Wednesday, March 31, 2010

साहित्‍यकार रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली से पहली और आखरी मुलाकात

राजस्‍थानी साहित्‍य की अकूत क्षमता को हम बड़े गर्व से बखान करते हैं। प्राचीन एवं मध्‍यकाल की स्‍वर्णिम आभा के बीच हम वर्तमान युग का जब गौरव गान कर रहे होते हैं तो राजस्‍थानी कहानी की समृद्ध परंपरा के बीच श्री रामेश्‍वरदयाल श्रीमाल़ी का नाम अपने-आप ही आ जाता है।
रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली राजस्‍थानी के उन कहानीकारों में शामिल हैं जिन्‍होंने राजस्‍थानी की समकालीन कहानी को विश्‍व कहानी के समक्ष ले जाने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। उनकी कहानियों की अपनी छाप एवं छवि है, जो राजस्‍थानी साहित्‍य कभी विस्‍मृत नहीं कर सकेगा।
यही नहीं श्रीमालीजी ने एक अच्‍छे कवि एवं शायर के रूप में भी पहचान बनाई।

आज सुबह राजस्‍थान पत्रिका में सांसद किरोड़ीमल मीणा और कर्नल किरोड़ीसिंह बैंसला की राजनीतिक खबरों को पार करते हुए आगे बढ़ता हूं तो पृष्‍ठ 15 पर एक

Monday, March 22, 2010

मिनखां री माया

आप बूझ्यो,
जे मिनख
इण भौम माथै नीं हुवै
तो
कांई फरक पड़ै ?

ठा नीं थानै सुण्यो कै नीं सुण्यो
म्हैं साफ कैयो है कै

फरक क्यूं नी पड़ै , पड़ै सा
मिनख नीं होंवतो तो
कठै सूं होंवता नित नुंवा प्रयोग
आभै नै नापण री सगति
चांद माथै घर बसावण री ताकत
पांणी नै भेदण री छिमता

अर सो-कीं इज क्यूं
कठै होंवती
मिनख नै जीवावण जोग चिकित्सा पद्धति
नाक-कान-होंठ सो'वणा करण री सर्जरी
कोख मांय पळता टाबरां नै पिछाणण री दीठ
अर कठै होंवतो
दुवाइयां रो लाम्बो-चौड़ो कारबार
सड़कां रो जाळ, गाड्यां री भीड़

आप मानो चायै नीं मानो
भौम माथै
मिनख होवणो सो-कीं होवणो है
क्यूं कै
मिनख नीं होंवतो तो कठै हो नाज
कठै ही पकावण री कळा
अर कठै ही मिट्ठै भोगां री
एक लाम्बी पंगत


आप भासाई हिमायती हो
छिणेक सोचो
मिनख नीं होंवता तो
कठै होंवती थारी भासा
कठै होंवती मानता री बात
अर
कुण उठावंतो आठवीं अनुसूची मांय जोड़ण रो मुद्दो

इज नीं मानो तो
इबकै आपनै हामळ भरणी पड़सी
क्यूं कै आप लोकतंत्र रा हिमायती हो
जद लोक नीं होंवतो तो
तंत्र कठै बणतो

इण खातर म्हारो तो मानणो है कै
मिनख नीं होंवतो तो
कीं नीं हुंवतो

म्हारै आपरै विचारां कारण
कीं फरक नीं पड़ै
क्यूं कै म्हैं जाणूं कै आप कैवणो चावो हो
कै

जे मिनख नीं हुंवतो तो
जंगळां री हुंवती कटाई
जिनावरां रो होंवतो ब्यौपार
अर पांणी रै होंवतै खात्मै
जेड़ा अलेखूं संकट
आज जाबक ई नीं होंवता

विश्‍व जल दिवस, 22 मार्च

Saturday, March 20, 2010

यह क्‍या हो रहा है ?

राजस्‍थान विधानसभा का बजट सत्र हंगामें के भेंट चढ़ रहा है। नुमाइंदें बेबुनियादी बहस में उलझ रहे हैं। आरोप-प्रत्‍यारोप का दौर चल पड़ा है। मूल मुद्दे इन सबके बीच कहीं गुम हो गए हैं और बजट की अनुदान मांगें बिना बहस के एक-एक करके पारित होती जा रही हैं। वहीं विपक्ष संगठित होने का दावा करता विधानसभा में अनशन पर बैठा है और मिडिया को नित नए बयान सौंप रहा है।
यह सब क्‍या हो रहा है ?

बात गत बुधवार अर्थात् 17 मार्च से शुरू हुई। विधानसभा सदस्‍य श्री हनुमान बेनिवाल (खींवसर-नागौर, 94141-18677) शून्‍यकाल में स्‍थगन प्रस्‍ताव पर शराब तस्‍करों की बात उठाते हुए सरकार द्वारा उन्‍हें प्रोत्‍साहन देने का आरोप लगाते हुए कहा कि शराब ठेकेदारों के 55 करोड़ रूपये माफ कर दिए गए। और तो और उत्‍तेजित अवस्‍था में बात रखते हुए अलोकतांत्रिक तरीके से सरकार पर भ्रष्‍टाचार का तमगा भी लगा दिया। असंसदीय भाषा का इस्‍तेमाल हुआ और वैल में आकर जमकर हंगामा किया गया। सत्‍ता पक्ष के सदस्‍यों ने श्री बेनिवाल को सदन से बाहर करने की मांग करने लगे। परिणाम स्‍वरूप शाम 4 बजे के लगभग विधानसभा में ध्‍वनि मत से सत्र के शेष अवधि तक के लिए श्री हनुमान बेनिवाल का निलम्‍बन हुआ।
विपक्ष ने इस पर आक्रामक मूड रखा।
श्री हनुमान बेनिवाल के कृत्‍य पर अगले दिन राजस्‍थान के प्रमुख दैनिक राजस्‍थान पत्रिका के संपादकीय में जो लिखा गया वह यहां ज्‍यों का त्‍यों दिया जा रहा है, अब आप ही अंदाजा लगा लिजिएगा-
''--- राजस्‍थान विधानसभा में बुधवार को जो हआ, वह प्रदेश की जनता को शर्मसार करने के लिए पर्याप्‍त है। भाजपा विधायक हनुमान बेनिवाल का बिना किसी आधार सदन में भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाना और तैश में आकर संसदीय मंत्री की सीट तक जा पहुंचना किस संसदीय परम्‍परा का निर्वहन माना जा सकता है ? क्‍या यह उन लाखों मतदाताओं का अपमान नहीं है, जो जनप्रतिनिधियों को अपनी आवाज बनाकर विधानसभा में भेजते हैं। भ्रष्‍टाचार हो रहा है तो उसे रोकना जनप्रतिनिधियों का काम हो सकता है, विधानसभा में भी मामला उठना चाहिए लेकिन निमय-कायदों के तहत। संसदीय नियमों के तहत मामला उठेगा तो उस पर चर्चा भी होगी और आरोपों के किसी अंजाम तक पहुंचने की उम्‍मीद भी की जा सकती है। लेकिन सिर्फ हंगामा खड़ा करने के लिए आरोप लगाने से क्‍या हासिल होने वाला है ? अखबारों और समाचार चैनलों की सुर्खियां बनना ही अगर मकसद हो, तो ऐसे सदस्‍यों का सदन में क्‍या काम ?
बेवजह हंगामा करने वाले सदस्‍यों को अगर सदन से निलम्बित किया जाता है, तो इसका स्‍वागत करना चाहिए न कि विरोध। भाजपा नेता यदि बेनिवाल के आचरण को गलत मानते हैं, तो उनके निलम्‍बन का विरोध क्‍यों कर रहे हैं ? यह दोमुंहा आचरण क्‍यों ? पक्ष के साथ-साथ विपक्ष को भी यह ध्‍यान रखना होगा कि नियम और कानून से ऊपर कोई नहीं है। सदन की गरिमा पर अगर कोई आंच आती है तो इसकी रक्षा के लिए सम्‍पूर्ण सदन को एकजुटता दिखानी ही होगी। विधानसभा की राजनीति और विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ की राजनीति को एक तराजू पर रखकर नहीं तोला जा सकता। विधायकों को अपने अधिकार के साथ दायित्‍वों को भी समझना होगा।''
सनद रहे कि श्री हनुमान बेनिवाल राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर के छात्रसंघ अध्‍यक्ष रहे हैं। यह राजस्‍थान के छात्र नेताओं का सौभाग्‍य ही है कि वक्‍त-वक्‍त पर जनता ने उनका साथ दिया है। यह इसी से सिद्ध हो जाता है कि वर्तमान में श्री राजेन्‍द्र राठौड़ (98292-48999), कालीचरण सर्राफ (93140-43888), राजकुमार शर्मा(94133-49994), महेन्‍द्र चौधरी (94140-70312) आदि विधायक है और ये सभी राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ के अध्‍यक्ष रहे हैं। इन सबके अलावा भी छात्र राजनीति से आए कई और विधायक भी राजस्‍थान की वर्तमान 13वीं विधानसभा में सदस्‍य हैं।

श्री हनुमान बेनिवाल के निलम्‍बन के विरोध में पूरा विपक्ष खड़ा होता है और संसदीय कार्यमंत्री श्री शांति धारीवाल के खिलाफ नियम 119 के तहत निंदा प्रस्‍ताव लाता है।
जलदाय मंत्री, राजस्‍थान सरकार श्री महिपाल मदेरणा (94141-34600) दूसरे दिन जब अनुदान मांगों पर चर्चा का प्रस्‍ताव रख रहे थे तो विपक्ष के विधानसभा सचेतक श्री राजेन्‍द्र राठौड़ ने वही सब किया जो उनको नहीं करना चाहिए था।
श्री राठौड़ के खिलाफ जलदाय मंत्री को बोलने से रोकने के प्रयास को आधार बनाकर सत्‍ता पक्ष निलम्‍बन प्रस्‍ताव लाया और उन्‍हें एक साल के लिए विधानसभा से निलम्बित कर दिया गया।
गतिरोध फिलहाल भी जारी है।

राजस्‍थान में हो रहा यह घटनाक्रम हमें क्‍या संकेत दे रहा है ? हम और हमारे जनप्रतिनिधि किस ओर जा रहे हैं?

राजस्‍थान पत्रिका के उसी संपादकीय के हवाले से बात को समाप्‍त करता हूं- ''आज निलम्‍बन और कल निलम्‍बन वापस लेने से सदन में ऐसे 'हादसों' को बढ़ावा मिलेगा।''
फिर क्‍या विकल्‍प हो सकता है ?


Wednesday, March 10, 2010

मन के सुकुन के लिए काम करता चित्रकार

इस पुस्‍तक के आवरण चित्र की तरह लगभग एक हजार पुस्‍तकों के आवरण राजस्‍थान के इस सपूत ने तैयार किए है। कूची की करामात लिए ज्‍यादा और तकनीक के सहयोग से कम। यही नहीं अब तक अनेक चित्र प्रदर्शनियों के माध्‍यम से सराहना पा चुकी यह प्रतिभा निरंतर उसी गति से गतिमान है। न कोई अभिमान और न दंभ।
यह प्रतिभा ‍ 'रामकिशन अडिग' के नाम से जानी-पहचानी जाती है।


राजस्‍थानी साहित्‍यकारों में लोकप्रिय चित्रकार अडिग चूरू जिले की राजगढ़ तहसील के नरवासी गांव के निवासी हैं तथा वर्तमान में नवोदय विद्यालय, पल्‍लू (नोहर) हनुमानगढ़ में सरकार को सेवाएं दे रहे हैं।

श्री अडिग की चित्र प्रदर्शनी 'सीन-अनसीन' ने काफी दाद पाई थी। श्री अडिग द्वारा निर्मित 'पुस्‍तक पर्व-2009' शुभंकर भी काफी प्रशंसा पा चुका है। श्री अडिग की सद्य प्रदर्शित चित्र-प्रदर्शनी 'मोहतरमा' काफी चर्चित एवं उल्‍लेखनीय रही है। इस प्रदर्शनी में श्री अडिग के नारी के इर्द-गिर्द संयोजित कुल 21 चित्रों (5 पेंटिग और 16 पेंसिल वर्क) ने सभी का मन मोहा है।



यही नहीं श्री अडिग ने रंगों की आभा को एक अलग अंदाज में भी पेश किया है-



ऐसे चित्रकार का मानना है कि कला की साधना के क्रम में मन को सुकून मिलता है और बस यह हो जाता है। साहित्‍य, सिनेमा और कला की अनन्‍य विधाएं अडिग का मन मोहती हैं तभी तो डॉ. दुष्‍यंत ऐसे चित्रकार का परिचय कुछ यूं देते हैं- ''अडिग एक विचित्र जीव हैं। कभी वैश्विक सिनेमा के घोर दर्शक क़भी भारतीय शास्त्रीय और अल्पज्ञात विदेशी संगीत के गुणी रसिक। बिरले गंभीर साहित्य पाठक और सबसे पहले तथा आखिरकार एक सजग और विशिष्ट चित्रकार। इस विचित्र से जीव का कलाकर्म अपने समय के साथ आंख मिलाने के पागलपन में रचा हुआ है।''

खास : प्रयास संस्थान, चूरू‍ की ओर सूचना केंद्र, चूरू में (अप्रेल-2010) श्री रामकिशन अडिग की चित्र प्रदर्शनी प्रस्‍तावित है। श्री अडिग के खुद के ही जिले में यह प्रथम प्रदर्शनी होगी जिसकी खबर हम सभी को खुशी देने वाली है।

Tuesday, March 9, 2010

साहित्‍य प्रेमियों को निराशा हुई है

राजस्‍थान के वित मंत्री श्री अशोक गहलोत ने राज्‍य का सालाना बजट (2010-11) आज राज्‍य विधानसभा में प्रस्‍तुत किया। चूंकि श्री अशोक गहलोत राज्‍य के मुख्‍यमंत्री भी हैं अतएव यह बजट काफी मायने रखता है।
बजट में नई सौर ऊर्जा नीति लागू करने की कवायद, जल नीति को गंभीरता से लेने का संकल्‍प, नि:शक्‍त जन नीति‍ बनाई जाने की पहल है। वहीं खाद्य, नागरिक एवं आपूर्ति निगम की स्‍थापना के साथ ही हरेक माह की 15 से 21 तारीख तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन वितरण और उस वक्‍त एक सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी, निस्‍संदेह एक संतोषजनक पहल है। निगम हेतु 50 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
वहीं 21 लाख किसानों के लिए 5 हजार करोड़ के ऋण की घोषणा किसानों के लिए कुछ सुखद है। अल्‍पसंख्‍यकों के लिए खासकर मदरसों में 1000 शिक्षा सहयोगी व संविदा पर कम्‍प्‍यूटरकर्मी लगाये जाने की घोषणा की गई है वहीं नगरीय विकास विभाग की तरफ से दस्‍तकार योजना अमल में लाने का अमलीजामा पहनाया गया है, जोकि स्‍वागत योग्‍य है। वक्‍फ बोर्ड के लिए 50 लाख राशि का प्रावधान भी किया गया है।
ऊर्जा क्षेत्र में विस्‍तार के संकल्‍प के साथ कुल बजट का 52 प्रतिशत समर्पण सरकार की प्राथमिकता दर्शाता है। वहीं सामाजिक कल्‍याण के लिए ज्‍यादा लोकलुभावने वादे न करना सरकार की दृष्टि का रूपाकंन भी।
जोधपुर सहित दो मानसिक विमंदितों के लिए आवासीय चिकित्‍सालय खोलने की घोषणा जरूरी कदम है।
वृद्धावस्‍था पेंशन आयवर्ग के अनुसार समुचित बढाना एवं स्‍वतंत्रता सेनानियों की पेंशन 8 हजार से 10 रूपये मासिक करना संबल है। मुख्‍यमंत्री चिकित्‍सा कोष में बीपीएल चिकित्‍सा सेवा का दायरा विधवा, विकलांग एवं वृद्ध जनों तक विस्‍तृत करना, वास्‍तव में स्‍वागत योग्‍य है। वहीं विकलांगों के लिए राजस्‍थान राज्‍य पथ परिवहन निगम की बसों में मुफ्त यात्रा का तोहफा सभी को प्रभावित कर गया। बीपीएल को 1 मई से 2 रूपये प्रतिकिलो की दर से 170 करोड़ वाली गेहूं योजना लोकलुभावनी कही जा सकती है।
2300 कांस्‍टबेल, 1000 अंग्रेजी स्‍कूल व्‍याख्‍याता की भर्ती की घोषणा स्‍वागत योग्‍य है, लेकिन यह संख्‍यात्‍मक दृष्टि से कम महसूस होती है।
एनसीआरटी की तर्ज पर राजस्‍थान के इतिहास एवं ज्ञान को समावेशित करते हुए कक्षा 9 से 12 तक का पाठ्यक्रम लागू करने का संकल्‍प, शिक्षा पद्धति में आमूलचूल बदलाव का संकेत है।
मूल निवास, जाति प्रमाण पत्र आदि पर लगने वाली स्‍टाम्‍प डयूटी पूर्णतया हटाने की घोषणा खासकर विद्यार्थियों के लिए लाभकारी है। वहीं शहरी क्षेत्रों में 100 यूनिट से ज्‍यादा बिजली पर 10 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्‍त लागू कर उसे शहरी निकायों को देना एकभांति उपभोक्‍ताओं के लिए कष्‍टदायक है।

वहीं साहित्‍य के लिए कुछ घोषणा न होना भी कष्‍टदायक है, कला एवं संस्‍कृति के क्षेत्र हेतु 1 करोड़ रूपये अतिरिक्‍त देना जरूर स्‍वागत योग्‍य है लेकिन यह राशि पर्याप्‍त नहीं है और समुचित बढोतरी नहीं मानी जा सकती।
कुछ लोगों द्वारा सभी अकादमियों पर एक नियंत्रणकारी संस्‍था बनाकर निदेशक बनाने के प्रयास का पटाक्षेप हो जाना सुखद है। बजट में इस तरह की घोषणा का इंतजार था।

सरकार द्वारा साहित्‍य अकादमियों का बजट और इस दिशा में इच्‍छा शक्ति का अभाव खलने वाला है, जिससे सभी साहित्‍य प्रेमियों को निराशा ही हुई है।

कर राहतों के पिटारा के बीच बजट संतुलित जरूर माना जा सकता है।

मुझे जो पहलू अच्‍छा लगा वह सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने का संकल्‍प है, जैसे नई सौर ऊर्जा नीति बनाना एवं सभी सौर ऊर्जा उपकरणों को कर मुक्‍त करना। ऊर्जा संकट के लिए इस तरह के प्रयोग राजस्‍थान में सराहनीय हो सकते हैं। बधाई।

Sunday, March 7, 2010

पाती-दर-पाती

मेरे द्वारा लिखी पिछली पोस्‍ट 'एक पाती यह भी' पर एंटीवायरस के संपादक-साहित्‍यकार श्री नीरज दइया ने अपने विचारों भरी पाती 'विरोध के लिए विरोध नहीं' लिखी।
इसमें उठे सवालों का जवाब मेरे द्वारा दिया गया वहीं उन्‍हीं का प्रत्‍युत्‍तर भाई नीरज ने अपनी पोस्‍ट 'प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया पर कुछ शब्‍द' लिखी।

'इन दिनों.....' के जिज्ञासु पाठक लिंक से वहां पहुंचकर यह सब जान सकते हैं।
साहित्यिक बंधुओं के लिए सादर।