Friday, April 30, 2010

क्‍या यह बहस का विषय नहीं ?

गांव रोहिणी, जिला वर्धा, (विदर्भ) महाराष्‍ट्र के समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े वासु परिवार में 4 मार्च 1935 को जन्‍मी प्रभा हमारे बीच नहीं रहीं। प्रभा राव राजस्‍थान में

Thursday, April 29, 2010

लोक-इतिहास के बेजोड़ विद्वान : गोविंद अग्रवाल

लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री चूरू के विषय में मेरी पोस्‍ट के माध्‍यम से थोड़ा-सा जिक्र किया था। इस संस्‍थान के प्राण इतिहासकार

Friday, April 16, 2010

एक मुख्‍यमंत्री के साथ पांच घण्‍टें

तुम्‍हें एक जन्‍तर देता हूं। जब भी तुम्‍हें संदेह हो या तुम्‍हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ :

'' जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्‍ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा ? क्‍या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्‍या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्‍य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्‍या उससे उन करोड़ों लोगों को स्‍वराज्‍य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्‍मा अतृप्‍त है ?

तब तुम देखोगे कि तुम्‍हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्‍त होता जा रहा है।''
- मोहनदास करमचंद गांधी

14 अप्रेल, 2010 का दिन। जब पूरे भारत में अम्‍बेडकर जयंती मनाई जा रही थी। खासकर राजनेता अपने दलित वोट बैंक को पुख्‍ता करने के सपने बुनते हुए बढ़-चढ़कर उन जयंती समारोहों में अपने को हिस्‍सा बनाने का जी-भर यत्‍न कर रहे थे। दलितोद्धार के लम्‍बे-चौड़े

Thursday, April 15, 2010

शिक्षा मंत्री जी जवाब दीजिए

1
शिक्षा मेरा अधिकार : मातृभाषा में हो परिष्‍कार
अनिवार्य शिक्षा कानून के पारित होते ही राजस्थान में इन दिनों एक अहम् सवाल सबके सामने खड़ा हो गया है। वह यह है कि राज् में मातृभाषा किसे माना जाए ? चूंकि यह सवाल एक मायने में खड़ा हुआ नहीं है, खड़ा किया गया है। कहने का तात्पर्य है कि राजस्थान के वाशिंदों की मातृभाषा राजस्थानी है। जनगणना के आंकड़े और सारे तथ् इस बात के गवाह रहे हैं। आज भी इस दिशा में कोई सर्वे किया जाए तो इस बात की ताहीद हो सकती है।


2
एक आदमी का बेतुका बयान
फिर यह सवाल कहां से ?
राजस्‍थान सरकार के शिक्षा मंत्री मास्‍टर भंवरलाल मेघवाल ने एक बेतुका बयान देकर पूरे राजस्‍थान के राजस्‍थानी भाषी समुदाय का अपमान कर डाला। उनका कहना था कि ''राजस्‍थान की फिलहाल मातृभाषा हिन्‍दी है।''
इस बयान की जमकर आलोचना हुई। बयान आलोचना होने लायक भी था। बयान की कमजोरी यह 'फिलहाल' भी है। मां और मातृभाषा फिलहाल नहीं स्‍थायी होती हैं। पूछने वाला सीधे से पूछे कि

Sunday, April 11, 2010

लोक संस्‍कृति एवं इतिहास की कहानी बयान करता एक आगार

चूरू (राजस्‍थान) के इतिहास से जुड़ी सामग्री का जिक्र आते ही हमें बरबस श्री सुबोध कुमार अग्रवाल एवं श्री गोविंद अग्रवाल का स्‍मरण हो आता है। वह इसलिए की 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' ग्रंथ के मूल स्रोत ये अग्रवाल बंधु ही हैं। इस ग्रंथ की तथ्‍यात्‍मक सामग्री के पठन-पाठन के बाद ही हम इतना जिक्र एवं चर्चाएं कर लेते हैं। इतिहास संचय करते-करते इन बंधुओं का काम स्‍वयं अपने-आप में इतिहास बन गया है। आज सुबोधजी हमारे बीच नहीं हैं और गोविंदजी अपने बच्‍चों के साथ कर्नाटक के कुमारपट्टनम् में रह रहे हैं, परंतु उनका किया गया काम हमारे बीच पुस्‍तकों एवं म्‍यूजियम के रूप में हमारे पास है।
लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान, नगरश्री का संग्रहालय बेजोड़ है। यहां भाड़ंग, पल्‍लू, कालीबंगा, रंगमहल, सोथी एवं करोती के थेहड़ों से प्राप्‍त हजारों वर्षों पुरानी पुरातात्विक सामग्री मौजूद है। वहीं संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों, सिक्‍कों, ताड़पत्रीय प्रतियों, हस्‍तलिखित पुस्‍तकों, बहियों-दस्‍तावेजों आदि का संग्रह है। चूरू को राज्‍य सरकार ने जब हेरिटेज सिटी घोषित किया तो उस स्‍वरूप में नगरश्री म्‍यूजियम भी हेरिटेज सिटी का एक प्रमाण रहा है।
चूरू के मुख्‍य बाजार से सटी इन हवेलियों के बीच पोद्दार हवेली में लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री का स्‍थाई भवन है।
भवन के भीतरी द्वार की बनावट पुरातात्विक दृष्टि से स्‍वय महत्‍वपूर्ण है-
वहीं आंतरिक स्‍वरूप तो और भी बेहतर कल्‍पना लिए हुए है। सभागार में चित्र प्रदर्शनी के रूप में नगर के महापुरूषों, समाजसेवियों, योद्धाओं, साहित्‍यकारों, इतिहासविदों एवं अन्‍यान्‍य विभूतियों के साथ-साथ नगर के प्रमुख स्‍थलों के लगभग 1200 चित्र संयोजित हैं-

सेठ चम्‍पालाल पारख सभागार का यह मदन मंच नगरश्री की शान है। यहां साहित्‍यकार विष्‍णु प्रभाकर, क्षेमचंद्र सुमन, वियोगी हरि, इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा, न्‍यायाधिपति गुमानमल लोढ़ा, राजनेता मधु दण्‍डवते, हरिशंकर भाभड़ा, खेतसिंह राठौड़, उजला अरोड़ा, कुंभाराम आर्य, दौलतराम सहारण, स्‍वतंत्रता सेनानी रघुवर दयाल गोयल, गौरीशंकर आचार्य, पत्रकार-संपादक कप्‍तान दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, हरिदत्‍त शर्मा, गुलाब कोठारी, सिनेगीतकार भरत व्‍यास, अभिनेता बी.एम. व्‍यास, जादूगर शंकर सम्राट सहित अनेक विभूतियों ने विचार व्‍यक्‍त किए हैं।
10 अप्रेल, 2010 को मैं यहां पहुंचता हूं तो नगरश्री के कार्यकारी अध्‍यक्ष डॉ. शेरसिंह बीदावत नगरश्री के संबंध में जानकारियों के साथ स्‍वागत करते हैं-
नगरश्री ट्रस्‍ट के फाउण्‍डर ट्रस्‍टी श्री रामगोपाल बहड़ अपने अनुभव और नगरश्री के विकास क्रम की कहानी सटीक शब्‍दावली के माध्‍यम से बताते चलते हैं तो लगता ही कि सुनते ही जाएं-

आंचलिक इतिहास की परम्‍परा में 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' अपनी साख रखता है। इतिहासकार गोविंद अग्रवाल की दक्षता, तीक्ष्‍णता और श्रम की देश के अनेक विद्वानों ने मुक्‍त कण्‍ठ सराहना की है। वहीं संयोजक, भ्रमणशील, तत्‍वान्‍वेषी सुबोधकुमार अग्रवाल की अनथक यात्राएं नगरश्री म्‍यूजियम के रूप में आज भी अपनी कहानी कहती हैं।

इतिहास ही नहीं लोक संस्‍कृति के उपासक, अन्‍वेषी जनों के लिए भी यह संस्‍थान आज किसी तीर्थ से कम नहीं है।