Friday, February 26, 2010

एक पाती यह भी

मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे किसी विषय पर मुझसे लिखना हो जायेगा।

किसी काम को गलत होते देखते हैं तो दो ढंग की प्रतिक्रियाएं होती हैं। पहली, उसकी निंदा करना और दूसरी, उन गलतियों या कमियों से कुछ सीखते हुए स्‍वयं बेहतर करना। मैं देखने का दूसरा ढंग काम में लेने का प्रयत्‍न करता हूं। और वह ढंग मुझे भाता भी है।

किसी भी सही या गलत को देखकर मानव-मन में भाव उत्‍पन्‍न होने स्‍वाभाविक है। सही को देखकर प्राय: सभी आनंदित होते हैं। गलत तो गलत होता ही है। यहां लिखने का विषय यही है।
मुझे कोई बात गलत लगती है तो मैं स्‍वयं प्रयास करता हूं कि कम से कम यह गलती मैं नहीं करूंगा।
कभी-कभी गलत करने वालों से लड़ना भी पड़ता है और एक संकल्‍प के रूप में उस काम को लेना पड़ता है। कम से कम हमारा पहला कदम होता है कि गलत करने वालों को अपने काम के बूते पर गलती का अहसास कराना। न कि निंदा करके।

मुझे बहुत से काम अपने इर्द-गिर्द के अच्‍छे नहीं लगते। फिर भी, मैं चाहते हुए उनको नहीं रोक सकता। आलोचना करना भी सार्थक नहीं होता, क्‍योंकि सबकी अपनी-अपनी दृष्टि होती है। जो मुझे गलत लग रहा है, हो सकता है वह बहुमत की दृष्टि में सही हो।
ऐसी हालात में मुझमें एक शक्ति उत्‍पन्‍न होती है और वह शक्ति बचपन की उस सीख की बदौलत है, आप जो चाहते हैं वह स्‍वयं करके दिखाओ। दूसरों की तरफ क्‍यों ताकते हो।
और भगवान की मेहरबानी व शरीर के साथ की वजह से आज तक सब अनुकूल होता रहा है।
यह खुशकिस्‍मती है।

छात्रसंघ में और साहित्‍य अकादेमी के परामर्श मंडल के दौर में सब अनुकूल हुआ या हो रहा है, यह जरूरी नहीं। लेकिन कुल कितने काम ऐसे हैं जो आपकी बदौलत हुए और वो सही हैं।

गलत हो रहा है तो उसे अवश्‍य रोकना चाहिए।
गलत को रोकने का प्रयास करना सराहनीय है परंतु, ऐसा करते-करते व्‍यक्ति कभी स्‍वयं भी गलत करने लग जाता है।
यही बात इन दिनों हो रही है। एंटीवायरस जरूरी हैं लेकिन वायरस के रूप में विकसित होना गलत।
भाई नीरज दईया की प्रतिभा का मैं कायल हूं। व्‍यक्तिश: प्रशंसक भी। लेकिन यहां बात रखने से पूर्व इस बात को परे रखूंगा।

मैं साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के राजस्‍थानी एडवायजरी बोर्ड का सदस्‍य हूं। ---- 1/10वां भाग।
अतएव साहित्‍य अकादेमी के राजस्‍थानी बाबत निर्णय पर यश-अपयश का भागी हूं।

विजयदान देथा, चंद्रप्रकाश देवल, मालचंद तिवाड़ी और मेजर रतन जांगिड़। इन सबके बीच में कुंदन माली, के.के. शर्मा और श्री हरीश भादानी
यह व्‍यूह ही रहा है चर्चा का केंद्र।

इसमें कई लोगों के विचारों की छोंक लगती रही। बुरा न माने छोंक स्‍वादिष्‍ट के लिए ही लगाई जाती है।

बिज्‍जी,सीपी, मालचंद व रतन जांगिड़ में से कौन कितने पानी में हैं, हम सभी जानते हैं। साहित्‍य अकादेमी की निर्णय प्रक्रिया से भी हम सब वाकिफ़ हैं। और यह तय भी है कि हममें से कुछ रचनाकार इसमें भागीदार भी रहे हों।

मेजर जांगिड़ का रचनाकर्म किसी से अछाना नहीं है। मैं व्‍यक्तिगत रूप से उन्‍हें जानता हूं और उनके साहित्‍य को पढ़ा भी है परंतु, यहां चर्चा जरूरी नहीं है।

जरूरी यह समझना है कि निर्णायकों की प्रक्रिया से गुजरकर साहित्‍य अकादेमी ने पुरस्‍कार घोषित किया है , वह गलत है या सही।
यहां कुछ बंधु सवाल उठा रहे हैं क‍ि मेजर जांगिड़ को गलत पुरस्‍कार मिला है, यह पुरस्‍कार हरीश भादानी को मिलना चाहिए था।

क्‍यों भई ?

मेजर रतन जांगिड़ की कृति कमजोर है और हरीश भादानी की कृति मजबूत। इसीलिए ना।
या फिर इसलिए कि हरीश जी का राजस्‍थानी में बहुत ज्‍यादा काम है और मेजर का काम कम।

आलोचकों से मेरा सीधा-सा एक सवाल है। कोई साहित्‍य अकादेमी की पैरवी करना नहीं। या संयोजक और निर्णायक मंडल के तेल लगाना नहीं।
पहली बात यह कि हरीश भादानी की कृति 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' जितने लोगों ने पढ़ी उनमें से कितने लोग यह सही मानते हैं कि अकादमिक पुरस्‍कार के लिए इस कृति की रचनाएं साहित्‍य अकादेमी तंत्र के लिए उपयुक्‍त हैं ?
सरकारी अकादमियों के अपने मानदण्‍ड होते हैं और अपनी बाध्‍यताएं।
बुद्धिजीवी पाठक बता पाएंगे कि इस पुस्‍तक में कितने व्‍यक्तियों पर सीधे प्रहार हैं ?
और यह भी बता पाएंगे कि ऐसे प्रहारों के बीच क्‍या यह पुस्‍तक सरकारी तंत्र के पुरस्‍कार के लिए पात्र थी ?
दूसरी बात यह जानना भी वाजिब है कि भादानी जी बीकानेर के रहने वाले थे और बीकानेर में ही स्‍थापित राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी ने उनका कितना सम्‍मान किया ? इस राज्‍य अकादमी ने पुरस्‍कार तो दूर की बात, इसी पुस्‍तक 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' को पांडुलिपि सहयोग देने से भी इंकार कर दिया था। आखिर क्‍यों ? तब भादानी जी जीवित भी थे, यह विरोध क्‍यों नहीं किया गया, जो आज किया जा रहा है ?
तीसरी, यह कि पुस्‍तक 'जिण हाथां आ रेत रचीजै' साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली के पिछले साल के पुरस्‍कार के समय भी निर्णायकों के सामने थी, तब भी उसको पुरस्‍कार नहीं मिला। क्‍या पिछले साल के तीनों निर्णायक भी गलत थे ?

अगर ये सारे निर्णय गलत हैं तो निस्‍संदेह इस साल के निर्णायकों का निर्णय गलत है।


(मैंने हरीशजी की यह पुस्‍तक पढ़ी है और संयोग रहा है कि हरीश जी से चर्चा भी हुई थी, इस बाबत। कुछ टूटे-फूटे शब्‍दों में उनकी बात-
हरीश जी कमला गोइन्‍का साहित्‍य पुरस्‍कार लेने चूरू आए थे। जब मैंने यह सवाल उठाया तो उनका जवाब था‍ कि मुझे सत्‍य लिखने से कोई नहीं रोक सकता। मुझे पुरस्‍कारों की चाह नहीं। यह पुस्‍तक प्रकाशित होते समय भी कई साथियों ने सुझाव दिए थे कि पुस्‍तक के ये विवादास्‍पद अंश हटा दो, तो मैंने एक स्‍वर में कहा था कि मैं कोई अकादमिक पुरस्‍कार हेतु कृति प्रकाशित नहीं कर रहा। ये मेरी रचनाएं हैं जिन्‍हें मैंने जीया है। उन्‍होंने कहा कि कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन का पुरस्‍कार मुझे इसलिए मिल गया कि यह निजी पुरस्‍कार है, सरकारी होता तो यह भी नहीं मिलता। और मैं मिलने की अपेक्षा भी नहीं करता।)

ऐसी सूरत में एक स्‍वर्गीय साहित्‍यकार श्री हरीश जी के नाम का अमलीजामा पहनाकर साहित्‍य अकादेमी के पुरस्‍कार को आड़े हाथों लेना कम से कम मुझे नहीं सुहाता।

और यह भी नहीं सुहाता कि इस मामले को लेकर किसी को फलाणचंद-ढिकड़चंद कहा जाए।
चंदगिरी तो इसी में है कि हमें जिन चंदों से नफरत है, जिनके कामों से घृणा है, जिनके कामों के प्रति विरोध है उनके कामों से श्रेष्‍ठ काम करके मिसाल पैदा की जाए।

आलोचना-प्रत्‍यालोचना का यह दौर समय-बर्बादी का हिस्‍सा है। और मैं मानता हूं कि इस समय में बेहतर काम किया जा सकता है। जहां संभावनाएं होती हैं वहीं निवेदन संप्रेषित किया जाता है। आशा है निवेदन समझा जाएगा।

रही बात भादानीजी की, अगर उनको साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार मिलता तो मुझे भी खुशी होती। लेकिन यह तय है किसी पुरस्‍कार की प्राप्ति और बिछोह से व्‍यक्ति छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरस्‍कार व्‍यक्ति को नहीं, व्‍यक्ति पुरस्‍कार को सम्‍मानित करता है, बशर्ते वह व्‍यक्ति पुरस्‍कार का वास्‍तविक हकदार हो। बहुत से ऐसे महान् साहित्‍यकार हैं जो पुरस्‍कारों से वंचित रहते हुए भी आज अमर हैं और पुरस्‍कार प्राप्‍तकर्ताओं से ज्‍यादा चर्चित हैं। भादानीजी से मिलना और बतियाना हम जैसे रचनाकारों के लिए अपने-आप एक सम्‍मान-पुरस्‍कार की बात थी। ऐसे में, उन्‍हें विवादों में नहीं घसीटा जाना चाहिए।

खैर.... साहित्‍य अकादेमी के कामों का विस्‍तृत लेखा-जोखा दिसम्‍बर, 2012 (वर्तमान एडवायजरी बोर्ड का कार्यकाल) के बाद प्रस्‍तुत करेंगे। कितना सही हुआ, कितना गलत, आप बताना जरूर।


हां, चलते-चलते याद आया। एक अख़बार आया था मेरे पास, उसमें मीन राशि वालों ने बाल साहित्‍य पर पुरस्‍कार देने की राय प्रकट की थी, मैं कूट भाषा नहीं समझता परंतु, यह जानता हूं कि मैं भी मीन राशि वाला हूं। कृपया इस विषय में मेरी इससे पहले वाली पोस्‍ट जरूर पढें।


बाल साहित्‍य की सुध ली साहित्‍य अकादेमी ने

किसी भी भाषा का विस्‍तार तीव्र गति से तभी हो सकता है जब वह भाषा प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी हो। स्‍कूल में बच्‍चा पहुंचते ही घर में अपनी मां से सीखी भाषा को न छोड़े और उसी में पढ़ते हुए आगे बढ़े तो ठाठ ही निराले होते हैं। लेकिन यह खुशकिस्‍मती कुछ भाषाओं तक ही है।

हमारी भाषा राजस्‍थानी को संवैधानिक मान्‍यता नहीं है और यह प्राथमिक शिक्षा की भाषा का सम्‍मान पाने से दूर है। यह दीगर बात है कि दसवीं व उसके बाद की कक्षाओं में एक भाषा के रूप में इसका चुनाव किया जा सकता है, लेकिन यह भी सत्‍य है कि तब तक आते-आते मातृभाषा लिखने की क्षमता से विद्यार्थी जुड़ा नहीं रह पाता।
राजस्‍थानी लिखना शायद आज 80 प्रतिशत राजस्‍थानियों के लिए संकट बना हुआ है। कारण कि उनका लिखने की शुरूआत के बाद इस काम से वास्‍ता ही नहीं पड़ा। कभी-कभी तो पाठकों से ऐसे संवाद स्‍थापित होते हैं कि राजस्‍थानी में पहली दफा आपकी पुस्‍तक देखी। उनका दूसरा वाक्‍य होता है कि वास्‍तव में राजस्‍थानी पढ़ी नहीं जाती।
यहां दो सवाल उठते हैं, पहला महत्‍वपूर्ण हैं। वह यह कि राजस्‍थानी में लिखा, राजस्‍थानी लोगों की पहुंच में नहीं है। दूसरा भी कम महताऊ नहीं है कि राजस्‍थानी पढ़ी नहीं जाती।
राजस्‍थानी लोगों तक पुस्‍तकें पहुंचे भी कैसे, जब लेखक स्‍वयं जोड़-तोड़ करके पुस्‍तक की मात्र 500 प्रतियां ही मुश्किल से छपवा पाता है। कहां से लाए लेखक पैसा ?
दूसरा यह कि राजस्‍थानी पढ़ी भी कैसे जाए, जब हमने कभी इसका अभ्‍यास ही नहीं किया।
इसका एक विकल्‍प है-

स्‍कूल की पढ़ाई में भाषा नहीं, मगर बाल साहित्‍य के रूप में बच्‍चों को राजस्‍थानी साहित्‍य की पुस्‍तकें उपलब्‍ध हों तो निश्चित रूप से बच्‍चों का मोह राजस्‍थानी से होगा और वे भाषा को पढ़ने में पारंगत होंगे।
यह काम एक मिशन के रूप में लिया जा सकता है।
परंतु, विडम्‍बना यह रही कि अधिकतर साहित्‍यकार बाल साहित्‍य को हेय समझते रहे।
मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर और भी न जाने कितने नाम हैं जिन्‍होंने बाल साहित्‍य विपुल मात्रा में सृजित किया। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने तो नोबेल पुरस्‍कार मिलने के बाद भी बाल साहित्‍य लिखा। हमें उन पर गर्व होना चाहिए।

बाल साहित्‍य खासकर राजस्‍थानी का बाल साहित्‍य काफी उपेक्षित रहा है। राजस्‍थानी बाल साहित्‍यकारों के अंगुलियों पर गिने जाने वाले नाम सामने हैं। और जो नाम सामने हैं उनका कभी अकादमी एवं निजी मंचों से यथोचित सम्‍मान नहीं किया गया। राजस्‍थानी में बाल साहित्‍य के नाम पर मुझे दो पुरस्‍कार ध्‍यान में आ रहे हैं- एक, राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी, बीकानेर का 'जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्‍य पुरस्‍कार' और दूसरा निजी 'चंद्रसिंह बिरकाळी पुरस्‍कार'।
खुश खबरी-

अब इसमें एक तीसरा नाम और जुड़ने जा रहा है। जी हां, यह खुशख़बरी है- साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली ने हाल ही में फैसला किया है कि वह सभी 24 भाषाओं में बाल साहित्‍य के लिए एक पुरस्‍कार शुरू करेगी। पुरस्‍कार की राशि 51 हजार रूपये नगद होगी।

अब साहित्‍य अकादेमी की तरफ से राजस्‍थानी सहित सभी 24 भाषाओं में प्रत्‍येक भाषा के लिए तीन पुरस्‍कार हो गए। पहला- साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार (एक लाख रूपये), दूसरा- अनुवाद पुरस्‍कार (51 हजार रूपये) और तीसरा- बाल साहित्‍य पुरस्‍कार (51 हजार रूपये)।

क्‍या साहित्‍य अकादेमी की यह पहल स्‍वागत योग्‍य नहीं ?


एक दैनिक का मातृभाषा के नाम समर्पण

राजस्‍थान के जयपुर शहर से निकलने वाला दैनिक अख़बार 'डेली न्‍यूज़' रविवार को 'हम लोग' नाम से परिशिष्‍ट निकालता है।
गत रविवार अर्थात् 21 फरवरी को अख़बार ने मातृभाषा दिवस को परिशिष्‍ट समर्पित किया। अख़बार का यह प्रयास सराहनीय है। खासकर धन्‍यवाद के पात्र है अख़बार से जुड़े राजस्‍थान की युवा साहित्यिक टीम के साथी डॉ. दुष्‍यत, डॉ. दिनेश चारण, डॉ. मदनगोपाल लढ़ा आदि।
इसी परिशिष्‍ट में मेरी राजस्‍थानी कहानी 'विश्‍वास' का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया।
अख़बार की संपादकीय टीम का आभार।
'हम लोग' 21 फरवरी अंक निमित्‍त बेहतर होता एक-दो रचनाएं मातृभाषा में ही होती। खैर------।
प्रयास स्‍तुत्‍य।
आपको भी लायक लगे तो दाद जरूर दें।

Monday, February 22, 2010

साहित्यिक मेला








अंतरराष्‍ट्रीय मातृ भाषा दिवस 21 फरवरी (2010) के दिन राजस्‍थान के फतेहपुर-शेखावाटी में राजस्‍थानी भाषा के साहित्‍यकारों का एक मेला भरा। अवसर था- धानुका सेवा ट्रस्‍ट, फतेहपुर-शेखावाटी द्वारा पुरस्‍कार वितरण समारोह।

ट्रस्‍ट के मुख्‍य ट्रस्‍टी और व्‍यवसायी, साहित्‍यप्रेमी श्री नरेन्‍द्रकुमार धानुका कोलकाता रहते हैं और प्रतिवर्ष अपनी जन्‍मभूमि फतेहपुरशेखावाटी में ऐसे मेले का आयोजन करते हैं। हरेक वर्ष फतेहपुर की भूमि पर अनेक साहित्‍यकार-साहित्‍यानुरागी जुटते हैं।

समारोह में राजस्‍थानी भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी बीकानेर के पूर्व अध्‍यक्ष श्री सीताराम महर्षि, पूर्व उपाध्‍यक्ष श्री हनुमान दीक्षित, साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली के राजस्‍थानी भाषा परामर्श मंडल संयोजक डॉ. चंद्रप्रकाश देवल, साहित्‍यकार एवं राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी प्रचार समिति के श्री श्‍याम महर्षि, आचार्य तुलसी शोध संस्‍थान बीकानेर के डॉ. किरण नाहटा, राजस्‍थानी भाषा के समृद्ध रचनाकार श्री बैजनाथ पंवार, डॉ. गोरधनसिंह शेखावत, डॉ. मदन सैनी इस समारोह में मंचासीन हुए।

सहभागी रूप में साहित्‍यकार श्री भंवरसिंह सामौर, डॉ. उदयवीर शर्मा, श्रीभगवान सैनी, रवि पुरोहित, शंकर झकनाडि़या, केसरीकांत केसरी, सत्‍यनारायण इंदौरिया, प्रमोद कुमार शर्मा, डॉ. चेतन स्‍वामी, देवकरण जोशी दीपक, किशोर निर्वाण, विश्‍वनाथ भाटी, डॉ. महावीर पंवार, उम्‍मेद धानियां, डॉ. रामकुमार घोटड़, कुमारअजय, उम्मेद गोठवाल‍, डॉ. महेन्‍द्रसिंह मील, शिशुपालसिंह नारसरा, शंभु खेड़वाल सहित अनेक साहित्‍यकारों का समागम हुआ।
एक रूप में यह साहित्यिक मेला ही रहा।

समारोह में श्री बैजनाथ पंवार को मानुष-तनु सम्‍मान, डॉ. गोरधनसिंह शेखावत को श्री सरस्‍वती सेवा पुरस्‍कार-2008, डॉ. मदन सैनी को श्री सरस्‍वती सेवा पुरस्‍कार-2009 व दुलाराम सहारण को बसंतीदेवी धानुका युवा साहित्‍यकार पुरस्‍कार-2009 प्रदत्‍त किया गया।

समारोह में डॉ. रामकुमार घोटड़ की पुस्‍तक 'देश-विदेश की लघुकथाएं' व श्री शिशुपालसिंह नारसरा संपादित एकांकी संग्रह का विमोचन भी किया गया।

ढेरों स्‍मृतियों लिए यह आयोजन चिर स्‍मरणीय रहेगा।

Saturday, February 20, 2010

एक अध्‍याय का अंत होना

(फोटो : विधायक श्री जयदेवप्रसाद इंदौरिया, दुलाराम सहारण(मैं), विधायक श्री चंदनमल बैद, 1997)

अभी-अभी समाचार मिला कि राजस्‍थान के वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता श्री चंदनमलजी बैद नहीं रहे।

यह ख़बर हालांकि सर्व स्‍वरूपा दु:खद नहीं है क्‍योंकि श्री बैद 88 वर्षीय थे और पिछले कुछ समय से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। लेकिन मेरे जैसे अनेक लोगों के लिए यह दु:खद समाचार है क्‍योंकि हमने अपने क्षेत्र का एक पूर्व विधायक खोया है। जी, चंदनमलजी बैद मेरे क्षेत्र तारानगर के विधायक रहे और राज्‍य के वित्‍त मंत्रालय सहित अनेक मंत्रालयों को संभाला।

पिता श्रीजयचंद बैद के यहां सरदारशहर (चूरू) में जन्में श्री चंदनमलजी बैद राजस्थान विधानसभा में 8 बार पहुंचे। सन् 1952, 1957, 1962, 1972, 1980, 1990, 1993 एवं 1998 के चुनावों में वे विजयी होकर विधानसभा पहुंचे। श्री बैद ने 1980 में चूरू लोकसभा का कांग्रेस पार्टी से चुनाव भी लड़ा और कुल 120490 मत प्राप् किए।
सरदारशहर तारानगर विधानसभा क्षेत्र का संयुक् क्षेत्र सन् 1977 तक एक ही था तथा सरदारशहर विधानसभा के नाम से जाना जाता था। सन् 1977 में तारानगर विधानसभा क्षेत्र पृथक रूप से अस्तित् में आया।
1952 के प्रथम आम चुनाव से लेकर 1972 तक लगातार सरदारशहर विधानसभा का प्रतिनिधित्‍व श्री बैद ने किया। सन् 1977 में वे सरदारशहर विधानसभा से विजयी न हो सके, इसका मोटा कारण तारानगर क्षेत्र का अलग होना रहा। श्री बैद 1980 के चुनाव में सरदारशहर छोड़कर तारानगर आए और यहीं के होकर रहे। उन्‍होंने अपना अंतिम चुनाव 1998 का‍ विधानसभा चुनाव तारानगर से लड़ा और विजयी रहे। 1998 में राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री श्री अशोक गहलोत बने और श्री बैद राजस्‍थान के वित मंत्री।
2003 में हुए विधानसभा चुनाव में तारानगर विधानसभा का नेतृत्‍व श्री चंदनमल बैद के पुत्र और पेशे से चिकित्‍सक रहे डॉ. चंद्रशेखर बैद ने किया।

श्री चंदनमल बैद राजस्‍थान के उच्‍च शिक्षा मंत्री, नहर मंत्री भी रहे। तारानगर क्षेत्र के पीने के पानी और सिंचाई के पानी के लिए वे आजीवन संघर्षरत रहे और कुछ हद तक कामयाब भी रहे।

मुझे जहां तक याद है मेरे छोटे से गांव में पीने का मीठा पानी उपलब्‍ध था (मतलब मेरे बाल्‍यकाल में ही मेरे गांव में पीने पानी आ गया था और वह भी मीठा) जबकि इस क्षेत्र के बहुत से गांव आज भी पीने के पानी की समस्‍या से जूझ रहे हैं। यह श्रेय श्री चंदनमलजी को ही है।

स्‍वर्गीय श्री बैद की राजनीतिक खूबी जो क्षेत्र में सदैव याद की जाती रहेगी वह यह है कि उन्‍होंने कभी थाना-पुलिस की राजनीति नहीं की और न ही बदले की भावना से काम किया।

उनके विकास कार्यों की एक लम्‍बी फेहरिस्‍त है, जिसमें मेरे गांव का उच्‍च प्राथमिक विद्यालय ( जो अब माध्‍यमिक स्‍तर का हो चुका है) जिसमें मैंने ककहरा सीखा, सर्वोपरि है।

श्री बैद से मेरा संपर्क रहा है और छात्र राजनीति के दौरान सान्निध्‍य भी मिला है। इसे घनिष्‍ठता तो नहीं कह सकते लेकिन साहचर्य जरूर कह सकते हैं। उनकी खूबी के रूप में मुझे जो तथ्‍य दिखाई दिया वह यह कि उन्‍होंने कभी झूठा वादा नहीं किया। काम नहीं करवाना है तो उन्‍होंने साफ कह दिया कि यह नहीं होगा। अगर उन्‍होंने हां भरी है तो मतलब काम तय है। देखेंगे, करेंगे, हो जाएगा आदि जुमले उनके स्‍वभाव में नहीं थे, और आज की राजनीति में यही सब चल रहा है।
ऐसे राजनीतिक दौर में उनका जाना मेरी दृष्टि में एक अध्‍याय का अंत होना है।
विनम्र श्रद्धांजलि।

कभी आपका ऐसी जगह से वास्‍ता पड़ा है ?

इन दृश्‍यों को आप ध्‍यान से देखिए। मुझे आज सुबह-सुबह इन सबसे रू-ब-रू होने का अवसर मिला।


आप सोच रहे हैं कि इन में ऐसी क्‍या खास बात है ? आम गृहस्‍थ के यहां ऐसे दृश्‍य मौजूद रहते हैं, यही ना।
जी हां, यह सही है कि इस आर्थिक युग की आपाधापी के बीच आम गृहस्‍थ ऐसे ही दृश्‍य अपने इर्द-गिर्द संजो पाता है। टूटी छप्‍परिया, लकड़ी-लकड़ी जोड़कर जलता हुआ चूल्‍हा और टूटने के कगार पर आने के बाद भी करीने से सजाई गई कुर्सी, यही तो सब कुछ है इन चित्रों में।

आज सुबह-सुबह चूरू जिला मुख्‍यालय पर 'नया बास' नाम से स्‍थापित कॉलोनी में मेरा जाना हुआ। प्रसंग भले ही कुछ रहा हो पर इन दृश्‍यों को देखकर मन गर्व से भर उठा और मेरा कैमरा इनको कैद करने के लिए आतुर हो उठा। क्‍योंकि यही वह पहलू है जहां से मैं बात शुरू कर सकता हूं।

मेरी दिन की शुरूआत स्‍थानीय अख़बार पढ़ने से होती है। या यूं कहूं कि प्रात:काल में ढेरों अपराध और छापों की कार्रवाई के ‍तथ्‍य-संग्रहण-पुलिंदे बांचने की प्रक्रिया से गुजरता हुआ स्‍वयं को तरोताजा करता हूं। आम भारतीय मानस शायद स्‍वयं को इसी ढंग से तरोताजा करता होगा। अपने इर्द-गिर्द होने वाले इस ढंग के व्‍यापार के बीच स्‍वयं को तोलता होगा और अपने रास्‍ते बनाने का संकल्‍प लेता होगा।
मेरे इस छोटे से शहर में भी मेरी भांति लोग सोचते होंगे, शायद।
आज के ही अख़बार में मेरे इस छोटे से शहर की ख़बर है कि वाणिज्‍य कर विभाग की कार्रवाई में एक सेनेटरी व टाइल्‍स की फर्म से पौने दो लाख का जुर्माना वसूला गया है। इस ढंग की और भी ख़बरें इस शहर से आए दिन आती रहती हैं। इन ख़बरों का यहा जिक्र करना वाजि़ब है, क्‍योंकि इन ख़बरों के पीछे एक शाश्‍वत सत्‍य मौजूद है और वह सत्‍य है राजनीतिक संरक्षण।
इस उजले युग में उजली माया के मोहपाश में हर कोई बंधा है। माया-मोहपाश के अलावा कोई दूसरा पाश उसे बांध न सके इसी वजह से हरेक राजनीति रूपी हथियार को अपने इर्द-गिर्द रखता है। और बटोरता चलता है वह सबकुछ जो शायद अंतिम छोर पर बैठे उस आम आदमी का हिस्‍सा है, जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
मैं भी चूंकि इस राजनीति का छोटा-सा भाग रहा हूं अतएव आए दिन 'कुछ लाभ उठाओं' जैसी सलाह का सामना करता रहता हूं। मैं समझ नहीं पाता हूं कि क्‍या यह सलाह शाश्‍वत सत्‍य है। मैं कभी-कभी स्‍वयं को कमजोर भी महसूस करने लगता हूं कि सब कह रहें हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे इसका मतलब हम पीछे हैं।
लेकिन जो संदर्भ मैंने आज सुबह-सुबह पकड़ा उसमें बड़ी शक्ति है।
यह प्रलाप बीच में ही छोड़कर उसी संदर्भ पर आते हैं-

ज़नाब, आपने उक्‍त छायाचित्रों को भली-भांति निहार लिया होगा। अगर नहीं तो संदर्भ बता दूं उससे पहले एक बार फिर से निहार लें।

जी, ये दृश्‍य मेरे जिला चूरू के एक प्रखर और धुरंधर राजनेता के घर के हैं। यह राजनेता 5 बार विधायक और एक बार जिला प्रमुख रह चुका है।
चौंकिए मत, यथार्थ पर आइए।

यह प्रखर राजनेता आज अपनी 80 वर्ष की वय में आम गृहस्‍थ की भांति जीवन को बड़ी ही गरिमा से जी रहा है। संसाधनों का अभाव भले ही हो परंतु चेहरे का ओज और मन का तेज आलोकित है और इनके कारण संसाधनों की आभा फीकी-सी लगती है।

एक बार विधायक बनने के बाद भारतीय लोकतंत्र इस कदर मेहरबान हो जाता है कि न्‍यारे-व्‍यारे ही बदल जाते हैं। आर्थिक पैमाने शिखर मापने लगते हैं। अगर यह सुनहरा अवसर 5 बार मिल जाए तो फिर चाहिए ही क्‍या, दुनिया के हर कोने में बंगले मिलना अनिवार्य हो जाता है।

लेकिन ईमान ?

भला वे राजनेता ऐसा थोड़े ही कह सकते हैं - ''इस प्रकार मैं सन् 1967 में तीसरी बार विधानसभा का सदस्‍य बना ----- सन् 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस बहुमत में नहीं आ सकी अत: सरकार बनाने में बड़ी परेशानी हुई-------विधानसभा को कुछ समय के लिए सस्‍पेंड कर दिया गया ------- बाद में सुखाडि़या जी के नेतृत्‍व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ- फिर भी स्थिति डांवाडोल थी सो कुछ विधायकों को शामिल करने के प्रयास किये जा रहे थे।
सुखाडि़या का संदेश-
मेरे पास भी सुखाडि़या जी का संदेश लेकर श्री फूलचंद जैन - जो सुजानगढ़ से चुनाव हार गये थे एवं श्री मनफूलसिंह भादू विधायक सूरतगढ़ आये और कहा कि सुखाडि़या जी चाहते हैं कि मैं उनके मंत्रीमंडल में शामिल हो जाऊं अत: मैं यह प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लूं - मंत्री बनने से इलाके में अच्‍छा विकास कर सकोगे।
मेरे सामने यह परीक्षा की घड़ी थी एक तरफ राजस्‍थान में पांच साल मंत्री बनना और दूसरी तरफ जनता ने जिस भावना से वोट दिये थे, उनकी भावना की रक्षा करना - सो मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि जनता की भावना की कद्र करूंगा और पांच साल विपक्ष में बैठकर ही जन सेवा करता रहूंगा - अत: मैंने उक्‍त महानुभावों को मंत्री बनने के लिए ना कर दिया ------- ''

यह शख्‍स चूरू विधानसभा से 1957 में प्रथम बार विधायक बना। जिला परिषद्, चूरू का प्रथम जिला प्रमुख बना। सन् 1962 राजगढ़ से विधायक बना। सन् 1967 में छापर से विधायक बना। सन् 1972 में पुन: छापर से विधायक बना। सन् 1977 में सुजानगढ़ से विधायक बना।

अपने ईमान से कभी नहीं डिगा और पैसे के लिए राजनीति से घृणा की। ईमानदारी से जीवन यापन और मतदाताओं के प्रति ईमानदारी पूर्वक व्‍यवहार।

चिंतन और क्रिया में कोई अंतर नहीं।

क्‍या आपको इस शख्‍स श्री रावतराम आर्य पर गर्व नहीं होता ?

Tuesday, February 16, 2010

माय नेम इज़ ख़ान

त्‍वरित टिप्‍पणी
किसी मित्र का संदेश मिला कि फिल्‍म 'माय नेम इज़ ख़ान' बेहतर फिल्‍म है, आप देखना न भूलें। अकसर मैं फिल्‍मों से दूर रहने वाला इंसान हूं, फिल्‍मी की नाटकीयता मुझे कम ही पचती है। यथार्थ फिल्‍मों का युग नहीं रहा और कलात्‍मक फिल्‍मों की संख्‍या बहुत कम हो गई, इस बीच नई तकनीक और नए ट्रेंड (देह दर्शन) के बीच असहज होना स्‍वाभाविक है।
आमिर ख़ान की गत वर्षों की सक्रियता मुझे जरूर भाति है, यही वजह है कि 'ग़ज़नी' के बाद सिनेमा हॉल जाना ही नहीं हुआ। चूंकि असरदार मित्र के इतने ठोस वक्‍तव्‍य के कारण मैं प्रभावित हुए बिना न रह सका।
स्‍थानीय श्‍याम छविगृह में फिल्‍म 'माय नेम इज़ ख़ान' ही लगी हुई है।




फटाफट कॉलेज के दिनों के सहपाठी-समीक्षक तथा नवचयनित आर..एस. भाई उम्मेद गोठवाल को याद करता हूं। गोठवाल स्थानीय राजकीय लोहिया कॉलेज में व्याख्याता के रूप में हिंदी पढ़ा रहा होता है। मेरा प्रस्ताव उसे कुछ अटपटा लगता है। मैं दृढ़ निश्चय प्रकट करता हूं तो कार्यक्रम बन ही जाता है। साथी हरिसिंह भी फिर साथ होना ही होता है।
मध्‍यांतर तक हम मौन रहते हुए फिल्‍म को देखते जाते हैं परंतु, मध्‍यांतर बोलने को विवश करता है और श्रेष्‍ठ नहीं का संवाद कायम होता है। लेकिन अंतिम राय बनना अभी असंभव था, क्‍योंकि अभी आधा सफ़र ही तय हुआ था।
शेष सफ़र भी तय होता है और एक शब्‍द में कहूं तो हमें फिल्‍म से 'निराशा' ही होती है। आम दर्शक वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करने वाला साथी हरिसिंह तो फिल्‍म देखने के निर्णय को ही बचकाना करार दे देता है और घोषित कर देता है कि महज तीन घंटें की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं। उसे यह भी मलाल रहता है कि फिल्‍म में निर्माता ने बड़ी ही सावधानी से सहभागी के रूप में ढेर सारे लोगों को जोड़कर अपनी लागत का कुछ हिस्‍सा बटौर लिया और शेष राशि का तगादा हमसे करता चलेगा।
समीक्षक बंधु कुछ संजीदा होते हैं, विषय की नब्‍ज टटोलते हैं और संयमित शब्‍दों में नामवर बनते हुए घोषित करते हैं कि विषय के साथ तो न्‍याय किया गया है लेकिन विषय अनावश्‍यक है। अमेरिका की 9/11 की घटना से अनेक प्रभावित हुए, इस प्रभाव का एक पक्षीय बयान और वह भी फिल्‍मीकरण क्‍या संदेश संप्रेषित करेगा।
मैं भी उनकी इस बात से सहमत होता हूं। मैं मानता हूं कि मज़हब और जातीय विद्वेष एक मानसिक विकृति है और यह प्रगति में सदैव बाधक रही है। परंतु, उसे ऐसे ढंग से उठाकर समाज और खासकर भारतीय हिन्‍दी दर्शकों के मानस पटल पर क्‍या संदेश छोड़ना चाहते हैं निर्माता-निर्देशक।
धार्मिक आडम्‍बरों के बीच फिल्‍मीस्‍तान भी आडम्‍बरयुक्‍त हो चला है और भारतीय समुदायों की भावना को भुनाकर पैसे बटोरना उसने आसानी से सीख लिया है। मैं करण जौहर को इस कला का सिरमौर घोषित कर दूं तो शायद मेरे तीन घंटें की सार्थकता सिद्ध हो जाएगी।
कथा का ताना-बाना और संरचना कहीं से फिल्‍म को चलने वाली घोषित नहीं करते। यह दीगर बात है कि इसमें शाहरूख ख़ान ने पात्र का किरदार बड़ी ही मेहनत से निभाया है और अपने अभिनय कौशल में श्रीवृद्धि करते हुए दाद बटोरी है। काजोल का अभिनय भी दमदार है। अवस्‍था का आभास पूरी फिल्‍म में काजोल पर कहीं हावी नहीं होता। शाहरूख की हकलाहट ने इस फिल्‍म में भी पीछा नहीं छोड़ा। गीत-संगीत से कमजोर इस फिल्‍म को देखने के बाद '3 इडियट्स' देखने की लेटलतीफी भी और बढ गई।
क्‍या वाकई आपको मेरे जैसा अनुभव नहीं होता ?
मुझे तो फिल्‍म देखकर सिनेमा हॉल से निकलने के ठीक 3 घंटें बाद ऐसा ही महसूस होता है।