Saturday, October 16, 2010

एक गांव जो प्रतिभाएं गढ़ता है





समूचा राजस्‍थान प्रांत आजकल कृष्‍णा पूनिया के राष्‍ट्रमंडल पदक के स्‍वागत में उमड़ रहा है। कृष्‍णा पूनिया ने डिसकस थ्रो में महिला वर्ग में गोल्‍ड जीता है। कृष्‍णा पूनिया हरियाणा (अग्रोहा) के किसान दंपती श्रीमती शांतिदेवी- श्री महासिंह सूरा की बेटी है और राजस्‍थान के चूरू जिले के गांव गागड़वास  (राजगढ़) की बहू है। गागड़वास के श्री वीरेन्‍द्र पूनिया स्‍वयं अच्‍छे खिलाड़ी रहे हैं और अपनी पत्‍नी कृष्‍णा के कोच रहते हुए उन्‍होंने बड़ी मेहनत से (कृण्‍णा को) तराशा भी है। 
कृष्‍णा ने स्‍वागत के बाद  कहा कि हर घ्‍ार में मेरी जैसी कृष्‍णा हैं, लेकिन उन्‍हें उचित अवसर व मददगार मिलना चाहिए। 
सही है, प्रतिभाएं हर ओर होती हैं। उन्‍हें सही मंच और सही दिशा देने वाला चाहिए। कुछ प्रतिभाएं ऐसी भी होती हैं जो दिशा का निर्धारण कभी-कभी स्‍वयं कर लेती हैं परंतु उनके पीछे गहरा संघर्ष छिपा होता है। 
ऐसे ही एक संघर्ष का नाम है सुरेन्‍द्र सिंह। 
कृष्‍णा पूनिया और वीरेन्‍द्र पूनिया के गांव गागड़वास का निवासी सुरेन्‍द्रसिंह। 
अपनी कूची के बल पर करामात दिखाता किसान पुत्र सुरेन्‍द्रसिंह, जिसकी पीढि़यों में भी कूची से वास्‍ता नहीं रहा। किसानी के बल पर यापन करनेवाले परिवार का एक सदस्‍य, जो राजधानी जयपुर की कलादीर्घाओं में ऊपर उकेरे गए चित्रों जैसे अनेक चित्रों के बूते पर अपना मुकाम बनाने के लिए संघर्षरत है।
पिछले दिनों अंतरजाल के मायाजाल के बीच से सुरेन्‍द्रसिंह मेरे सामने निकला और अपनी कला के बल पर मुझे मोह गया। 
लिखने-समझने को बहुत मन चाह रहा है, लेकिन जब बात कृष्‍णा पूनिया और गांव गागड़वास की होने लगी तो आज यकायक सुरेन्‍द्रसिंह का स्‍मरण हो आया और त्‍वरित गति से टूटे दो शब्‍द आपके सामने रख दिए। 
शायद सुरेन्‍द्रसिंह आपको ही पसंद आ जाए।
आप सुरेन्‍द्रसिंह के विषय में कुछ और यहां से जान सकते हैं-






Monday, August 16, 2010

युवा काम बेहतर कर सकता है, बुरा लगे तो लगे

काफी समय से एक ऊर्जावान युवा के विषय में लिखने को मन कर रहा था परंतु, लगा कि नहीं, कहीं स्‍थानीयता हावी न हो जाये। स्‍थानीय-जुड़ाव के साथ कुछ और कारणों का जुड़ाव भी लोग कर लेते हैं। बस इसी कारण यह पोस्‍ट टलती रही। परंतु अब यह टलनी नहीं चाहिए, क्‍योंकि 37 साल के इस युवा ने स्‍वतंत्रता दिवस पर चूरू को शानदार तोहफा दिया है। राजस्‍‍थान की इस मरुभूमि को तकनीक से जोड़ने का साहस किया है।
इस युवा ने आम आदमी के हित का खयाल रखते हुए सरकारी तंत्र में चुस्‍ती और राजनीति के बहाने घुसे घुसपैठियों में सुस्‍ती ला दी है।

मैं बात कर रहा हूं, चूरू जिला कलक्‍टर डॉ. कृष्‍णाकांत पाठक का। श्री के. के. पाठक ने हाल ही 11 अगस्‍त को अपना 37वां जन्‍मदिन मनाया है। मूल रूप से मोहानिया, बिहार के निवासी, फिलॉसफी में डॉक्‍टर, साहित्‍यधर्मी श्री के. के. पाठक अपने 2001 बैच के टॉपरर्स में से एक रहे हैं। चूरू में आपका आना एक मायने में ऐसे समय में हुआ जब केन्‍द्र सरकार की महत्‍वपूर्ण योजना कानून का रूप लेने की करवट ले रही थी।
नरेगा और अब महानरेगा के माध्‍यम से ग्रामीण क्षेत्रों में एक क्रांतिकारी पहल हुई। परंतु यह भी सत्‍य है कि कोई महत्‍वाकांक्षी योजना अपने साथ कुछ दूसरे पहलू भी लेकर आती है। महानरेगा में राजनीति के घुसपैठियों के माध्‍यम से होने वाला भ्रष्‍टाचार इस योजना का मूल बन गया। ग्रामीण बिना काम पर जाए अपना नाम लिखाने लगे और आधा भुगतान लेकर संतुष्‍ट रहने लगे। वहीं मस्‍टरोल में नाम दर्ज अपने हिसाब से होने लगे। मूल रूप से यथार्थ धरातल पर योजना का खाका बदलता-सा नजर आने लगा।
ऐसे में चूरू कलक्‍टर ने ई-मस्‍टरोल की पहल की। चूरू जिला पहला जिला बना जिसमें ई-मस्‍टरोल जारी हुए। यह एक बहुत बड़ा काम था, जोकि श्री के के पाठक ने कर दिखाया। बाद में इस पहल का राज्‍य के दूसरे जिलों में अनुसरण हुआ। यही नहीं, श्री के के पाठक की कार्यक्षमता के बूते पर चूरू जिला राज्‍य का प्रथम जिला बनने की स्थिति में आया जहां 15 दिनों के बाद महानरेगा का भुगतान सीधे खातों में पहुंचना प्रारंभ हुआ।
इस पहल के पीछे एक युवा की सूक्ष्‍म दृष्टि, गहरी समझ एवं कार्यक्षमता ही है।

बात यहीं समाप्‍त नहीं होती। बात यहां से शुरू होती है। डीसीटीसी के माध्‍यम से कम्‍प्‍यूटर शिक्षा के क्षेत्र में जिला कलक्‍टर ने गहरी रूचि दिखायी। उन्‍हीं के प्रयास एवं प्रेरणा रही कि डीसीटीसी, चूरू आज एक अपना मुकाम लिए हुए तीर्थसम है।
पिछले दिनों जब पूरा देश स्‍वतंत्रता दिवस की तैयारियों में लगा था तब युवा के.के.पाठक का दिमाग नये सपने बुनने में लगा था। उन्‍हें अपने इन सपनों को अंजाम देना था- स्‍वतंत्रता दिवस पर।
11 अगस्‍त, 2010 को जिला कलक्‍टर ने एक बैठक आहुत कर एक ऐसी घोषणा की, एक ऐसा खाका सबके सामने रखा, जो कि चौंकाने वाला था।
भारत सरकार तथा दिल्‍ली राज्‍य सरकार एवं अन्‍य कुछ दूसरे क्षेत्रों में संचालित एक बहुत ही उपयोगी आमजन हितार्थ स्‍कीम को चूरू में लागू करने वाला यह फैसला कम नहीं था। स्‍कीम थी- जन शिकायत निवारण प्रणाली यानी Public Grievance Redressal System.
Public Grievance Redressal System को 'लोकवाणी' नाम दिया गया। यह श्री के. के. पाठक का निजी चिंतन था कि यह चूरू जिले में लागू हो सकी। इस सिस्टम का जिला परिषद सभागार में 15 अगस्, 2010 को विधिवत उदघाटन किया गया।
इस सिस्‍टम के तहत कोई भी आमजन अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करा सकता है। उसे शिकायत दर्ज कराने पर एक शिकायत नम्‍बर मिलता है। उस शिकायत नम्‍बर के आधार पर वह की हुई शिकायत का समय-समय पर पीछा कर सकता है। उसके द्वारा की गई शिकायत पर क्‍या कार्रवाई हुई, कौनसी स्‍टेज में शिकायत है आदि-आदि। अपनी शिकायत के प्रति वह रिमाइण्‍डर भी ऑनलाइन लगा सकता है।
अब तक यह प्रथा प्रचलन में थी कि एक कागज पर शिकायत की गई। वह जनता प्रकोष्‍ठ/सर्तकता प्रकोष्‍ठ की धरोहर बनते हुए न जाने कहां-कहां घुमता। शिकायतकर्ता अगर उसका पीछा भी करे तो कहां तक।

मेरा मानना है कि राजनीति के कुछ गंदे कीड़े (माफ करें) भले ही कुछ अनाप-शनाप बकें, सत्‍य तो यही है कि काम करने वाले भले ही कहीं रहे, वे अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ ही जाते हैं। यह उस क्षेत्र का सौभाग्‍य होता है, जहां वे रहते हैं।
चूरू जिला ऐसे कलक्‍टर, युवा ऊर्जावान कलक्‍टर को लिए हुए है, मैं तो इसे सौभाग्‍य ही कहूंगा।


Monday, July 5, 2010

एक शानदार पहल

राजस्‍थान के चूरू जिला मुख्‍यालय स्थित राजकीय लोहिया कॉलेज एक ख्‍यातनाम संस्‍थान है। कला, विज्ञान, वाणिज्‍य, विधि के स्‍नातक और स्‍नातकोत्‍तर स्‍तर के हजारों विद्यार्थी यहां से ज्ञान अर्जन करते हैं।
इसी महाविद्यालय के लगभग 200 सदस्‍यों वाले शैक्षणिक व अशैक्षणिक स्‍टाफ के कुछ प्रबुद्ध सदस्‍यों द्वारा 1 जुलाई, 2010 को की गई एक शानदार पहल मुझे ही नहीं मुझ जैसे अनेक लोगों को लुभा गयी।

पहल थी - स्‍टाफ द्वारा साइकिल के माध्‍यम से पूरे शिक्षा सत्र महाविद्यालय आने की।
पहल की गई महाविद्यालय के 30 के करीब सदस्‍यों द्वारा।
स्‍वागत किया जाना चाहिए-








Tuesday, June 15, 2010

डॉ. घासीराम वर्मा साहित्‍य पुरस्‍कार-2010 हेतु नाम भेजें

राजस्‍थान के हिंदी लेखन को समर्पित 'डॉ. घासीराम वर्मा साहित्‍य पुरस्‍कार-2010' हेतु 2005-2009 में छपी किसी एक कृति की 30 जून, 2010 तक अनुशंसा/संस्‍तुति करें-
prayas.sansthan@rediffmail.com पर।


वर्ष-2008 का पुरस्‍कार डॉ. सत्‍यनारायण (सितम्‍बर में रात) व 2009 का पुरस्‍कार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ (कठपुतलियां) को दिया गया।

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प्रयास संस्थान
चूरू-331001 राजस्थान
www.prayas-sansthan.blogspot.com


डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार
पुरस्कार नियम
१. राजस्थान के हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन-सम्मान देने के लिए वर्ष-2008 से यह वार्षिक पुरस्कार प्रारम्भ किया गया।
राजस्थान से तात्पर्य जन्म राजस्थान में होना या फिर विगत दस वर्षों से राजस्थान में निवासी होना होगा।
२. इस पुरस्कार का नाम 'डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार` रहेगा।
३. पुरस्कार किसे दिया जाये; इसका निर्धारण विगत वर्ष/वर्षों में प्रकाशित कृतियों के मूल्यांकन के बाद संस्थान कार्यकारिणी द्वारा किया जायेगा। किसी एक रचनाकार की कोई एक कृति का चयन पुरस्कार के लिए किया जाएगा।
४. चयनित लेखक को 5100 रुपये नगद, शॉल, श्रीफल, स्मृति चिह्न आदि पुरस्कार/सम्मान स्वरूप दिये जायेंगे। यात्रा-व्यय, भोजन व आवास की व्यवस्था भी संस्थान करेगा। सभी खर्चों का प्रबंधन संस्थान अपने संसाधनों से करेगा।
५. पुरस्कार वितरण समारोह राजस्थान के चूरू जिला मुख्यालय पर प्रतिवर्ष अगस्त/सितम्‍बर माह में आयोजित किया जायेगा। बशर्ते कोई अपरिहार्य कारण न हो।
६. संस्थान उचित समझे तो हिन्दी की राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रतिवर्ष विज्ञापन निकालकर पाठकों/साहित्यकारों से पुरस्कार हेतु कृति-कृतिकार के नाम की अनुशंसा मांग सकेगा।
७. विज्ञप्ति के माध्यम से पाठकों/साहित्यकारों से सिर्फ कृति-कृतिकार के नाम की अनुशंसा मांगी जायेगी। किसी कृति की प्रति नहीं मांगी जायेगी। अनुशंसित किसी कृति की अनुपलब्धता की स्थिति में जरूरत समझे तो वह कृति प्रकाशक से संस्थान स्वयं अपने खर्चे द्वारा मंगवायेगा।
८. ऐसी सूरत में आये नामों पर कार्यकारिणी विचार करेगी और योग्य रचना-रचनाकार का चयन करेगी। जरूरी हुआ तो संस्थान साहित्यकारों का तीन सदस्यीय निर्णायक मण्डल भी बना सकेगा।
९. संस्थान पुरस्कार वितरण समारोह में राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हिन्दी के किसी एक लेखक-विद्वान व राज्य से किसी एक हिन्दी रचनाकार को आमंत्रित करेगा। ऐसे आमंत्रित रचनकारों के आवागमन व्यय तथा रहने-खाने का प्रबंध संस्थान अपने संसाधनों से करेगा।
१०. संस्थान जरूरी समझे तो किसी समानधर्मी दूसरे संस्थान को सहभागी बना सकेगा।
११. पुरस्कार हेतु नाम के चयन के विषय में संस्थान की अपनी स्वतंत्रता रहेगी। संस्थान कार्यकारिणी द्वारा नियमों में संशोधन-परिवर्द्धन किया जा सकेगा तथा कार्यकारिणी का हर निर्णय अंतिम व सर्वमान्य होगा।



Tuesday, June 1, 2010

ऐसा प्रकाशक पाठकों के लिए देवदूत होता है : इतनी सस्‍ती किताबें, वाह

राजस्थान से हमेशा विभिन् क्षेत्रों में नई पहल होती रही है। राजधानी जयपुर इन दिनों फिर एक नई पहल के कारण चर्चा में है। इस बार चर्चा साहित्यकारों और पाठकों की ओर से शुरू हई है। और हो भी क्यों , जब इसका वाजिब कारण मौजूद है।

कारण पैदा किया है घग्‍घर की मिट्टी से उठे कविवर मायामृग ने। मायामृग न केवल जाने-पहचाने श्रेष्‍ठ कवि हैं अपितु बोधि प्रकाशन के श्रेष्‍ठ प्रबंधक भी हैं। बोधि प्रकाशन एक आर्थिक सोच से विकसित प्रकाशन संस्‍था नहीं है। यह एक ऐसे मंच का नाम हैं जो कि रचनाकारों को प्रकाशकों की मायावी दुनिया से दूर करने के उद्यम में दिन-रात एक किए है।
मायामृग हमेशा से एक सोच से आप्‍लावित रहते थे कि आज भौतिकता की दौड़ में और तकनीक के विकास चरम पर मुद्रित सामग्री खतरे में हैं। उनकी सोच थी कि इन सबमें सबसे ज्‍यादा खतरे में हैं तो पुस्‍तकें। पुस्‍तकों की न केवल बिक्री घटी है अपितु उनकी प्रसारात्‍मकता भी घटी है। सरकारी खरीद और पुस्‍तकालयों के हिस्‍से पर गौर फरमाया जाए तो तीन-चौथाई हिस्‍सा समा जाता है। मात्र चौथाई हिस्‍सा खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों के लिए सुरक्षित रहता है, या यूं कहें कि यह हिस्‍सा ऐसे पाठक बमुश्किल से बचाने में सक्षम रहे हैं। यह बदलाव मायामृग को कचोटा।
पाठक कृति की खरीद से दूर जा रहा है तो क्‍यों ?
पुस्‍तकों के बढ़ते मूल्‍य को बड़ी वजह के रूप में मायामृग ने अपने सामने पाया। और एक मायने में यहीं से बोधि प्रकाशन का उदय हुआ।
बोधि प्रकाशन की शताधिक कृतियां मात्र 50 या 35 रूपये बिक्री की दर से छपी। 100 या 80 पृष्‍ठों की पुस्‍तक का यह मूल्‍य प्रकाशकों की दुनिया में बेवकूफाना कदम माना गया। लेकिन बोधि प्रकाशन ने अपने इस कदम से न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि पाठकों के दिलों में जगह भी बनाई।
पूरे भारत में बोधि प्रकाशन के प्रशंसकों की एक फौज खड़ी हो गई। और एक मायने में प्रकाशन के व्‍यवसाय से बोधि प्रकाशन के मालिक मायामृग ने यही कमाया।

बोधि प्रकाशन, जयपुर अपने इस कदम से कहां संतुष्‍ट होने वाला था। उसके नवीन प्रयोग अभी शेष थे।
इन्‍हीं नवीन प्रयोगों में एक प्रयोग 23 मई, 2010 को साक्षात हुआ है।
और यह प्रयोग 'बोधि पुस्‍तक पर्व' के नाम से जाना जा रहा है तथा सम्‍पूर्ण साहित्‍य जगत अंदर चर्चा में है।
इसी पर चर्चा करते हुए चौथे सप्‍तक के कवि नंदकिशोर आचार्य

'बोधि पुस्‍तक पर्व' के नाम की इस पहल ने पुस्‍तकों के इतिहास में एक नया आयाम स्‍थापित किया है। इस पर्व में दस पुस्‍तक का एक सैट पाठकों के लिए प्रकाशक की ओर से प्रस्‍तुत किया गया है। प्रत्‍येक पुस्‍तक 80 पृष्‍ठ से अधिक की है और सब की सब हार्डबाइडिंग की। उल्‍लेखनीय बात यह नहीं, उल्‍लेखनीय तो यह है कि इस दस ‍पुस्‍तक वाले पूरे सैट की कीमत मात्र और मात्र 100 रूपये रखी गई है। यानी कि एक पुस्‍तक की कीमत 10 रूपये।
रविवार 23 मई 2010 को शाम 4.30 बजे पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर में पुस्तक पर्व के तहत प्रकाशित पहले सैट की 10 पुस्तकों के हुए लोकार्पण में हिंदी की 10 पुस्‍तकें शामिल हैं, एक नजर-
कविता
1. भीगे डेनों वाला गरुण : विजेंद्र
2. आकाश की जात बता भैया : चंद्रकांत देवताले
3. जहाँ उजाले की एक रेखा खिंची है : नन्द चतुर्वेदी
4. प्रपंच सार सुबोधिनी : हेमंत शेष
कहानी
5. आठ कहानियां : महीप सिंह
6. गुडनाइट इंडिया : प्रमोद कुमार शर्मा
7. घग्घर नदी के टापू : सुरेन्द्र सुन्दरम
अन्य
8. कुछ इधर की-कुछ उधर की : हेतु भारद्वाज
9. जब समय दोहरा रहा हो इतिहास : नासिरा शर्मा
10. तारीख की खंजड़ी : सत्यनारायण

इस सैट को हिंदी के वरिष्‍ठ कवि विजेंद्र, प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक नंदकिशोर आचार्य, साहित्‍यकार डॉ. माधव हाडा, डॉ. लक्ष्मी शर्मा ने उपस्थित साहित्यकारों, पाठकों, पत्रकारों के समक्ष जारी किया।

लोकार्पण समारोह में ही 200 सैट हाथोंहाथ लिए गए। यह एक भांति पुस्‍तक पर्व का शानदार स्‍वागत था। अगले दिन दोपहर तक 100 और सैट का आदेश प्रकाशक को मिल चुका था। और तो और उससे अगले दिन 225 सैट का एक नया आदेश प्रकाशक को और मिला। यह क्रम निरंतर जारी रहा और आज स्थिति यह है कि कुल 1000 सैट में से मात्र कुछ ही बचे हैं।
इससे बेहतर योजना-प्रयोजना क्‍या हो सकती है, किसी प्रकाशक की।
पाठकों के लिए समर्पित तथा किताबों को बचाने की दिशा में की गई इस नवीन पहल के लिए बोधि प्रकाशन के श्री मायामृग (9829018087, mayamrig AT gmail.com) बधाई के पात्र हैं।

एक खुशखबरी राजस्‍थानी साहित्‍य के पाठकों के लिए भी बोधि प्रकाशन की ओर से है, बोधि प्रकाशन अगला सैट राजस्‍थानी का लेकर आ रहे हैं। राजस्‍थानी की दस किताबें, मात्र 100 रूपये में।

पुस्‍तक बचाने की इस पहल के सद् प्रयास हेतु प्रयास संस्‍थान, चूरू ने एक समारोह में श्री मायामृग का सम्‍मान करने का फैसला भी किया है। श्रेष्‍ठ कार्य करने वालों को कौन सम्‍मानित नहीं करेगा, यह सम्‍मानित करने वाली संस्‍थाओं का सौभाग्‍य होता है।

श्रेष्‍ठ कार्य के लिए साधुवाद मायामृग जी। हो सकता है आपके इस कदम से दूसरे प्रकाशक भी कुछ बदलें।
आमीन।


Sunday, May 23, 2010

राजस्‍थान के चिट्ठाकार एक मंच पर आएं

राजस्‍थान से नित्‍य-प्रति अनेक चिट्ठे (ब्‍लॉग) लिखे जा रहे हैं। हम जैसे अनेक हैं जो उनको पढ़ना चाहते हैं। खासकर चुनिंदा ताजा प्रविष्ठियों को।
परंतु दिक्‍कत ये आती है कि एक जगह सभी की सूचना उपलब्‍ध नहीं है। कुछ प्रयास भी इस दिशा में हुए हैं और कुछ चल भी रहे हैं।
हमने 'राजस्‍थान ब्‍लॉगर्स' मंच के माध्‍यम से एक प्रयास आरम्‍भ किया है। ब्‍लॉग एग्रीगेटर के रूप में। इसमें आपकी ताजा लिखी पोस्‍ट दिखेगी, बशर्ते आपका चिट्ठा इससे जुड़ा है।

अगर आप अब तक नहीं जुडे़ तो

Sunday, May 16, 2010

मीडिया का दायरा बढा नहीं घटा है



राजस्‍थानी के प्रसिद्ध कवि बुद्धिप्रकाश पारीक नहीं रहे। राजस्‍थानी में ढूंढ़ाड़ी बोली के प्रबल हस्‍ताक्षर थे पारीकजी। उनका जाना एक बड़ी क्षति है। मन विचलित है, सबसे बड़ा विचलन उनके चुपचाप चले जाने के कारण है।
मेरा यहां अर्थ अखबारों की स्‍थानीयता से है। यह एक सवालिया निशान है मीडिया पर।

Saturday, May 15, 2010

जाना भैंरोसिंह शेखावत का

भारत के उपराष्‍ट्रपति रहे श्री भैंरोसिंह शेखावत का निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे। राजस्‍थान के खाचरिया बास (सीकर) में 23 अक्‍टूबर, 1923 को जन्‍में श्री शेखावत राजस्‍थान के तीन बार मुख्‍यमंत्री रहे। वे लम्‍बे समय तक नेता प्रतिपक्ष राजस्‍थान विधानसभा भी रहे। मध्‍यप्रदेश से 1974 में वे राज्‍यसभा के लिए भी गए।
चूरू का सहनाली बड़ी गांव श्री शेखावत का ननिहाल है। उनकी प्राथमिक शिक्षा यहीं हुई। सहनाली से वे रतननगर पैदल ही पढ़ने जाते थे। उनके बचपन के दिन चूरू को समर्पित थे।
यही कारण रहा कि श्री शेखावत का मन सदैव चूरू के लिए प्रेम भरा रहा। अनेक योजनाओं को त्‍वरित स्‍वीकृति मिली। चूरू में कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन द्वारा स्‍थापित 'मातुश्री कमला गोइन्‍का टाऊन हॉल' का शिलान्‍यास उन्‍हीं ने किया। यहां के नेतृत्‍व में कुछेक लोगों को उन्‍होंने आश्रय दिया। जिनमें चूरू के वर्तमान

Friday, April 30, 2010

क्‍या यह बहस का विषय नहीं ?

गांव रोहिणी, जिला वर्धा, (विदर्भ) महाराष्‍ट्र के समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े वासु परिवार में 4 मार्च 1935 को जन्‍मी प्रभा हमारे बीच नहीं रहीं। प्रभा राव राजस्‍थान में

Thursday, April 29, 2010

लोक-इतिहास के बेजोड़ विद्वान : गोविंद अग्रवाल

लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री चूरू के विषय में मेरी पोस्‍ट के माध्‍यम से थोड़ा-सा जिक्र किया था। इस संस्‍थान के प्राण इतिहासकार

Friday, April 16, 2010

एक मुख्‍यमंत्री के साथ पांच घण्‍टें

तुम्‍हें एक जन्‍तर देता हूं। जब भी तुम्‍हें संदेह हो या तुम्‍हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ :

'' जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्‍ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा ? क्‍या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्‍या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्‍य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्‍या उससे उन करोड़ों लोगों को स्‍वराज्‍य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्‍मा अतृप्‍त है ?

तब तुम देखोगे कि तुम्‍हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्‍त होता जा रहा है।''
- मोहनदास करमचंद गांधी

14 अप्रेल, 2010 का दिन। जब पूरे भारत में अम्‍बेडकर जयंती मनाई जा रही थी। खासकर राजनेता अपने दलित वोट बैंक को पुख्‍ता करने के सपने बुनते हुए बढ़-चढ़कर उन जयंती समारोहों में अपने को हिस्‍सा बनाने का जी-भर यत्‍न कर रहे थे। दलितोद्धार के लम्‍बे-चौड़े

Thursday, April 15, 2010

शिक्षा मंत्री जी जवाब दीजिए

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शिक्षा मेरा अधिकार : मातृभाषा में हो परिष्‍कार
अनिवार्य शिक्षा कानून के पारित होते ही राजस्थान में इन दिनों एक अहम् सवाल सबके सामने खड़ा हो गया है। वह यह है कि राज् में मातृभाषा किसे माना जाए ? चूंकि यह सवाल एक मायने में खड़ा हुआ नहीं है, खड़ा किया गया है। कहने का तात्पर्य है कि राजस्थान के वाशिंदों की मातृभाषा राजस्थानी है। जनगणना के आंकड़े और सारे तथ् इस बात के गवाह रहे हैं। आज भी इस दिशा में कोई सर्वे किया जाए तो इस बात की ताहीद हो सकती है।


2
एक आदमी का बेतुका बयान
फिर यह सवाल कहां से ?
राजस्‍थान सरकार के शिक्षा मंत्री मास्‍टर भंवरलाल मेघवाल ने एक बेतुका बयान देकर पूरे राजस्‍थान के राजस्‍थानी भाषी समुदाय का अपमान कर डाला। उनका कहना था कि ''राजस्‍थान की फिलहाल मातृभाषा हिन्‍दी है।''
इस बयान की जमकर आलोचना हुई। बयान आलोचना होने लायक भी था। बयान की कमजोरी यह 'फिलहाल' भी है। मां और मातृभाषा फिलहाल नहीं स्‍थायी होती हैं। पूछने वाला सीधे से पूछे कि

Sunday, April 11, 2010

लोक संस्‍कृति एवं इतिहास की कहानी बयान करता एक आगार

चूरू (राजस्‍थान) के इतिहास से जुड़ी सामग्री का जिक्र आते ही हमें बरबस श्री सुबोध कुमार अग्रवाल एवं श्री गोविंद अग्रवाल का स्‍मरण हो आता है। वह इसलिए की 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' ग्रंथ के मूल स्रोत ये अग्रवाल बंधु ही हैं। इस ग्रंथ की तथ्‍यात्‍मक सामग्री के पठन-पाठन के बाद ही हम इतना जिक्र एवं चर्चाएं कर लेते हैं। इतिहास संचय करते-करते इन बंधुओं का काम स्‍वयं अपने-आप में इतिहास बन गया है। आज सुबोधजी हमारे बीच नहीं हैं और गोविंदजी अपने बच्‍चों के साथ कर्नाटक के कुमारपट्टनम् में रह रहे हैं, परंतु उनका किया गया काम हमारे बीच पुस्‍तकों एवं म्‍यूजियम के रूप में हमारे पास है।
लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान, नगरश्री का संग्रहालय बेजोड़ है। यहां भाड़ंग, पल्‍लू, कालीबंगा, रंगमहल, सोथी एवं करोती के थेहड़ों से प्राप्‍त हजारों वर्षों पुरानी पुरातात्विक सामग्री मौजूद है। वहीं संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों, सिक्‍कों, ताड़पत्रीय प्रतियों, हस्‍तलिखित पुस्‍तकों, बहियों-दस्‍तावेजों आदि का संग्रह है। चूरू को राज्‍य सरकार ने जब हेरिटेज सिटी घोषित किया तो उस स्‍वरूप में नगरश्री म्‍यूजियम भी हेरिटेज सिटी का एक प्रमाण रहा है।
चूरू के मुख्‍य बाजार से सटी इन हवेलियों के बीच पोद्दार हवेली में लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री का स्‍थाई भवन है।
भवन के भीतरी द्वार की बनावट पुरातात्विक दृष्टि से स्‍वय महत्‍वपूर्ण है-
वहीं आंतरिक स्‍वरूप तो और भी बेहतर कल्‍पना लिए हुए है। सभागार में चित्र प्रदर्शनी के रूप में नगर के महापुरूषों, समाजसेवियों, योद्धाओं, साहित्‍यकारों, इतिहासविदों एवं अन्‍यान्‍य विभूतियों के साथ-साथ नगर के प्रमुख स्‍थलों के लगभग 1200 चित्र संयोजित हैं-

सेठ चम्‍पालाल पारख सभागार का यह मदन मंच नगरश्री की शान है। यहां साहित्‍यकार विष्‍णु प्रभाकर, क्षेमचंद्र सुमन, वियोगी हरि, इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा, न्‍यायाधिपति गुमानमल लोढ़ा, राजनेता मधु दण्‍डवते, हरिशंकर भाभड़ा, खेतसिंह राठौड़, उजला अरोड़ा, कुंभाराम आर्य, दौलतराम सहारण, स्‍वतंत्रता सेनानी रघुवर दयाल गोयल, गौरीशंकर आचार्य, पत्रकार-संपादक कप्‍तान दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, हरिदत्‍त शर्मा, गुलाब कोठारी, सिनेगीतकार भरत व्‍यास, अभिनेता बी.एम. व्‍यास, जादूगर शंकर सम्राट सहित अनेक विभूतियों ने विचार व्‍यक्‍त किए हैं।
10 अप्रेल, 2010 को मैं यहां पहुंचता हूं तो नगरश्री के कार्यकारी अध्‍यक्ष डॉ. शेरसिंह बीदावत नगरश्री के संबंध में जानकारियों के साथ स्‍वागत करते हैं-
नगरश्री ट्रस्‍ट के फाउण्‍डर ट्रस्‍टी श्री रामगोपाल बहड़ अपने अनुभव और नगरश्री के विकास क्रम की कहानी सटीक शब्‍दावली के माध्‍यम से बताते चलते हैं तो लगता ही कि सुनते ही जाएं-

आंचलिक इतिहास की परम्‍परा में 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' अपनी साख रखता है। इतिहासकार गोविंद अग्रवाल की दक्षता, तीक्ष्‍णता और श्रम की देश के अनेक विद्वानों ने मुक्‍त कण्‍ठ सराहना की है। वहीं संयोजक, भ्रमणशील, तत्‍वान्‍वेषी सुबोधकुमार अग्रवाल की अनथक यात्राएं नगरश्री म्‍यूजियम के रूप में आज भी अपनी कहानी कहती हैं।

इतिहास ही नहीं लोक संस्‍कृति के उपासक, अन्‍वेषी जनों के लिए भी यह संस्‍थान आज किसी तीर्थ से कम नहीं है।

Wednesday, March 31, 2010

साहित्‍यकार रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली से पहली और आखरी मुलाकात

राजस्‍थानी साहित्‍य की अकूत क्षमता को हम बड़े गर्व से बखान करते हैं। प्राचीन एवं मध्‍यकाल की स्‍वर्णिम आभा के बीच हम वर्तमान युग का जब गौरव गान कर रहे होते हैं तो राजस्‍थानी कहानी की समृद्ध परंपरा के बीच श्री रामेश्‍वरदयाल श्रीमाल़ी का नाम अपने-आप ही आ जाता है।
रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली राजस्‍थानी के उन कहानीकारों में शामिल हैं जिन्‍होंने राजस्‍थानी की समकालीन कहानी को विश्‍व कहानी के समक्ष ले जाने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। उनकी कहानियों की अपनी छाप एवं छवि है, जो राजस्‍थानी साहित्‍य कभी विस्‍मृत नहीं कर सकेगा।
यही नहीं श्रीमालीजी ने एक अच्‍छे कवि एवं शायर के रूप में भी पहचान बनाई।

आज सुबह राजस्‍थान पत्रिका में सांसद किरोड़ीमल मीणा और कर्नल किरोड़ीसिंह बैंसला की राजनीतिक खबरों को पार करते हुए आगे बढ़ता हूं तो पृष्‍ठ 15 पर एक

Monday, March 22, 2010

मिनखां री माया

आप बूझ्यो,
जे मिनख
इण भौम माथै नीं हुवै
तो
कांई फरक पड़ै ?

ठा नीं थानै सुण्यो कै नीं सुण्यो
म्हैं साफ कैयो है कै

फरक क्यूं नी पड़ै , पड़ै सा
मिनख नीं होंवतो तो
कठै सूं होंवता नित नुंवा प्रयोग
आभै नै नापण री सगति
चांद माथै घर बसावण री ताकत
पांणी नै भेदण री छिमता

अर सो-कीं इज क्यूं
कठै होंवती
मिनख नै जीवावण जोग चिकित्सा पद्धति
नाक-कान-होंठ सो'वणा करण री सर्जरी
कोख मांय पळता टाबरां नै पिछाणण री दीठ
अर कठै होंवतो
दुवाइयां रो लाम्बो-चौड़ो कारबार
सड़कां रो जाळ, गाड्यां री भीड़

आप मानो चायै नीं मानो
भौम माथै
मिनख होवणो सो-कीं होवणो है
क्यूं कै
मिनख नीं होंवतो तो कठै हो नाज
कठै ही पकावण री कळा
अर कठै ही मिट्ठै भोगां री
एक लाम्बी पंगत


आप भासाई हिमायती हो
छिणेक सोचो
मिनख नीं होंवता तो
कठै होंवती थारी भासा
कठै होंवती मानता री बात
अर
कुण उठावंतो आठवीं अनुसूची मांय जोड़ण रो मुद्दो

इज नीं मानो तो
इबकै आपनै हामळ भरणी पड़सी
क्यूं कै आप लोकतंत्र रा हिमायती हो
जद लोक नीं होंवतो तो
तंत्र कठै बणतो

इण खातर म्हारो तो मानणो है कै
मिनख नीं होंवतो तो
कीं नीं हुंवतो

म्हारै आपरै विचारां कारण
कीं फरक नीं पड़ै
क्यूं कै म्हैं जाणूं कै आप कैवणो चावो हो
कै

जे मिनख नीं हुंवतो तो
जंगळां री हुंवती कटाई
जिनावरां रो होंवतो ब्यौपार
अर पांणी रै होंवतै खात्मै
जेड़ा अलेखूं संकट
आज जाबक ई नीं होंवता

विश्‍व जल दिवस, 22 मार्च

Saturday, March 20, 2010

यह क्‍या हो रहा है ?

राजस्‍थान विधानसभा का बजट सत्र हंगामें के भेंट चढ़ रहा है। नुमाइंदें बेबुनियादी बहस में उलझ रहे हैं। आरोप-प्रत्‍यारोप का दौर चल पड़ा है। मूल मुद्दे इन सबके बीच कहीं गुम हो गए हैं और बजट की अनुदान मांगें बिना बहस के एक-एक करके पारित होती जा रही हैं। वहीं विपक्ष संगठित होने का दावा करता विधानसभा में अनशन पर बैठा है और मिडिया को नित नए बयान सौंप रहा है।
यह सब क्‍या हो रहा है ?

बात गत बुधवार अर्थात् 17 मार्च से शुरू हुई। विधानसभा सदस्‍य श्री हनुमान बेनिवाल (खींवसर-नागौर, 94141-18677) शून्‍यकाल में स्‍थगन प्रस्‍ताव पर शराब तस्‍करों की बात उठाते हुए सरकार द्वारा उन्‍हें प्रोत्‍साहन देने का आरोप लगाते हुए कहा कि शराब ठेकेदारों के 55 करोड़ रूपये माफ कर दिए गए। और तो और उत्‍तेजित अवस्‍था में बात रखते हुए अलोकतांत्रिक तरीके से सरकार पर भ्रष्‍टाचार का तमगा भी लगा दिया। असंसदीय भाषा का इस्‍तेमाल हुआ और वैल में आकर जमकर हंगामा किया गया। सत्‍ता पक्ष के सदस्‍यों ने श्री बेनिवाल को सदन से बाहर करने की मांग करने लगे। परिणाम स्‍वरूप शाम 4 बजे के लगभग विधानसभा में ध्‍वनि मत से सत्र के शेष अवधि तक के लिए श्री हनुमान बेनिवाल का निलम्‍बन हुआ।
विपक्ष ने इस पर आक्रामक मूड रखा।
श्री हनुमान बेनिवाल के कृत्‍य पर अगले दिन राजस्‍थान के प्रमुख दैनिक राजस्‍थान पत्रिका के संपादकीय में जो लिखा गया वह यहां ज्‍यों का त्‍यों दिया जा रहा है, अब आप ही अंदाजा लगा लिजिएगा-
''--- राजस्‍थान विधानसभा में बुधवार को जो हआ, वह प्रदेश की जनता को शर्मसार करने के लिए पर्याप्‍त है। भाजपा विधायक हनुमान बेनिवाल का बिना किसी आधार सदन में भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाना और तैश में आकर संसदीय मंत्री की सीट तक जा पहुंचना किस संसदीय परम्‍परा का निर्वहन माना जा सकता है ? क्‍या यह उन लाखों मतदाताओं का अपमान नहीं है, जो जनप्रतिनिधियों को अपनी आवाज बनाकर विधानसभा में भेजते हैं। भ्रष्‍टाचार हो रहा है तो उसे रोकना जनप्रतिनिधियों का काम हो सकता है, विधानसभा में भी मामला उठना चाहिए लेकिन निमय-कायदों के तहत। संसदीय नियमों के तहत मामला उठेगा तो उस पर चर्चा भी होगी और आरोपों के किसी अंजाम तक पहुंचने की उम्‍मीद भी की जा सकती है। लेकिन सिर्फ हंगामा खड़ा करने के लिए आरोप लगाने से क्‍या हासिल होने वाला है ? अखबारों और समाचार चैनलों की सुर्खियां बनना ही अगर मकसद हो, तो ऐसे सदस्‍यों का सदन में क्‍या काम ?
बेवजह हंगामा करने वाले सदस्‍यों को अगर सदन से निलम्बित किया जाता है, तो इसका स्‍वागत करना चाहिए न कि विरोध। भाजपा नेता यदि बेनिवाल के आचरण को गलत मानते हैं, तो उनके निलम्‍बन का विरोध क्‍यों कर रहे हैं ? यह दोमुंहा आचरण क्‍यों ? पक्ष के साथ-साथ विपक्ष को भी यह ध्‍यान रखना होगा कि नियम और कानून से ऊपर कोई नहीं है। सदन की गरिमा पर अगर कोई आंच आती है तो इसकी रक्षा के लिए सम्‍पूर्ण सदन को एकजुटता दिखानी ही होगी। विधानसभा की राजनीति और विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ की राजनीति को एक तराजू पर रखकर नहीं तोला जा सकता। विधायकों को अपने अधिकार के साथ दायित्‍वों को भी समझना होगा।''
सनद रहे कि श्री हनुमान बेनिवाल राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर के छात्रसंघ अध्‍यक्ष रहे हैं। यह राजस्‍थान के छात्र नेताओं का सौभाग्‍य ही है कि वक्‍त-वक्‍त पर जनता ने उनका साथ दिया है। यह इसी से सिद्ध हो जाता है कि वर्तमान में श्री राजेन्‍द्र राठौड़ (98292-48999), कालीचरण सर्राफ (93140-43888), राजकुमार शर्मा(94133-49994), महेन्‍द्र चौधरी (94140-70312) आदि विधायक है और ये सभी राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ के अध्‍यक्ष रहे हैं। इन सबके अलावा भी छात्र राजनीति से आए कई और विधायक भी राजस्‍थान की वर्तमान 13वीं विधानसभा में सदस्‍य हैं।

श्री हनुमान बेनिवाल के निलम्‍बन के विरोध में पूरा विपक्ष खड़ा होता है और संसदीय कार्यमंत्री श्री शांति धारीवाल के खिलाफ नियम 119 के तहत निंदा प्रस्‍ताव लाता है।
जलदाय मंत्री, राजस्‍थान सरकार श्री महिपाल मदेरणा (94141-34600) दूसरे दिन जब अनुदान मांगों पर चर्चा का प्रस्‍ताव रख रहे थे तो विपक्ष के विधानसभा सचेतक श्री राजेन्‍द्र राठौड़ ने वही सब किया जो उनको नहीं करना चाहिए था।
श्री राठौड़ के खिलाफ जलदाय मंत्री को बोलने से रोकने के प्रयास को आधार बनाकर सत्‍ता पक्ष निलम्‍बन प्रस्‍ताव लाया और उन्‍हें एक साल के लिए विधानसभा से निलम्बित कर दिया गया।
गतिरोध फिलहाल भी जारी है।

राजस्‍थान में हो रहा यह घटनाक्रम हमें क्‍या संकेत दे रहा है ? हम और हमारे जनप्रतिनिधि किस ओर जा रहे हैं?

राजस्‍थान पत्रिका के उसी संपादकीय के हवाले से बात को समाप्‍त करता हूं- ''आज निलम्‍बन और कल निलम्‍बन वापस लेने से सदन में ऐसे 'हादसों' को बढ़ावा मिलेगा।''
फिर क्‍या विकल्‍प हो सकता है ?


Wednesday, March 10, 2010

मन के सुकुन के लिए काम करता चित्रकार

इस पुस्‍तक के आवरण चित्र की तरह लगभग एक हजार पुस्‍तकों के आवरण राजस्‍थान के इस सपूत ने तैयार किए है। कूची की करामात लिए ज्‍यादा और तकनीक के सहयोग से कम। यही नहीं अब तक अनेक चित्र प्रदर्शनियों के माध्‍यम से सराहना पा चुकी यह प्रतिभा निरंतर उसी गति से गतिमान है। न कोई अभिमान और न दंभ।
यह प्रतिभा ‍ 'रामकिशन अडिग' के नाम से जानी-पहचानी जाती है।


राजस्‍थानी साहित्‍यकारों में लोकप्रिय चित्रकार अडिग चूरू जिले की राजगढ़ तहसील के नरवासी गांव के निवासी हैं तथा वर्तमान में नवोदय विद्यालय, पल्‍लू (नोहर) हनुमानगढ़ में सरकार को सेवाएं दे रहे हैं।

श्री अडिग की चित्र प्रदर्शनी 'सीन-अनसीन' ने काफी दाद पाई थी। श्री अडिग द्वारा निर्मित 'पुस्‍तक पर्व-2009' शुभंकर भी काफी प्रशंसा पा चुका है। श्री अडिग की सद्य प्रदर्शित चित्र-प्रदर्शनी 'मोहतरमा' काफी चर्चित एवं उल्‍लेखनीय रही है। इस प्रदर्शनी में श्री अडिग के नारी के इर्द-गिर्द संयोजित कुल 21 चित्रों (5 पेंटिग और 16 पेंसिल वर्क) ने सभी का मन मोहा है।



यही नहीं श्री अडिग ने रंगों की आभा को एक अलग अंदाज में भी पेश किया है-



ऐसे चित्रकार का मानना है कि कला की साधना के क्रम में मन को सुकून मिलता है और बस यह हो जाता है। साहित्‍य, सिनेमा और कला की अनन्‍य विधाएं अडिग का मन मोहती हैं तभी तो डॉ. दुष्‍यंत ऐसे चित्रकार का परिचय कुछ यूं देते हैं- ''अडिग एक विचित्र जीव हैं। कभी वैश्विक सिनेमा के घोर दर्शक क़भी भारतीय शास्त्रीय और अल्पज्ञात विदेशी संगीत के गुणी रसिक। बिरले गंभीर साहित्य पाठक और सबसे पहले तथा आखिरकार एक सजग और विशिष्ट चित्रकार। इस विचित्र से जीव का कलाकर्म अपने समय के साथ आंख मिलाने के पागलपन में रचा हुआ है।''

खास : प्रयास संस्थान, चूरू‍ की ओर सूचना केंद्र, चूरू में (अप्रेल-2010) श्री रामकिशन अडिग की चित्र प्रदर्शनी प्रस्‍तावित है। श्री अडिग के खुद के ही जिले में यह प्रथम प्रदर्शनी होगी जिसकी खबर हम सभी को खुशी देने वाली है।

Tuesday, March 9, 2010

साहित्‍य प्रेमियों को निराशा हुई है

राजस्‍थान के वित मंत्री श्री अशोक गहलोत ने राज्‍य का सालाना बजट (2010-11) आज राज्‍य विधानसभा में प्रस्‍तुत किया। चूंकि श्री अशोक गहलोत राज्‍य के मुख्‍यमंत्री भी हैं अतएव यह बजट काफी मायने रखता है।
बजट में नई सौर ऊर्जा नीति लागू करने की कवायद, जल नीति को गंभीरता से लेने का संकल्‍प, नि:शक्‍त जन नीति‍ बनाई जाने की पहल है। वहीं खाद्य, नागरिक एवं आपूर्ति निगम की स्‍थापना के साथ ही हरेक माह की 15 से 21 तारीख तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन वितरण और उस वक्‍त एक सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी, निस्‍संदेह एक संतोषजनक पहल है। निगम हेतु 50 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
वहीं 21 लाख किसानों के लिए 5 हजार करोड़ के ऋण की घोषणा किसानों के लिए कुछ सुखद है। अल्‍पसंख्‍यकों के लिए खासकर मदरसों में 1000 शिक्षा सहयोगी व संविदा पर कम्‍प्‍यूटरकर्मी लगाये जाने की घोषणा की गई है वहीं नगरीय विकास विभाग की तरफ से दस्‍तकार योजना अमल में लाने का अमलीजामा पहनाया गया है, जोकि स्‍वागत योग्‍य है। वक्‍फ बोर्ड के लिए 50 लाख राशि का प्रावधान भी किया गया है।
ऊर्जा क्षेत्र में विस्‍तार के संकल्‍प के साथ कुल बजट का 52 प्रतिशत समर्पण सरकार की प्राथमिकता दर्शाता है। वहीं सामाजिक कल्‍याण के लिए ज्‍यादा लोकलुभावने वादे न करना सरकार की दृष्टि का रूपाकंन भी।
जोधपुर सहित दो मानसिक विमंदितों के लिए आवासीय चिकित्‍सालय खोलने की घोषणा जरूरी कदम है।
वृद्धावस्‍था पेंशन आयवर्ग के अनुसार समुचित बढाना एवं स्‍वतंत्रता सेनानियों की पेंशन 8 हजार से 10 रूपये मासिक करना संबल है। मुख्‍यमंत्री चिकित्‍सा कोष में बीपीएल चिकित्‍सा सेवा का दायरा विधवा, विकलांग एवं वृद्ध जनों तक विस्‍तृत करना, वास्‍तव में स्‍वागत योग्‍य है। वहीं विकलांगों के लिए राजस्‍थान राज्‍य पथ परिवहन निगम की बसों में मुफ्त यात्रा का तोहफा सभी को प्रभावित कर गया। बीपीएल को 1 मई से 2 रूपये प्रतिकिलो की दर से 170 करोड़ वाली गेहूं योजना लोकलुभावनी कही जा सकती है।
2300 कांस्‍टबेल, 1000 अंग्रेजी स्‍कूल व्‍याख्‍याता की भर्ती की घोषणा स्‍वागत योग्‍य है, लेकिन यह संख्‍यात्‍मक दृष्टि से कम महसूस होती है।
एनसीआरटी की तर्ज पर राजस्‍थान के इतिहास एवं ज्ञान को समावेशित करते हुए कक्षा 9 से 12 तक का पाठ्यक्रम लागू करने का संकल्‍प, शिक्षा पद्धति में आमूलचूल बदलाव का संकेत है।
मूल निवास, जाति प्रमाण पत्र आदि पर लगने वाली स्‍टाम्‍प डयूटी पूर्णतया हटाने की घोषणा खासकर विद्यार्थियों के लिए लाभकारी है। वहीं शहरी क्षेत्रों में 100 यूनिट से ज्‍यादा बिजली पर 10 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्‍त लागू कर उसे शहरी निकायों को देना एकभांति उपभोक्‍ताओं के लिए कष्‍टदायक है।

वहीं साहित्‍य के लिए कुछ घोषणा न होना भी कष्‍टदायक है, कला एवं संस्‍कृति के क्षेत्र हेतु 1 करोड़ रूपये अतिरिक्‍त देना जरूर स्‍वागत योग्‍य है लेकिन यह राशि पर्याप्‍त नहीं है और समुचित बढोतरी नहीं मानी जा सकती।
कुछ लोगों द्वारा सभी अकादमियों पर एक नियंत्रणकारी संस्‍था बनाकर निदेशक बनाने के प्रयास का पटाक्षेप हो जाना सुखद है। बजट में इस तरह की घोषणा का इंतजार था।

सरकार द्वारा साहित्‍य अकादमियों का बजट और इस दिशा में इच्‍छा शक्ति का अभाव खलने वाला है, जिससे सभी साहित्‍य प्रेमियों को निराशा ही हुई है।

कर राहतों के पिटारा के बीच बजट संतुलित जरूर माना जा सकता है।

मुझे जो पहलू अच्‍छा लगा वह सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने का संकल्‍प है, जैसे नई सौर ऊर्जा नीति बनाना एवं सभी सौर ऊर्जा उपकरणों को कर मुक्‍त करना। ऊर्जा संकट के लिए इस तरह के प्रयोग राजस्‍थान में सराहनीय हो सकते हैं। बधाई।

Sunday, March 7, 2010

पाती-दर-पाती

मेरे द्वारा लिखी पिछली पोस्‍ट 'एक पाती यह भी' पर एंटीवायरस के संपादक-साहित्‍यकार श्री नीरज दइया ने अपने विचारों भरी पाती 'विरोध के लिए विरोध नहीं' लिखी।
इसमें उठे सवालों का जवाब मेरे द्वारा दिया गया वहीं उन्‍हीं का प्रत्‍युत्‍तर भाई नीरज ने अपनी पोस्‍ट 'प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया पर कुछ शब्‍द' लिखी।

'इन दिनों.....' के जिज्ञासु पाठक लिंक से वहां पहुंचकर यह सब जान सकते हैं।
साहित्यिक बंधुओं के लिए सादर।

Friday, February 26, 2010

एक पाती यह भी

मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे किसी विषय पर मुझसे लिखना हो जायेगा।

किसी काम को गलत होते देखते हैं तो दो ढंग की प्रतिक्रियाएं होती हैं। पहली, उसकी निंदा करना और दूसरी, उन गलतियों या कमियों से कुछ सीखते हुए स्‍वयं बेहतर करना। मैं देखने का दूसरा ढंग काम में लेने का प्रयत्‍न करता हूं। और वह ढंग मुझे भाता भी है।

किसी भी सही या गलत को देखकर मानव-मन में भाव उत्‍पन्‍न होने स्‍वाभाविक है। सही को देखकर प्राय: सभी आनंदित होते हैं। गलत तो गलत होता ही है। यहां लिखने का विषय यही है।
मुझे कोई बात गलत लगती है तो मैं स्‍वयं प्रयास करता हूं कि कम से कम यह गलती मैं नहीं करूंगा।
कभी-कभी गलत करने वालों से लड़ना भी पड़ता है और एक संकल्‍प के रूप में उस काम को लेना पड़ता है। कम से कम हमारा पहला कदम होता है कि गलत करने वालों को अपने काम के बूते पर गलती का अहसास कराना। न कि निंदा करके।

मुझे बहुत से काम अपने इर्द-गिर्द के अच्‍छे नहीं लगते। फिर भी, मैं चाहते हुए उनको नहीं रोक सकता। आलोचना करना भी सार्थक नहीं होता, क्‍योंकि सबकी अपनी-अपनी दृष्टि होती है। जो मुझे गलत लग रहा है, हो सकता है वह बहुमत की दृष्टि में सही हो।
ऐसी हालात में मुझमें एक शक्ति उत्‍पन्‍न होती है और वह शक्ति बचपन की उस सीख की बदौलत है, आप जो चाहते हैं वह स्‍वयं करके दिखाओ। दूसरों की तरफ क्‍यों ताकते हो।
और भगवान की मेहरबानी व शरीर के साथ की वजह से आज तक सब अनुकूल होता रहा है।
यह खुशकिस्‍मती है।

छात्रसंघ में और साहित्‍य अकादेमी के परामर्श मंडल के दौर में सब अनुकूल हुआ या हो रहा है, यह जरूरी नहीं। लेकिन कुल कितने काम ऐसे हैं जो आपकी बदौलत हुए और वो सही हैं।

गलत हो रहा है तो उसे अवश्‍य रोकना चाहिए।
गलत को रोकने का प्रयास करना सराहनीय है परंतु, ऐसा करते-करते व्‍यक्ति कभी स्‍वयं भी गलत करने लग जाता है।
यही बात इन दिनों हो रही है। एंटीवायरस जरूरी हैं लेकिन वायरस के रूप में विकसित होना गलत।
भाई नीरज दईया की प्रतिभा का मैं कायल हूं। व्‍यक्तिश: प्रशंसक भी। लेकिन यहां बात रखने से पूर्व इस बात को परे रखूंगा।

मैं साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के राजस्‍थानी एडवायजरी बोर्ड का सदस्‍य हूं। ---- 1/10वां भाग।
अतएव साहित्‍य अकादेमी के राजस्‍थानी बाबत निर्णय पर यश-अपयश का भागी हूं।

विजयदान देथा, चंद्रप्रकाश देवल, मालचंद तिवाड़ी और मेजर रतन जांगिड़। इन सबके बीच में कुंदन माली, के.के. शर्मा और श्री हरीश भादानी
यह व्‍यूह ही रहा है चर्चा का केंद्र।

इसमें कई लोगों के विचारों की छोंक लगती रही। बुरा न माने छोंक स्‍वादिष्‍ट के लिए ही लगाई जाती है।

बिज्‍जी,सीपी, मालचंद व रतन जांगिड़ में से कौन कितने पानी में हैं, हम सभी जानते हैं। साहित्‍य अकादेमी की निर्णय प्रक्रिया से भी हम सब वाकिफ़ हैं। और यह तय भी है कि हममें से कुछ रचनाकार इसमें भागीदार भी रहे हों।

मेजर जांगिड़ का रचनाकर्म किसी से अछाना नहीं है। मैं व्‍यक्तिगत रूप से उन्‍हें जानता हूं और उनके साहित्‍य को पढ़ा भी है परंतु, यहां चर्चा जरूरी नहीं है।

जरूरी यह समझना है कि निर्णायकों की प्रक्रिया से गुजरकर साहित्‍य अकादेमी ने पुरस्‍कार घोषित किया है , वह गलत है या सही।
यहां कुछ बंधु सवाल उठा रहे हैं क‍ि मेजर जांगिड़ को गलत पुरस्‍कार मिला है, यह पुरस्‍कार हरीश भादानी को मिलना चाहिए था।

क्‍यों भई ?

मेजर रतन जांगिड़ की कृति कमजोर है और हरीश भादानी की कृति मजबूत। इसीलिए ना।
या फिर इसलिए कि हरीश जी का राजस्‍थानी में बहुत ज्‍यादा काम है और मेजर का काम कम।

आलोचकों से मेरा सीधा-सा एक सवाल है। कोई साहित्‍य अकादेमी की पैरवी करना नहीं। या संयोजक और निर्णायक मंडल के तेल लगाना नहीं।
पहली बात यह कि हरीश भादानी की कृति 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' जितने लोगों ने पढ़ी उनमें से कितने लोग यह सही मानते हैं कि अकादमिक पुरस्‍कार के लिए इस कृति की रचनाएं साहित्‍य अकादेमी तंत्र के लिए उपयुक्‍त हैं ?
सरकारी अकादमियों के अपने मानदण्‍ड होते हैं और अपनी बाध्‍यताएं।
बुद्धिजीवी पाठक बता पाएंगे कि इस पुस्‍तक में कितने व्‍यक्तियों पर सीधे प्रहार हैं ?
और यह भी बता पाएंगे कि ऐसे प्रहारों के बीच क्‍या यह पुस्‍तक सरकारी तंत्र के पुरस्‍कार के लिए पात्र थी ?
दूसरी बात यह जानना भी वाजिब है कि भादानी जी बीकानेर के रहने वाले थे और बीकानेर में ही स्‍थापित राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी ने उनका कितना सम्‍मान किया ? इस राज्‍य अकादमी ने पुरस्‍कार तो दूर की बात, इसी पुस्‍तक 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' को पांडुलिपि सहयोग देने से भी इंकार कर दिया था। आखिर क्‍यों ? तब भादानी जी जीवित भी थे, यह विरोध क्‍यों नहीं किया गया, जो आज किया जा रहा है ?
तीसरी, यह कि पुस्‍तक 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के पिछले साल के पुरस्‍कार के समय भी निर्णायकों के सामने थी, तब भी उसको पुरस्‍कार नहीं मिला। क्‍या पिछले साल के तीनों निर्णायक भी गलत थे ?

अगर ये सारे निर्णय गलत हैं तो निस्‍संदेह इस साल के निर्णायकों का निर्णय गलत है।


(मैंने हरीशजी की यह पुस्‍तक पढ़ी है और संयोग रहा है कि हरीश जी से चर्चा भी हुई थी, इस बाबत। कुछ टूटे-फूटे शब्‍दों में उनकी बात-
हरीश जी कमला गोइन्‍का साहित्‍य पुरस्‍कार लेने चूरू आए थे। जब मैंने यह सवाल उठाया तो उनका जवाब था‍ कि मुझे सत्‍य लिखने से कोई नहीं रोक सकता। मुझे पुरस्‍कारों की चाह नहीं। यह पुस्‍तक प्रकाशित होते समय भी कई साथियों ने सुझाव दिए थे कि पुस्‍तक के ये विवादास्‍पद अंश हटा दो, तो मैंने एक स्‍वर में कहा था कि मैं कोई अकादमिक पुरस्‍कार हेतु कृति प्रकाशित नहीं कर रहा। ये मेरी रचनाएं हैं जिन्‍हें मैंने जीया है। उन्‍होंने कहा कि कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन का पुरस्‍कार मुझे इसलिए मिल गया कि यह निजी पुरस्‍कार है, सरकारी होता तो यह भी नहीं मिलता। और मैं मिलने की अपेक्षा भी नहीं करता।)

ऐसी सूरत में एक स्‍वर्गीय साहित्‍यकार श्री हरीश जी के नाम का अमलीजामा पहनाकर साहित्‍य अकादेमी के पुरस्‍कार को आड़े हाथों लेना कम से कम मुझे नहीं सुहाता।

और यह भी नहीं सुहाता कि इस मामले को लेकर किसी को फलाणचंद-ढिकड़चंद कहा जाए।
चंदगिरी तो इसी में है कि हमें जिन चंदों से नफरत है, जिनके कामों से घृणा है, जिनके कामों के प्रति विरोध है उनके कामों से श्रेष्‍ठ काम करके मिसाल पैदा की जाए।

आलोचना-प्रत्‍यालोचना का यह दौर समय-बर्बादी का हिस्‍सा है। और मैं मानता हूं कि इस समय में बेहतर काम किया जा सकता है। जहां संभावनाएं होती हैं वहीं निवेदन संप्रेषित किया जाता है। आशा है निवेदन समझा जाएगा।

रही बात भादानीजी की, अगर उनको साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार मिलता तो मुझे भी खुशी होती। लेकिन यह तय है किसी पुरस्‍कार की प्राप्ति और बिछोह से व्‍यक्ति छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरस्‍कार व्‍यक्ति को नहीं, व्‍यक्ति पुरस्‍कार को सम्‍मानित करता है, बशर्ते वह व्‍यक्ति पुरस्‍कार का वास्‍तविक हकदार हो। बहुत से ऐसे महान् साहित्‍यकार हैं जो पुरस्‍कारों से वंचित रहते हुए भी आज अमर हैं और पुरस्‍कार प्राप्‍तकर्ताओं से ज्‍यादा चर्चित हैं। भादानीजी से मिलना और बतियाना हम जैसे रचनाकारों के लिए अपने-आप एक सम्‍मान-पुरस्‍कार की बात थी। ऐसे में, उन्‍हें विवादों में नहीं घसीटा जाना चाहिए।

खैर.... साहित्‍य अकादेमी के कामों का विस्‍तृत लेखा-जोखा दिसम्‍बर, 2012 (वर्तमान एडवायजरी बोर्ड का कार्यकाल) के बाद प्रस्‍तुत करेंगे। कितना सही हुआ, कितना गलत, आप बताना जरूर।


हां, चलते-चलते याद आया। एक अख़बार आया था मेरे पास, उसमें मीन राशि वालों ने बाल साहित्‍य पर पुरस्‍कार देने की राय प्रकट की थी, मैं कूट भाषा नहीं समझता परंतु, यह जानता हूं कि मैं भी मीन राशि वाला हूं। कृपया इस विषय में मेरी इससे पहले वाली पोस्‍ट जरूर पढें।


बाल साहित्‍य की सुध ली साहित्‍य अकादेमी ने

किसी भी भाषा का विस्‍तार तीव्र गति से तभी हो सकता है जब वह भाषा प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी हो। स्‍कूल में बच्‍चा पहुंचते ही घर में अपनी मां से सीखी भाषा को न छोड़े और उसी में पढ़ते हुए आगे बढ़े तो ठाठ ही निराले होते हैं। लेकिन यह खुशकिस्‍मती कुछ भाषाओं तक ही है।

हमारी भाषा राजस्‍थानी को संवैधानिक मान्‍यता नहीं है और यह प्राथमिक शिक्षा की भाषा का सम्‍मान पाने से दूर है। यह दीगर बात है कि दसवीं व उसके बाद की कक्षाओं में एक भाषा के रूप में इसका चुनाव किया जा सकता है, लेकिन यह भी सत्‍य है कि तब तक आते-आते मातृभाषा लिखने की क्षमता से विद्यार्थी जुड़ा नहीं रह पाता।
राजस्‍थानी लिखना शायद आज 80 प्रतिशत राजस्‍थानियों के लिए संकट बना हुआ है। कारण कि उनका लिखने की शुरूआत के बाद इस काम से वास्‍ता ही नहीं पड़ा। कभी-कभी तो पाठकों से ऐसे संवाद स्‍थापित होते हैं कि राजस्‍थानी में पहली दफा आपकी पुस्‍तक देखी। उनका दूसरा वाक्‍य होता है कि वास्‍तव में राजस्‍थानी पढ़ी नहीं जाती।
यहां दो सवाल उठते हैं, पहला महत्‍वपूर्ण हैं। वह यह कि राजस्‍थानी में लिखा, राजस्‍थानी लोगों की पहुंच में नहीं है। दूसरा भी कम महताऊ नहीं है कि राजस्‍थानी पढ़ी नहीं जाती।
राजस्‍थानी लोगों तक पुस्‍तकें पहुंचे भी कैसे, जब लेखक स्‍वयं जोड़-तोड़ करके पुस्‍तक की मात्र 500 प्रतियां ही मुश्किल से छपवा पाता है। कहां से लाए लेखक पैसा ?
दूसरा यह कि राजस्‍थानी पढ़ी भी कैसे जाए, जब हमने कभी इसका अभ्‍यास ही नहीं किया।
इसका एक विकल्‍प है-

स्‍कूल की पढ़ाई में भाषा नहीं, मगर बाल साहित्‍य के रूप में बच्‍चों को राजस्‍थानी साहित्‍य की पुस्‍तकें उपलब्‍ध हों तो निश्चित रूप से बच्‍चों का मोह राजस्‍थानी से होगा और वे भाषा को पढ़ने में पारंगत होंगे।
यह काम एक मिशन के रूप में लिया जा सकता है।
परंतु, विडम्‍बना यह रही कि अधिकतर साहित्‍यकार बाल साहित्‍य को हेय समझते रहे।
मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर और भी न जाने कितने नाम हैं जिन्‍होंने बाल साहित्‍य विपुल मात्रा में सृजित किया। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने तो नोबेल पुरस्‍कार मिलने के बाद भी बाल साहित्‍य लिखा। हमें उन पर गर्व होना चाहिए।

बाल साहित्‍य खासकर राजस्‍थानी का बाल साहित्‍य काफी उपेक्षित रहा है। राजस्‍थानी बाल साहित्‍यकारों के अंगुलियों पर गिने जाने वाले नाम सामने हैं। और जो नाम सामने हैं उनका कभी अकादमी एवं निजी मंचों से यथोचित सम्‍मान नहीं किया गया। राजस्‍थानी में बाल साहित्‍य के नाम पर मुझे दो पुरस्‍कार ध्‍यान में आ रहे हैं- एक, राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर का 'जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्‍य पुरस्‍कार' और दूसरा निजी 'चंद्रसिंह बिरकाळी पुरस्‍कार'।
खुश खबरी-

अब इसमें एक तीसरा नाम और जुड़ने जा रहा है। जी हां, यह खुशख़बरी है- साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली ने हाल ही में फैसला किया है कि वह सभी 24 भाषाओं में बाल साहित्‍य के लिए एक पुरस्‍कार शुरू करेगी। पुरस्‍कार की राशि 51 हजार रूपये नगद होगी।

अब साहित्‍य अकादेमी की तरफ से राजस्‍थानी सहित सभी 24 भाषाओं में प्रत्‍येक भाषा के लिए तीन पुरस्‍कार हो गए। पहला- साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार (एक लाख रूपये), दूसरा- अनुवाद पुरस्‍कार (51 हजार रूपये) और तीसरा- बाल साहित्‍य पुरस्‍कार (51 हजार रूपये)।

क्‍या साहित्‍य अकादेमी की यह पहल स्‍वागत योग्‍य नहीं ?


एक दैनिक का मातृभाषा के नाम समर्पण

राजस्‍थान के जयपुर शहर से निकलने वाला दैनिक अख़बार 'डेली न्‍यूज़' रविवार को 'हम लोग' नाम से परिशिष्‍ट निकालता है।
गत रविवार अर्थात् 21 फरवरी को अख़बार ने मातृभाषा दिवस को परिशिष्‍ट समर्पित किया। अख़बार का यह प्रयास सराहनीय है। खासकर धन्‍यवाद के पात्र है अख़बार से जुड़े राजस्‍थान की युवा साहित्यिक टीम के साथी डॉ. दुष्‍यत, डॉ. दिनेश चारण, डॉ. मदनगोपाल लढ़ा आदि।
इसी परिशिष्‍ट में मेरी राजस्‍थानी कहानी 'विश्‍वास' का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया।
अख़बार की संपादकीय टीम का आभार।
'हम लोग' 21 फरवरी अंक निमित्‍त बेहतर होता एक-दो रचनाएं मातृभाषा में ही होती। खैर------।
प्रयास स्‍तुत्‍य।
आपको भी लायक लगे तो दाद जरूर दें।

Monday, February 22, 2010

साहित्यिक मेला








अंतरराष्‍ट्रीय मातृ भाषा दिवस 21 फरवरी (2010) के दिन राजस्‍थान के फतेहपुर-शेखावाटी में राजस्‍थानी भाषा के साहित्‍यकारों का एक मेला भरा। अवसर था- धानुका सेवा ट्रस्‍ट, फतेहपुर-शेखावाटी द्वारा पुरस्‍कार वितरण समारोह।

ट्रस्‍ट के मुख्‍य ट्रस्‍टी और व्‍यवसायी, साहित्‍यप्रेमी श्री नरेन्‍द्रकुमार धानुका कोलकाता रहते हैं और प्रतिवर्ष अपनी जन्‍मभूमि फतेहपुरशेखावाटी में ऐसे मेले का आयोजन करते हैं। हरेक वर्ष फतेहपुर की भूमि पर अनेक साहित्‍यकार-साहित्‍यानुरागी जुटते हैं।

समारोह में राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी बीकानेर के पूर्व अध्‍यक्ष श्री सीताराम महर्षि, पूर्व उपाध्‍यक्ष श्री हनुमान दीक्षित, साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली के राजस्‍थानी भाषा परामर्श मंडल संयोजक डॉ. चंद्रप्रकाश देवल, साहित्‍यकार एवं राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी प्रचार समिति के श्री श्‍याम महर्षि, आचार्य तुलसी शोध संस्‍थान बीकानेर के डॉ. किरण नाहटा, राजस्‍थानी भाषा के समृद्ध रचनाकार श्री बैजनाथ पंवार, डॉ. गोरधनसिंह शेखावत, डॉ. मदन सैनी इस समारोह में मंचासीन हुए।

सहभागी रूप में साहित्‍यकार श्री भंवरसिंह सामौर, डॉ. उदयवीर शर्मा, श्रीभगवान सैनी, रवि पुरोहित, शंकर झकनाडि़या, केसरीकांत केसरी, सत्‍यनारायण इंदौरिया, प्रमोद कुमार शर्मा, डॉ. चेतन स्‍वामी, देवकरण जोशी दीपक, किशोर निर्वाण, विश्‍वनाथ भाटी, डॉ. महावीर पंवार, उम्‍मेद धानियां, डॉ. रामकुमार घोटड़, कुमारअजय, उम्मेद गोठवाल‍, डॉ. महेन्‍द्रसिंह मील, शिशुपालसिंह नारसरा, शंभु खेड़वाल सहित अनेक साहित्‍यकारों का समागम हुआ।
एक रूप में यह साहित्यिक मेला ही रहा।

समारोह में श्री बैजनाथ पंवार को मानुष-तनु सम्‍मान, डॉ. गोरधनसिंह शेखावत को श्री सरस्‍वती सेवा पुरस्‍कार-2008, डॉ. मदन सैनी को श्री सरस्‍वती सेवा पुरस्‍कार-2009 व दुलाराम सहारण को बसंतीदेवी धानुका युवा साहित्‍यकार पुरस्‍कार-2009 प्रदत्‍त किया गया।

समारोह में डॉ. रामकुमार घोटड़ की पुस्‍तक 'देश-विदेश की लघुकथाएं' व श्री शिशुपालसिंह नारसरा संपादित एकांकी संग्रह का विमोचन भी किया गया।

ढेरों स्‍मृतियों लिए यह आयोजन चिर स्‍मरणीय रहेगा।

Saturday, February 20, 2010

एक अध्‍याय का अंत होना

(फोटो : विधायक श्री जयदेवप्रसाद इंदौरिया, दुलाराम सहारण(मैं), विधायक श्री चंदनमल बैद, 1997)

अभी-अभी समाचार मिला कि राजस्‍थान के वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता श्री चंदनमलजी बैद नहीं रहे।

यह ख़बर हालांकि सर्व स्‍वरूपा दु:खद नहीं है क्‍योंकि श्री बैद 88 वर्षीय थे और पिछले कुछ समय से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। लेकिन मेरे जैसे अनेक लोगों के लिए यह दु:खद समाचार है क्‍योंकि हमने अपने क्षेत्र का एक पूर्व विधायक खोया है। जी, चंदनमलजी बैद मेरे क्षेत्र तारानगर के विधायक रहे और राज्‍य के वित्‍त मंत्रालय सहित अनेक मंत्रालयों को संभाला।

पिता श्रीजयचंद बैद के यहां सरदारशहर (चूरू) में जन्में श्री चंदनमलजी बैद राजस्थान विधानसभा में 8 बार पहुंचे। सन् 1952, 1957, 1962, 1972, 1980, 1990, 1993 एवं 1998 के चुनावों में वे विजयी होकर विधानसभा पहुंचे। श्री बैद ने 1980 में चूरू लोकसभा का कांग्रेस पार्टी से चुनाव भी लड़ा और कुल 120490 मत प्राप् किए।
सरदारशहर तारानगर विधानसभा क्षेत्र का संयुक् क्षेत्र सन् 1977 तक एक ही था तथा सरदारशहर विधानसभा के नाम से जाना जाता था। सन् 1977 में तारानगर विधानसभा क्षेत्र पृथक रूप से अस्तित् में आया।
1952 के प्रथम आम चुनाव से लेकर 1972 तक लगातार सरदारशहर विधानसभा का प्रतिनिधित्‍व श्री बैद ने किया। सन् 1977 में वे सरदारशहर विधानसभा से विजयी न हो सके, इसका मोटा कारण तारानगर क्षेत्र का अलग होना रहा। श्री बैद 1980 के चुनाव में सरदारशहर छोड़कर तारानगर आए और यहीं के होकर रहे। उन्‍होंने अपना अंतिम चुनाव 1998 का‍ विधानसभा चुनाव तारानगर से लड़ा और विजयी रहे। 1998 में राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री श्री अशोक गहलोत बने और श्री बैद राजस्‍थान के वित मंत्री।
2003 में हुए विधानसभा चुनाव में तारानगर विधानसभा का नेतृत्‍व श्री चंदनमल बैद के पुत्र और पेशे से चिकित्‍सक रहे डॉ. चंद्रशेखर बैद ने किया।

श्री चंदनमल बैद राजस्‍थान के उच्‍च शिक्षा मंत्री, नहर मंत्री भी रहे। तारानगर क्षेत्र के पीने के पानी और सिंचाई के पानी के लिए वे आजीवन संघर्षरत रहे और कुछ हद तक कामयाब भी रहे।

मुझे जहां तक याद है मेरे छोटे से गांव में पीने का मीठा पानी उपलब्‍ध था (मतलब मेरे बाल्‍यकाल में ही मेरे गांव में पीने पानी आ गया था और वह भी मीठा) जबकि इस क्षेत्र के बहुत से गांव आज भी पीने के पानी की समस्‍या से जूझ रहे हैं। यह श्रेय श्री चंदनमलजी को ही है।

स्‍वर्गीय श्री बैद की राजनीतिक खूबी जो क्षेत्र में सदैव याद की जाती रहेगी वह यह है कि उन्‍होंने कभी थाना-पुलिस की राजनीति नहीं की और न ही बदले की भावना से काम किया।

उनके विकास कार्यों की एक लम्‍बी फेहरिस्‍त है, जिसमें मेरे गांव का उच्‍च प्राथमिक विद्यालय ( जो अब माध्‍यमिक स्‍तर का हो चुका है) जिसमें मैंने ककहरा सीखा, सर्वोपरि है।

श्री बैद से मेरा संपर्क रहा है और छात्र राजनीति के दौरान सान्निध्‍य भी मिला है। इसे घनिष्‍ठता तो नहीं कह सकते लेकिन साहचर्य जरूर कह सकते हैं। उनकी खूबी के रूप में मुझे जो तथ्‍य दिखाई दिया वह यह कि उन्‍होंने कभी झूठा वादा नहीं किया। काम नहीं करवाना है तो उन्‍होंने साफ कह दिया कि यह नहीं होगा। अगर उन्‍होंने हां भरी है तो मतलब काम तय है। देखेंगे, करेंगे, हो जाएगा आदि जुमले उनके स्‍वभाव में नहीं थे, और आज की राजनीति में यही सब चल रहा है।
ऐसे राजनीतिक दौर में उनका जाना मेरी दृष्टि में एक अध्‍याय का अंत होना है।
विनम्र श्रद्धांजलि।

कभी आपका ऐसी जगह से वास्‍ता पड़ा है ?

इन दृश्‍यों को आप ध्‍यान से देखिए। मुझे आज सुबह-सुबह इन सबसे रू-ब-रू होने का अवसर मिला।


आप सोच रहे हैं कि इन में ऐसी क्‍या खास बात है ? आम गृहस्‍थ के यहां ऐसे दृश्‍य मौजूद रहते हैं, यही ना।
जी हां, यह सही है कि इस आर्थिक युग की आपाधापी के बीच आम गृहस्‍थ ऐसे ही दृश्‍य अपने इर्द-गिर्द संजो पाता है। टूटी छप्‍परिया, लकड़ी-लकड़ी जोड़कर जलता हुआ चूल्‍हा और टूटने के कगार पर आने के बाद भी करीने से सजाई गई कुर्सी, यही तो सब कुछ है इन चित्रों में।

आज सुबह-सुबह चूरू जिला मुख्‍यालय पर 'नया बास' नाम से स्‍थापित कॉलोनी में मेरा जाना हुआ। प्रसंग भले ही कुछ रहा हो पर इन दृश्‍यों को देखकर मन गर्व से भर उठा और मेरा कैमरा इनको कैद करने के लिए आतुर हो उठा। क्‍योंकि यही वह पहलू है जहां से मैं बात शुरू कर सकता हूं।

मेरी दिन की शुरूआत स्‍थानीय अख़बार पढ़ने से होती है। या यूं कहूं कि प्रात:काल में ढेरों अपराध और छापों की कार्रवाई के ‍तथ्‍य-संग्रहण-पुलिंदे बांचने की प्रक्रिया से गुजरता हुआ स्‍वयं को तरोताजा करता हूं। आम भारतीय मानस शायद स्‍वयं को इसी ढंग से तरोताजा करता होगा। अपने इर्द-गिर्द होने वाले इस ढंग के व्‍यापार के बीच स्‍वयं को तोलता होगा और अपने रास्‍ते बनाने का संकल्‍प लेता होगा।
मेरे इस छोटे से शहर में भी मेरी भांति लोग सोचते होंगे, शायद।
आज के ही अख़बार में मेरे इस छोटे से शहर की ख़बर है कि वाणिज्‍य कर विभाग की कार्रवाई में एक सेनेटरी व टाइल्‍स की फर्म से पौने दो लाख का जुर्माना वसूला गया है। इस ढंग की और भी ख़बरें इस शहर से आए दिन आती रहती हैं। इन ख़बरों का यहा जिक्र करना वाजि़ब है, क्‍योंकि इन ख़बरों के पीछे एक शाश्‍वत सत्‍य मौजूद है और वह सत्‍य है राजनीतिक संरक्षण।
इस उजले युग में उजली माया के मोहपाश में हर कोई बंधा है। माया-मोहपाश के अलावा कोई दूसरा पाश उसे बांध न सके इसी वजह से हरेक राजनीति रूपी हथियार को अपने इर्द-गिर्द रखता है। और बटोरता चलता है वह सबकुछ जो शायद अंतिम छोर पर बैठे उस आम आदमी का हिस्‍सा है, जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
मैं भी चूंकि इस राजनीति का छोटा-सा भाग रहा हूं अतएव आए दिन 'कुछ लाभ उठाओं' जैसी सलाह का सामना करता रहता हूं। मैं समझ नहीं पाता हूं कि क्‍या यह सलाह शाश्‍वत सत्‍य है। मैं कभी-कभी स्‍वयं को कमजोर भी महसूस करने लगता हूं कि सब कह रहें हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे इसका मतलब हम पीछे हैं।
लेकिन जो संदर्भ मैंने आज सुबह-सुबह पकड़ा उसमें बड़ी शक्ति है।
यह प्रलाप बीच में ही छोड़कर उसी संदर्भ पर आते हैं-

ज़नाब, आपने उक्‍त छायाचित्रों को भली-भांति निहार लिया होगा। अगर नहीं तो संदर्भ बता दूं उससे पहले एक बार फिर से निहार लें।

जी, ये दृश्‍य मेरे जिला चूरू के एक प्रखर और धुरंधर राजनेता के घर के हैं। यह राजनेता 5 बार विधायक और एक बार जिला प्रमुख रह चुका है।
चौंकिए मत, यथार्थ पर आइए।

यह प्रखर राजनेता आज अपनी 80 वर्ष की वय में आम गृहस्‍थ की भांति जीवन को बड़ी ही गरिमा से जी रहा है। संसाधनों का अभाव भले ही हो परंतु चेहरे का ओज और मन का तेज आलोकित है और इनके कारण संसाधनों की आभा फीकी-सी लगती है।

एक बार विधायक बनने के बाद भारतीय लोकतंत्र इस कदर मेहरबान हो जाता है कि न्‍यारे-व्‍यारे ही बदल जाते हैं। आर्थिक पैमाने शिखर मापने लगते हैं। अगर यह सुनहरा अवसर 5 बार मिल जाए तो फिर चाहिए ही क्‍या, दुनिया के हर कोने में बंगले मिलना अनिवार्य हो जाता है।

लेकिन ईमान ?

भला वे राजनेता ऐसा थोड़े ही कह सकते हैं - ''इस प्रकार मैं सन् 1967 में तीसरी बार विधानसभा का सदस्‍य बना ----- सन् 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस बहुमत में नहीं आ सकी अत: सरकार बनाने में बड़ी परेशानी हुई-------विधानसभा को कुछ समय के लिए सस्‍पेंड कर दिया गया ------- बाद में सुखाडि़या जी के नेतृत्‍व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ- फिर भी स्थिति डांवाडोल थी सो कुछ विधायकों को शामिल करने के प्रयास किये जा रहे थे।
सुखाडि़या का संदेश-
मेरे पास भी सुखाडि़या जी का संदेश लेकर श्री फूलचंद जैन - जो सुजानगढ़ से चुनाव हार गये थे एवं श्री मनफूलसिंह भादू विधायक सूरतगढ़ आये और कहा कि सुखाडि़या जी चाहते हैं कि मैं उनके मंत्रीमंडल में शामिल हो जाऊं अत: मैं यह प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लूं - मंत्री बनने से इलाके में अच्‍छा विकास कर सकोगे।
मेरे सामने यह परीक्षा की घड़ी थी एक तरफ राजस्‍थान में पांच साल मंत्री बनना और दूसरी तरफ जनता ने जिस भावना से वोट दिये थे, उनकी भावना की रक्षा करना - सो मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि जनता की भावना की कद्र करूंगा और पांच साल विपक्ष में बैठकर ही जन सेवा करता रहूंगा - अत: मैंने उक्‍त महानुभावों को मंत्री बनने के लिए ना कर दिया ------- ''

यह शख्‍स चूरू विधानसभा से 1957 में प्रथम बार विधायक बना। जिला परिषद्, चूरू का प्रथम जिला प्रमुख बना। सन् 1962 राजगढ़ से विधायक बना। सन् 1967 में छापर से विधायक बना। सन् 1972 में पुन: छापर से विधायक बना। सन् 1977 में सुजानगढ़ से विधायक बना।

अपने ईमान से कभी नहीं डिगा और पैसे के लिए राजनीति से घृणा की। ईमानदारी से जीवन यापन और मतदाताओं के प्रति ईमानदारी पूर्वक व्‍यवहार।

चिंतन और क्रिया में कोई अंतर नहीं।

क्‍या आपको इस शख्‍स श्री रावतराम आर्य पर गर्व नहीं होता ?