हैं, जबकि सहायक संपादक हैं श्री जुगल परिहार। श्री जुगल परिहार राजस्थानी के स्थापित रचनाकार हैं और वर्षों से माणक को अपनी सेवाएं दे रहें हैं। जुगलजी की सेवाएं निश्चित रूप से माणक के लिए सौभाग् की बात हैं। उनकी लगन और मेहनत काबिले तारीफ होती हैं। पत्रिका के लिए आने वाली हर एक रचना के साथ वे मेहनत करते हैं और भाषाई सुधार के साथ शानदार गैटअप में प्रस्तुत करते हैं। मेरे पास राजस्‍थानी की कई और पत्रिकाएं भी आती हैं लेकिन माणक में जो बात है, वह उनमें कहां? और यही कारण है कि मात्र रचनात्‍मक और संपादक के रूप में जानते हुए मैं उनका मुरीद हूं। कभी-कभी सोचता हूं कि राजस्‍थानी भाषा के पास 5-7 जुगलजी होते, तो आज राजस्‍थानी का समकालीन दौर दूसरे ढंग का ही होता। खैर-----।
29वें वर्ष का 11वां अंक नवम्बर-2009 के रूप में पाठकों के समक्ष आया। राजस्‍‍थानी के महाकवि पद्मश्रीकन्हैयालाल सेठिया ‍को समर्पित है, पहली पुण्‍य तिथि पर। राजस्‍थान के सुजानगढ़ (चूरू) में 11 सितम्‍बर, 1911 को जन्‍में सेठियाजी का 11 नवम्‍बर, 2008 को कोलकाता में निधन हुआ।
सेठियाजी की राजस्‍थानी में रमणियां रा सोरठा, मींझर, गळगचिया, कूंकूं, लीलटांस, धर कूंचां धर मजलां, सतवाणी, सबद, अघोरी काळ, मायड़ रो हेलो, दीठ, कक्‍को कोड रो, लीकलकोळिया, हेमाणी आदि अनेक काव्‍य-कृतियां सामने आई। राजस्‍थानी में इन कृतियों के माध्‍यम से वे अमर रहेंगे।
सेठियाजी का 'धरती धोरां री----' गीत तो राजस्‍थान का सिरमौर गीत है। मेरा मानना है कि अगर सेठियाजी मात्र यह एक गीत ही लिख पाते तो भी वे अमर थे।
सेठियाजी की हिन्‍दी में भी अनेक पुस्‍तकें आईं। वनफूल, अग्निवीणा, मेरा युग, दीपकिरण, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्‍ते, प्रतिबिम्‍ब, प्रणाम, मर्म, अनाम, निर्ग्रंथ, स्‍वगत, देह-विदेह, आकाशगंगा, वामन-विराट, निष्‍पत्ति, श्रेयस आदि पुस्‍तकें हिन्‍दी साहित्‍य की थाती हैं। इन रचनाओं के अलावा भी उनकी अनेक रचनाएं हैं। उर्दू भी उन्‍होंने सृजन किया।
राजस्‍थान से जब माउण्‍ट आबू व सिरोही को सरदार पटेल ने गुजरात में शामिल कर लिया तब सेठियाजी ने जमीनी लड़ाई लड़ी और उन्‍हें फिर से राजस्‍थान में शामिल करवाया। राजस्‍थान के जल आंदोलन और हरिजन उद्धार के कार्यों में सेठियाजी सर्वोपरि रहे। देश की आजादी के लिए उनकी कलम ने जागृति पैदा की। उनकी पुस्‍तक जब्‍त की गई। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्‍हें स्‍वतंत्रता सेनानी माना गया, हालांकि उन्‍हें आजीवन पेंशन नहीं ली।
ऐसे ही सेठियाजी पर माणक का अंक निकलना निश्चित रूप से सराहनीय है। संपादक पदमजी मेहता का संकल्‍प और सहायक संपादक जुगलजी की मेहनत की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
इस अंक में डॉ. लक्ष्‍मीमल सिंघवी, जयप्रकाश सेठिया (सेठियाजी के सुपुत्र), बालकवि बैरागी, लक्ष्‍मीनिवास झुंझुनूवाला, जुगलकिशोर जैथलिया, बसंतकुमार-सरला बिड़ला, राधा भालोटिया का व्‍यक्तित्‍व के प्रति रचनात्‍मक सहयोग है, वहीं डॉ. भगवतीलाल व्‍यास, डॉ; मूलचंद सेठिया, डॉ. सेयद महफूज हसन रिजवी का कृतित्‍व के प्रति रचनाकर्म है। पदम मेहता द्वारा लिए गए 2 साक्षात्‍कार हैं, जिनमें एक तो 28 साल पहले (जून, 1981) माणक में प्रकाशित भी हुआ था।
अंक में जुगलजी की तीक्ष्‍ण दृष्टि के कारण सेठियाजी की प्रत्‍येक कृति का आवरण और चुनिंदा रचना एक-एक पृष्‍ठ में सज्जित हैं। वहीं सेठियाजी के जीवन की झांकी प्रस्‍तुत करते 4 पूरे पृष्‍ठ फोटो के हैं। आलेखों के बीच-बीच में भी फोटूएं दी गई हैं, जो पृष्‍ठ सज्‍जा को द्विगुणित करती हैं।
पूरा अंक संग्रहणीय बन पड़ा है। राजस्‍थानी साहित्‍य में सेठियाजी के योगदान पर काम करने वाले शोधार्थियों के लिए तो यह अंक एक वरदान है। इतनी साधना और मेहनत तो जुगलजी ही कर सकते हैं।
अंक में शामिल रचनाएं कुछ पुरानी और पूर्व-प्रकाशित भले ही हों, जुगलजी का जागरण ही सेठियाजी का स्‍मरण कराने में सफल रहा है। माणक इससे बेहतर और क्‍या कर सकता था, बधाई।

पत्रिका : माणक
आवृत्ति : मासिक
प्रकाशक : माणक प्रकासण
जलते दीप भवन
जालोरी गेट, जोधपुर-342003
फोन : 0291-2612900,2435896
e-mail : info@manak.org
visit : www.manak.org
शुल्‍क : 201 रूपये वार्षिक, 20 रूपये एक प्रति
पृष्‍ठ :
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